ज्वार की फसल में छिपे दुश्मन: पहचान से लेकर प्रबंधन तक
लेखक: प्रथम कुमार सिंह (पी.एच.डी. स्कॉलर) , डॉ. प्रद्युम्न सिंह (वैज्ञानिक कीट शास्त्र), बी.एम. कृषि महाविद्यालय, खण्डवा, डॉ. रजनी सिंह सासोडे़ (विभाग प्रमुख, पादप रोग विज्ञान), डॉ. सुचारिता मोहपात्रा (फैकल्टी, पादप रोग विज्ञान), कृषि महाविद्यालय, रा.वि.सिं.कृ.वि.वि., ग्वालियर
06 जुलाई 2026, भोपाल: ज्वार की फसल में छिपे दुश्मन: पहचान से लेकर प्रबंधन तक – ज्वार यानी सोरघम, मध्य प्रदेश के मालवा और निमाड़ अंचल की एक ऐसी फसल है जिसे किसान अक्सर “कम मेहनत, ठीक-ठाक मुनाफे” वाली फसल मानते हैं। कम पानी में भी टिक जाने की इसकी क्षमता इसे खरीफ के मौसम में एक भरोसेमंद विकल्प बनाती है। लेकिन जैसे हर फसल के साथ होता है, ज्वार के साथ भी कुछ बीमारियाँ और कीट लगातार साये की तरह चलते हैं, और अगर समय रहते इनकी पहचान न हो, तो उपज में भारी गिरावट आ सकती है।
दिलचस्प बात यह है कि ज्वार में बीमारियों और कीटों के लक्षण अक्सर एक-दूसरे से मिलते-जुलते दिखते हैं — जैसे तना सड़ना कभी फफूंद की वजह से होता है तो कभी तना छेदक कीट की वजह से। इसलिए सही पहचान करना ही सही इलाज की पहली शर्त है। इस लेख में हम मध्य प्रदेश में ज्वार को नुकसान पहुँचाने वाली प्रमुख बीमारियों और कीटों की बात करेंगे — उनके लक्षण, पहचान के तरीके, और आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले रसायन उनके व्यापारिक नामों के साथ।
ज्वार की प्रमुख बीमारियाँ
1. दाना फफूंद
बारिश के मौसम में बोई जाने वाली ज्वार में यह सबसे आम और सबसे नुकसानदायक बीमारी मानी जाती है। जब बालियाँ दूधिया अवस्था में होती हैं और उसी समय लगातार नमी या बारिश हो, तो कई तरह की फफूंदें (मुख्यतः Fusarium, Curvularia, Aspergillus प्रजातियाँ) दानों पर हमला कर देती हैं।
पहचान कैसे करें:
- बालियों पर दानों के ऊपर गुलाबी, काली, हरी या धूसर रंग की फफूंद की परत जम जाती है।
- दाने कमजोर, हल्के, बदरंग और सिकुड़े हुए हो जाते हैं, कई बार अंकुरण क्षमता भी खत्म हो जाती है।
- तेज गंध और चिपचिपापन भी कई बार महसूस होता है, खासकर भंडारण के दौरान।
नियंत्रण में प्रयुक्त रसायन:
- मैंकोजेब 75% WP – 2 ग्राम/लीटर पानी
- कार्बेन्डाजिम + मैंकोजेब (संयुक्त फॉर्मूलेशन) – 2 ग्राम/लीटर पानी
- प्रोपिकोनाजोल 25% EC ) – 2 ग्राम/लीटर पानी
- थायरम से बीजोपचार करना भी एक अनिवार्य कदम माना जाता है।
2. एन्थ्रेक्नोज एवं रेड रॉट कॉम्प्लेक्स
यह बीमारी पत्तियों, तने और बालियों तीनों को प्रभावित कर सकती है, इसलिए इसे ज्वार की सबसे “बहुरूपी” बीमारियों में गिना जाता है।
पहचान कैसे करें:
- पत्तियों पर छोटे, लाल किनारे वाले, बीच में धूसर या भूसे के रंग के अंडाकार धब्बे बनते हैं, जो बाद में आपस में मिलकर बड़े झुलसे हुए क्षेत्र बना देते हैं।
- तने को चीरकर देखने पर अंदर का भाग गुलाबी-लाल रंग का दिखता है, जिसे “रेड रॉट” कहा जाता है, तना कमजोर होकर गिर जाता है (लॉजिंग)।
- बालियों पर काले, धँसे हुए धब्बे बनते हैं और गंभीर स्थिति में पूरी बाली सूख जाती है।
नियंत्रण में प्रयुक्त रसायन:
- कार्बेन्डाजिम 50% WP —2 ग्राम/लीटर पानी
- मैंकोजेब 75 डब्लू.पी. — 2 ग्राम/लीटर पानी
- एजोक्सीस्ट्रोबिन 23% SC ) – 1 मि.ली./लीटर पानी
3. डाउनी मिल्ड्यू
यह बीमारी खासतौर पर शुरुआती अवस्था में हमला करती है और गंभीर होने पर पूरा पौधा बाँझ (sterile) हो सकता है।
