गर्मी में कद्दूवर्गीय सब्जियों की खेती कैसे करें, जानिए पूरी तकनीक
14 अप्रैल 2026, नई दिल्ली: गर्मी में कद्दूवर्गीय सब्जियों की खेती कैसे करें, जानिए पूरी तकनीक – कद्दूवर्गीय सब्जियां भारतीय कृषि और आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनमें लौकी, खीरा, कद्दू, करेला, तोरई और गिलकी जैसी फसलें शामिल हैं। ये सब्जियां न केवल पोषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि इनकी खेती किसानों के लिए आय का अच्छा स्रोत भी बन सकती है। गर्मी के मौसम में इनकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है, जिससे किसानों को लंबे समय तक उत्पादन और बाजार में उपलब्धता मिलती है।
कद्दूवर्गीय सब्जियों की खासियत
कद्दूवर्गीय फसलें बेल वाली सब्जियां होती हैं, जिन्हें गर्मी और वर्षा दोनों मौसम में उगाया जा सकता है। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये फसलें लगभग 8 से 10 महीने तक बाजार में उपलब्ध रहती हैं। इन्हें सलाद, पकी सब्जी और कुछ मामलों में मीठे फलों के रूप में भी उपयोग किया जाता है।
खेती की तकनीक और पोषक तत्व प्रबंधन
इन फसलों की बेहतर पैदावार के लिए संतुलित पोषण प्रबंधन बेहद जरूरी है। प्रति हेक्टेयर खेत में लगभग, 80 किलोग्राम नाइट्रोजन. 50 किलोग्राम फॉस्फोरस और 50 किलोग्राम पोटाश का उपयोग किया जाना चाहिए।
फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुवाई के समय दी जाती है। शेष नाइट्रोजन को 20–25 दिन और 40 दिन की अवस्था में देना फायदेमंद होता है।
फसल अवधि और सिंचाई प्रबंधन
कद्दूवर्गीय फसलें लगभग 90 से 100 दिनों में तैयार हो जाती हैं। गर्मी के मौसम में सिंचाई 6 से 7 दिन के अंतराल पर करना आवश्यक है, जिससे पौधों की बढ़वार और फल विकास अच्छा होता है।
फलों की तुड़ाई कच्ची और मुलायम अवस्था में करनी चाहिए। तुड़ाई के बाद फलों को डंठल सहित निकालकर उनके आकार और गुणवत्ता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है, जिससे बाजार में बेहतर मूल्य मिल सके।
कीट और रोग नियंत्रण
कद्दूवर्गीय फसलों में कीट और रोगों का समय पर नियंत्रण बहुत जरूरी है।
लाल पंपकिन बीटल (लाल कीड़ा): यह कीट शुरुआती अवस्था में पत्तियों को नुकसान पहुंचाता है। इसके नियंत्रण के लिए 4 लीटर पानी में 250 ग्राम राख और 100 ग्राम चूना मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है। इसके अलावा इमिडाक्लोप्रिड 0.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी का छिड़काव भी प्रभावी है।
फलमक्खी: यह कीट फलों के अंदर सुरंग बनाकर नुकसान पहुंचाता है, जिससे फल सड़ने लगते हैं। इसके नियंत्रण के लिए बीटा-साइफलुथ्रिन + इमिडाक्लोप्रिड 80–100 मि.ली. प्रति एकड़ या 10–12 मि.ली. प्रति 15 लीटर पानी में छिड़काव किया जा सकता है।
चूर्णी फफूंद (Powdery Mildew): इस रोग में पत्तियों और फलों पर सफेद पाउडर जैसा असर दिखाई देता है, जिससे पौधे की वृद्धि प्रभावित होती है। इसके नियंत्रण के लिए सल्फर पाउडर 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव किया जाता है।
किसानों के लिए लाभ
कद्दूवर्गीय सब्जियों की वैज्ञानिक खेती से किसान कम लागत में अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इन फसलों की बाजार में लगातार मांग बनी रहती है, जिससे किसानों की आय बढ़ने की संभावना रहती है। सही समय पर सिंचाई, पोषण और रोग नियंत्रण अपनाकर उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार किया जा सकता है।
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