नरवाई जलाने से बंजर हो रही खेतों की कोख

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राज्य सरकार व कृषि विभाग के अधिकारियों की तमाम समझाइशों के बाद भी किसान इसे नजरअंदाज कर बड़ी नादानी कर रहे हैं। फलत: प्रकृति, पर्यावरण और जान-माल की क्षति के रूप में समाज को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। किसानों की इस गलत आदत की वजह से वायुमंडल में धुंआ फैल जाता है और इससे प्रकृति चक्र में बदलाव के कारण देश और प्रदेश की विकास दर भी बाधित होती है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक फसलों के गिरते उत्पादन और किसानों को हो रहे घाटे के पीछे नरवाई का जलाना एक मुख्य वजह है।

प्रदेश के अनेक स्थानों से खेतों में आग लगने की घटना की मुख्य वजह नरवाई जलाने के रूप में सामने आ रही है। इन घटनाओं से लाखों रूपए का गेहूं जलकर खाक हो गया है। नरवाई में आग लगाने से कई बार आग एक खेत से दूसरे खेत और फिर आसपास के खेतों को अपनी चपेट में ले लेती है। कई बार खेत-खलिहान से होते हुए आग की लपटें लोगों के घरों तक भी पहुंच जाती है और बड़े हादसे का सबब बन जाती हैं। साथ ही खेतों की उर्वरा के लिए उपयोगी मित्र कीट भी जलकर मर जाते हैं।
ये करें किसान
स्ट्रारीपर यंत्र का उपयोग कर नरवाई से भूसा तैयार कर सकते हैं। जिससे भूसे की मात्रा बढ़ेगी। गेहूं की कटाई के दौरान किसान नीचे से कटाई करें। गेहूं कटवाने के बाद उसे कृषि वेटर यंत्र का उपयोग करना चाहिए। इससे बचे हुए ठूठ व डंठल की कटिंग हो जाती है ।

गर्मी के मौसम में गरम हवा के थपेड़े और तेज अंधड़ से आग की छोटी चिंगारी भी दहक कर विकराल रूप ले लेती है। फसल कटने के बाद खेत में बचे तने और सूखे ठूठ आग में घी का काम करते हैं। आग बड़ी तेजी से फैलती है और किसान असहाय सा अपने इस उठाये कदम पर पश्चाताप करते हुए केवल दर्शक बनकर रह जाता है। अभी 31 मार्च 2018 की ही बात करें तो होशंगाबाद जिले के जासलपुर गांव में नरवाई की आग से 200 एकड़ खड़ी फसल जलकर राख हो गई। काफी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया जा सका अन्यथा कई और खेतों की फसलें स्वाहा हो चुकी होती। सागर जिले के अमरमऊ के आवरी मोहल्ला के आधा दर्जन घरों में लगी आग का भी मुख्य कारण नरवाई जलाने के रूप में सामने आया है। सिवनी जिले के गोपालगंज के निकट ग्राम बघराज में 31 मार्च 2018 की दोपहर पांच किसानों की 60 एकड़ में लगी फसल जलकर खाक हो गई। नरसिंहपुर जिले के ग्राम सिलारी महुआखेड़ा के 6 किसानों की 20 एकड़ में गेहूं की खड़ी फसल धू-धू कर जल गई। यह बानगी है नरवाई की आग की भयावहता की । इसी के रोकथाम के लिए राज्य सरकार किसानों से सावधानी बरतने की अपील करती आई है कि खड़ी और पकी फसल के खेत के आसपास न तो आग लगायें और न ही नरवाई जलायें ।

नरवाई को खेत में मिलाने के लाभ
खेत में जैव विविधता बनी रहती है, जमीन में मौजूद मित्र कीट शत्रु कीटों को खा कर नष्ट कर देते हैं। जमीन में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे फसल उत्पादन ज्यादा होता है। दलहनी फसलों के अवशेषों को जमीन में मिलाने से नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे फसल उत्पादन भी बढ़ता है। किसानों द्वारा नरवाई जलाने के बजाय भूसा बनाकर रखने पर जहां एक ओर उनके पशुओं के लिए चारा मौजूद होगा, वहीं अतिरिक्त भूसे को बेच कर वे आमदनी भी बढ़ा सकते हैं। नरवाई जलाने की अपेक्षा इन्हें इक_ा कर नाडेप पिट तथा वर्मी कम्पोस्ट बनाने में उपयोग कर जैविक खाद बनाई जा सकती है ।

