किसानों को नहीं, बाजार को ज़रूरत किसानों की

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किसानों को नहीं, बाजार को ज़रूरत किसानों की – किसानो के बिल पर विरोध हो रहा है. बिल में लिखा है किसान जहाँ मर्जी चाहे अपनी उपज का सौदा कर सकते हैं. सन 2013 में मैंने किसानों की एक स्थिति पर रिपोर्ट लिखी थी जो जस की तस नहीं छपी. कुछ मलेरिया की दवा बनाने वाली कंपनियों ने किसानों से समझौता किया कि वे उनके लिए मलेरिया की दवा वाला पौथा artmisia उगाएं, जो केवल चीन में उगाया जाता है। कारण यह था कि ये कम्पनियाँ इस दवा का कच्चा माल चीन से मँगवाती थीं जो उस वक्त लगभग 500 डॉलर प्रति किलो था. लेकिन यदि इसे भारत में ही उगाकर पौधे से प्राप्त किया जाए तो ये 300 डॉलर प्रति किलो मिलता। बस फटाफट कंपनियों ने किसानों से ये डील कर डाली।

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किसानों को भी सोयाबीन और दूसरी फसलों के मुकाबले ये सौदा अच्छा लगा. मध्यप्रदेश, राजस्थान और कुछ उत्तर प्रदेश के किसानों ने ये पौधा उगाकर कंपनियों को बेचना शुरू कर दिया। एकाध साल तो सब ठीक रहा लेकिन जैसे ही चीन को ये बात पता चली, उसने फसल आने तक धैर्य रखा और फसल के आने के कुछ दिन पहले ही इस दवा के कच्चे माल के दाम 500 डॉलर से सीधे 150 और 200 डॉलर प्रति किलो तक गिरा दिए. बस फिर क्या था कंपनियों ने किसानों से मुंह मोड़ लिया। सुना है खूब दंगल हुआ और किसानों ने इस दवा के पौधे से तौबा कर ली. क्योंकि artmisia के पौधे की सब्जी भी नहीं बनती और कोई आयुर्वेदाचार्य भी नहीं खरीदता। बेचारे क्या करते। एक और घटना है एम एस पी यानि न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर।

कॉंग्रेस की सरकार ने कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य एकदम 1800 से बढ़ा कर 2500 से 3000 रूपये प्रति क्विंटल कर दिया और उनके मंत्री महोदय हर सभा में किसानों का भला करने की बात कहकर तालियां बटोरने लगे. लेकिन उन मंत्री जी और उनके आकाओं और अफसरों के ये नहीं मालूम था कि कपास खाया नहीं जाता। इसका उपयोग केवल धागा बनाने में होता है जो किसानों से केवल छोटी छोटी जिनिंग कर प्रेसिंग मिल खरीदती हैं. जो बाद में धागा बुनने वाली कंपनियों को सप्लाई करती हैं. जब इस समर्थन मूल्य बढ़ने की बात अमेरिकी देशों को पता चली तो उन्होंने भारत की धागा बनाने वाली मिलों को बढ़िया क्वालिटी के कपास की कैंडी जो 356 किलो की होती है, बहुत काम दामों में उनके कैम्पस में देना शुरू कर दिया। भारत के कपास की कैंडी जिसमे धूल भरी होती थी जिससे साफ़ करना घागा बनाने वाली मिलों के लिए अलग से खर्च था, वह 25000 से 28000 प्रति कैंडी मिलती थी.

अमेरिकी देशों से उससे बढ़िया कैंडी 21000 रूपये में मिलने लगी. क्योंकि अमेरिका में किसानों के लिए कॉटन हैंडलिंग कॉलेज हैं. भारत में कितने हैं किसी ने पता किया? नतीजा यह हुआ कि जिनिंग और प्रेसिंग मिलों से, जो प्रदेश सरकार से टैक्स की मार पहले ही झेल रही थीं, धागा बनाने वाली मिलों ने कपास खरीदना बंद कर दिया। और उन छोटी मिलों ने किसानों से खरीदना बंद कर दिया। हुआ यह कि कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया के पश्चिमी मध्यप्रदेश के कपास खरीदी केंद्रों पर किसानों की भीड़ लग गई. जाहिर है जिसको अपना माल ठिकाने लगाना होता उससे बाबू लोगों को कॉन्फिडेंस में लेना होता नहीं तो खड़े रहो बाहर। लेकिन ताली बटोरने वाले मंत्री जी, उनके आका और अफसर कहाँ मिलते और किसानों की दुर्दशा को देखने की फुर्सत कहाँ। किसान कपास वापस लेकर जा नहीं सकते थे. खरीदने वाला कोई था नहीं।

बाजार में भगवान को आरती करने में उपयोग में आने वाली बत्ती में इतना कपास लगता नहीं कि टनों बिक जाता। खा सकते नहीं। किसान उसे वापस ले जाए तो रखे कहाँ, जरा सी चिंगारी कपास और घर दोनों फूँक देती। इसलिए सरकार जाती रही. आज नाम लेने वाला कोई नहीं है. किसान, मज़दूर होते बहुत छोटे छोटे हैं लेकिन बड़े बड़े राजा महाराजा, सल्तनत इनके सामने कब बौने और फिर गायब हो जाते हैं पता भी नहीं चलता। शायद इसीलिये कहावत बनी है फलां जी खेत रहे. तो फलां जी को अगर खेत नहीं रहना है और दफ़न नहीं होना है तो किसानों और मज़दूरों की खटिया पर बैठना ज़रूरी है, ये खटिया हज़ारों साल से वैसी ही है और वहीं पडी है, बाजू में रखे भरे घड़े के सहारे। क्योंकि ये खटिया ही है जिसने अच्छे अच्छों की खाट खड़ी कर दी है. जिन्हे दुनिया प्यार से पप्पू कहती है वे किसानों का कर्जा माफ़ करने का वादा कर चुनाव लड़े और उनके खिलाफ भयंकर आंधी में भी जीत गए. लेकिन चुनाव के बाद जो गए तो पीछे मुड़कर नहीं देखा कि उनके साथी यहाँ कर क्या रहे हैं. साल भर में ही खेत रहे. किसान ही राजा बनाते हैं और खेत की धूल भी वही चटाते हैं. उनके लिए योजनाएं तो बनाई ही नहीं जा सकती क्योंकि उनकी ज़िंदगी ही बिना योजना बनाये चलती है. वे पीड़ित नहीं है बल्कि पीड़ा की परिभाषा ही किसान और मज़दूरों से शुरू होती है. उन्हें मार्केट से कैसे जोड़ा जा सकता है? ये तो मार्केट की गरज पडी हो तो जाए और उनसे जुड़ जाए वे मना नहीं करेंगे। मार्केट तो अपने कर्मचारियों से नहीं जुड़ पाता वो किसानों और मज़दूरों से कैसे जुड़ेगा? किसान उम्मीदों के खिलाफ उम्मीदों से उम्मीद लगाकर जीता है इसलिए उसे भय नहीं होता। वहीं मार्केट के पहले और मूल सिद्धांत ही भय और लालच हैं. किसान को न लालच है न भय वो मार्केट का क्या करेगा? जैसे कोरोना, बीमारी कम मार्केट ज़्यादा हो गई है जीने का लालच और मौत का भय. बस मार्केट तैयार है. जो बेचना है बेच लो. किसानों के लिए बिल तो दस लाये जा सकते हैं बशर्ते किसानों को मार्केट की ज़रूरत है समझने के बजाए मार्केट को समझाया जाए कि वह किसानों के बिना टिक ही नहीं सकता.

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