फसल की खेती (Crop Cultivation)

मक्के की फसल पर फॉल आर्मी वर्म का खतरा, विशेषज्ञों ने बताई दवा और सही मात्रा

12 सितंबर 2026, नई दिल्ली: मक्के की फसल पर फॉल आर्मी वर्म का खतरा, विशेषज्ञों ने बताई दवा और सही मात्रा –  देशभर में मक्के की फसल पर फॉल आर्मी वर्म कीट का खतरा फिर बढ़ता दिख रहा है। सितंबर की शुरुआत में जारी एक कृषि सलाह में विशेषज्ञों ने किसानों को समय रहते कीट की पहचान और नियंत्रण के उपाय अपनाने की सलाह दी है, क्योंकि यह कीट कुछ ही दिनों में पूरी फसल को नुकसान पहुंचा सकता है।

फॉल आर्मी वर्म की सूंडी सबसे पहले मक्के के पौधे की गोभ (व्होर्ल) में छिपकर पत्तियों को अंदर से खाना शुरू करती है, जिससे पत्तियों पर लंबी कतार में छेद नजर आते हैं। शुरुआती दौर में पहचान न होने पर यह कीट बहुत तेजी से फैलता है और पैदावार में भारी गिरावट ला सकता है।

कौन सी दवा, कितनी मात्रा में करें इस्तेमाल

कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के मुताबिक, फॉल आर्मी वर्म पर नियंत्रण के लिए इमामेक्टिन बेंजोएट 5% एसजी का इस्तेमाल कारगर माना जाता है। इसे करीब 1 ग्राम प्रति 2.5 लीटर पानी की दर से घोलकर छिड़का जा सकता है, यानी एक एकड़ के लिए लगभग 200 लीटर पानी के घोल की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा क्लोरएन्ट्रानिलिप्रोल 18.5% एससी और स्पिनेटोरम 11.7% एससी भी नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले विकल्प हैं। विशेषज्ञों ने साफ किया है कि किसी भी दवा की अंतिम मात्रा हमेशा उत्पाद के लेबल और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के मुताबिक ही तय करनी चाहिए।

छिड़काव करते समय ध्यान रखना जरूरी है कि दवा का घोल सीधे पौधे की गोभ (व्होर्ल) में जाए, क्योंकि सूंडी वहीं छिपकर बैठती है। सुबह या शाम के समय छिड़काव करना ज्यादा असरदार माना जाता है, जब कीट सक्रिय अवस्था में बाहर निकलकर भोजन कर रहा होता है।

सिर्फ दवा नहीं, ये सावधानियां भी जरूरी

फॉल आर्मी वर्म मूल रूप से अमेरिकी महाद्वीप का कीट माना जाता है, जो बीते कुछ वर्षों में भारत के मक्का उत्पादक क्षेत्रों में तेजी से फैला है। यह कीट एक बार खेत में आ जाए तो अकेले रासायनिक छिड़काव से पूरी तरह काबू करना मुश्किल होता है, इसलिए विशेषज्ञ खेत की नियमित निगरानी और शुरुआती लक्षण दिखते ही कार्रवाई करने की सलाह देते हैं।

एक ही दवा को बार-बार इस्तेमाल करने से कीट में उस दवा के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है, इसलिए विशेषज्ञ अलग-अलग समूह की दवाओं को बदल-बदलकर इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। इसके अलावा खेत के आसपास के खरपतवार और पुरानी फसल के अवशेष हटाते रहने से भी कीट के अंडे और सूंडी को पनपने से रोका जा सकता है, जिससे अगली फसल पर हमले का खतरा कम हो जाता है।

खेत में हर हफ्ते कम से कम एक बार पौधों की गोभ की जांच करने से शुरुआती संक्रमण समय रहते पकड़ में आ जाता है, जिससे कम दवा में ही कीट पर काबू पाया जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जितनी जल्दी कीट की पहचान होगी, फसल बचाने की संभावना उतनी ही ज्यादा रहेगी।

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