नरवाई का समाधान कैसे
किसान को मालूम रहता है कि वह नरवाई जलाकर वातावरण को प्रदूषित कर रहा है, फिर भी वह अपनी निजी सुविधा के लिए इसको नहीं छोड़ पा रहा है। अधिकांश किसान फसल के अवशेषों को नहीं जलाते और वह जुताई कर इन्हें खेत में ही मिलाना पसंद करते हैं। अध्ययनों से यह ज्ञात हुआ है कि 95 फीसदी किसान नरवाई को जलाते हैं जबकि मात्र 5 प्रतिशत किसान ही फसलों के अवशेष भूसे को जलाकर इसका प्रबंधन करते हैं। नरवाई जलाने की सोच यह रहती है कि इससे अगली फसल की जुताई व बुआई में उन्हें कोई अड़चन न आये। उनकी यही सोच गलत है इससे जहां भूमि की उर्वराशक्ति कम होती है वहीं पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचता है। भूसा जलाकर उसका प्रबंधन करना सबसे सस्ता उपाय है। हालांकि खेत में भूसा रहने की स्थिति में जुताई कर उसे मिट्टी में मिलाना एक कठिनाई भरा महंगा कार्य है ।
खेतों में नरवाई जलाने के पीछे एक और बड़ी वजह यह है कि प्रदेश का किसान खरीफ की प्रमुख फसल की बुआई प्रथम वर्षा के तुरंत बाद ही करना चाहता है। ताकि उसे सोयाबीन का उत्पादन अच्छा मिले। इसके लिए वह गर्मी में ही अपने खेत तैयार करना चाहता है। खेत में गेहूं के अधिक अवशेष होने की स्थिति में यह संभव नहीं हो पाता। इसलिए किसान अपेक्षाकृत सरल उपाय नरवाई जलाने की प्रक्रिया अपनाता है ।
ये होता है नुकसान
नरवाई जलाने से धुंआ निकलता है, जिससे वायुमंडल में प्रदूषण फैलता है। खेत में जैव विविधता खत्म हो जाती है और सूक्ष्म जीव जलकर खत्म हो जाते हैं। नरवाई में आग लगाने से भूमि में रहने वाले लाभकारी बैक्टीरिया, सूक्ष्म जीव जलकर नष्ट हो जाते हैं। जिसके कारण उत्पादन क्षमता कम हो जाती है। जैविक खाद का निर्माण बंद हो जाता है। नरवाई जलाने से ग्लोबल वार्मिंग पर असर पड़ता है। यह वायुमंडल के लिए खतरनाक है। भूमि की ऊपरी परत पर मौजूद पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। कार्बनए नाइट्रोजन व फास्फोरस का अनुपात कम हो जाता है। खेतों में आग लगाने से वातावरण के तापमान में वृद्धि हो जाती है, जो आगे चलकर फसलों को भी प्रभावित करता है।
नरवाई जलाने पर जुर्माना
पर्यावरण को नुकसान पहुंचने के कारण फसल कटाई के बाद बची फसल यानी नरवाई को जलाना प्रतिबंधित है। नरवाई जलाने पर 15 हजार रूपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। नरवाई जलाने पर दो एकड़ से कम कृषि भूमि वाले किसान को 2500 रूपये, दो एकड़ से ज्यादा व पांच एकड़ से कम कृषि भूमि वाले को पांच हजार और पांच एकड़ से ज्यादा कृषि भूमि वाले को 15 हजार रूपए तक का जुर्माना करने का प्रावधान है। यह जुर्माना पर्यावरण क्षतिपूर्ति के रूप में है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भी पर्यावरण प्रदूषण एवं नियंत्रण अधिनियम 1981 के तहत धान व गेहूं की फसल कटाई के बाद बची फसल को जलाने पर प्रतिबंध लगाया है। वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी राजेन्द्र दुबे कहते हैं कि फसल काटने के बाद बची फसल या नरवाई जलाना आम समस्या है। अधिकतर जगह किसान श्रम व पैसा बचाने के लिए नरवाई जला देते हैं, लेकिन नरवाई जलाने से जमीन की उर्वराशक्ति पर विपरीत असर पड़ता है। साथ ही प्रदूषण भी फैलता है। इस कारण राज्य सरकार द्वारा इस पर प्रतिबंध लगाया गया है। साथ ही समय-समय पर किसानों को नरवाई नहीं जलाने की सलाह भी दी जाती है।
(बालाघाट जनसंपर्क)

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