पहचान कैसे करें:
- पत्तियों की निचली सतह पर सफेद, रुई जैसी फफूंद की परत दिखाई देती है, खासकर सुबह के समय ओस में यह साफ नजर आती है।
- पत्तियाँ धीरे-धीरे पीली पड़कर धारीदार (chlorotic streaking) हो जाती हैं।
- गंभीर संक्रमण में बाली की जगह पत्तियों का एक गुच्छा बन जाता है, जिसे “ग्रीन ईयर” या “क्रेजी टॉप” कहा जाता है, ऐसे पौधे में दाना बिल्कुल नहीं बनता।
नियंत्रण में प्रयुक्त रसायन:
- मेटालैक्सिल 35% WS से बीजोपचार — 600 से 700 ग्राम 1 लीटर पानी में घोलकर 100 किलो बीज को उपचारित करें
- फफूंदनाशी के रूप में मेटालैक्सिल + मैंकोजेब — 2 ग्राम/लीटर पानी
- संक्रमित पौधों को शुरुआत में ही उखाड़कर नष्ट कर देना बीमारी के फैलाव को रोकने का सबसे कारगर तरीका है।
4. चारकोल रॉट / तना सड़न
यह बीमारी मुख्यतः सूखे और गर्मी के तनाव (moisture stress) की स्थिति में सक्रिय होती है, इसलिए मध्य प्रदेश के उन इलाकों में जहाँ बारिश के बाद लंबा सूखा पड़ जाता है, यह समस्या आम है।
पहचान कैसे करें:
- पौधे की निचली गाँठों और तने के आधार पर भूरा-काला सड़न शुरू होता है।
- तने को चीरने पर अंदर छोटे-छोटे काले, कोयले के चूरे जैसे दाने (स्क्लेरोशिया) दिखाई देते हैं, यही इस बीमारी की सबसे पक्की पहचान है।
- पौधा अचानक मुरझाकर गिर जाता है, खासकर दाना भरने की अवस्था में।
नियंत्रण में प्रयुक्त रसायन:
- रासायनिक नियंत्रण सीमित प्रभावी है, बीजोपचार के लिए 5 से 10 मि.ग्रा./ किलो या 10 से 20 ग्रा. पाउडर/ किलो बीज ट्राइकोडर्मा विरिडी आधारित जैव-फफूंदनाशी का प्रयोग बेहतर परिणाम देता है।
- कार्बेन्डाजिम से बीजोपचार — 2 ग्रा/ किलो बीज
- खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखना और संतुलित पोटाश उर्वरक देना रोकथाम में मदद करता है।
5. अरगट रोग
यह बीमारी खासतौर पर हाइब्रिड बीज उत्पादन वाले खेतों में ज्यादा चिंता का विषय है, क्योंकि यह फूल आने के समय पुष्पगुच्छ (panicle) को सीधे प्रभावित करती है।
पहचान कैसे करें:
- फूल वाले हिस्से से मीठा, चिपचिपा, गुलाबी रंग का द्रव्य (हनीड्यू) रिसता है, जो देखने में शहद की बूँदों जैसा लगता है।
- बाद में इन्हीं जगहों पर काले, सख्त, आकार में बढ़े हुए दाने जैसी संरचनाएँ (स्क्लेरोशिया) बन जाती हैं, जो सामान्य दाने से काफी बड़ी होती हैं।
नियंत्रण में प्रयुक्त रसायन:
- प्रोपिकोनाजोल 25% EC — 2 मि.ली./लीटर पानी
- फूल आने के समय छिड़काव का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है, देरी होने पर असर कम हो जाता है।
ज्वार के प्रमुख कीट
1. तना मक्खी
यह कीट अंकुरण के तुरंत बाद, यानी फसल की सबसे नाजुक अवस्था में हमला करता है, इसलिए इसे सबसे खतरनाक शुरुआती कीट माना जाता है।
पहचान कैसे करें:
- पौधे की बीच वाली पत्ती (केंद्रीय प्ररोह) पीली पड़कर सूख जाती है, जिसे हल्के से खींचने पर आसानी से बाहर आ जाती है और सड़ी हुई दुर्गंध देती है — यह “डेड हार्ट” लक्षण तना छेदक जैसा ही दिखता है, इसलिए भ्रम होना आम बात है।
- अंतर पहचानने के लिए पौधे को उखाड़कर आधार देखें: तना मक्खी का लार्वा (मैगट) सफेद, बिना पैरों वाला और छोटा होता है, और यह तने के आधार में मिलता है।
- यह कीट थोड़ी बड़ी अवस्था के पौधों में तने के अंदर घुसकर सुरंग बना देता है।
नियंत्रण में प्रयुक्त रसायन:
- थायोमेथोक्जाम 30% FS से बीजोपचार — 5 से 10 मि.ली. / किलो बीज आवश्यकतानुसार
- इमिडाक्लोप्रिड 48% FS से बीजोपचार —5 से 10 मि.ली. / किलो बीज आवश्यकतानुसार
- खड़ी फसल में प्रकोप दिखने पर डाइमिथोएट 30% EC —2 मि.ली./लीटर पानी
पहचान कैसे करें:
- पत्तियों पर एक कतार में गोल-गोल छेद (शॉट-होल पैटर्न) दिखाई देते हैं, यह शुरुआती लार्वा की खुरचन से बनते हैं।
- बाद की अवस्था में “डेड हार्ट” बनता है, लेकिन तना मक्खी के विपरीत, तना छेदक का लार्वा बड़ा, धारीदार (गहरे भूरे धब्बों वाला) होता है और तने के भीतर काफी ऊपर तक सुरंग बना देता है।
नियंत्रण में प्रयुक्त रसायन:
- क्लोरएंट्रानिलिप्रोल 18.5% SC — 0.5 मि.ली./लीटर पानी
- कार्टेप हाइड्रोक्लोराइड 4G —7.5-10 Kg/एकड़, पौधे की भँवर (whorl) में डालने के लिए उपयुक्त
- फिप्रोनिल 5% SC — 2 -4 मि.ली./लीटर पानी
3. ज्वार का माहू
यह छोटा, नरम शरीर वाला रस चूसने वाला कीट है, जो पत्तियों की निचली सतह पर समूह में चिपककर रहता है और तेजी से गुणा करता है।
पहचान कैसे करें:
- पत्तियों पर हल्के पीले से लेकर लाल-बैंगनी रंग के धब्बे बनने लगते हैं, गंभीर प्रकोप में पूरी पत्ती लाल-बैंगनी होकर सूख जाती है।
- माहू द्वारा छोड़े गए मीठे चिपचिपे पदार्थ (हनीड्यू) पर काली फफूंद (सूटी मोल्ड) जम जाती है, जिससे पत्तियाँ काली दिखने लगती हैं।
- पत्ती को पलटकर देखने पर हल्के पीले-सफेद रंग के छोटे-छोटे कीटों का घना समूह साफ दिखता है।
नियंत्रण में प्रयुक्त रसायन:
- इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL — 0.5 मि.ली./लीटर पानी
- थायोमेथोक्जाम 25% WG — 0.5 मि.ली./लीटर पानी
- फ्लोनिकामिड 50% WG —0.5 ग्राम /लीटर पानी
4. बाली मिज (Sorghum Midge – Stenodiplosis sorghicola)
यह बहुत छोटा कीट है जो फूल आने के दौरान ही सक्रिय होता है और सीधे दाना बनने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है।
पहचान कैसे करें:
- बालियों में दाने नहीं बनते, उनकी जगह खाली, सूखे हुए भूसी जैसे छिलके (empty glumes) रह जाते हैं।
- नजदीक से देखने पर फूल वाले भाग में हल्के नारंगी-लाल रंग के बहुत छोटे लार्वा मिल सकते हैं, हालांकि इन्हें बिना आवर्धक लेंस के देखना मुश्किल होता है।
- प्रभावित बाली को हिलाने पर वयस्क कीट (छोटी नारंगी मक्खी जैसे) उड़ते हुए दिख सकते हैं, खासकर सुबह के समय।
नियंत्रण में प्रयुक्त रसायन:
- ज्वार की मिज मक्खी (Sorghum Midge) को नियंत्रित करने के लिए लैम्ब्डा साइहेलोथ्रिन (Lambda-cyhalothrin) सबसे प्रभावी रासायनिक कीटनाशक है। प्रति एकड़ 200-250 मिली (या 5% EC फॉर्मूलेशन के लिए समान सांद्रता) की दर से 200 लीटर पानी में मिलाकर फसल पर स्प्रे करें।
- छिड़काव का सही समय फूल खिलने की शुरुआत (10% फ्लावरिंग) होता है, इसमें देरी असर को बेकार कर देती है।
5. सैनिक कीट
पिछले कुछ वर्षों में यह कीट मध्य प्रदेश सहित पूरे देश में ज्वार और मक्का दोनों में तेजी से फैला है, और इसे नया लेकिन बेहद विनाशकारी खतरा माना जाता है।
पहचान कैसे करें:
- पत्तियों की भँवर (whorl) में लार्वा घुसकर अंदर से खाता है, जिससे पत्तियों पर बड़े, अनियमित आकार के छेद और चीथड़े जैसी बनावट दिखती है।
- भँवर के अंदर गीला, दानेदार मल (frass) जमा दिखता है, जो चूरे जैसा लगता है।
- लार्वा की पहचान उसके सिर पर बने उल्टे “Y” आकार के सफेद निशान और शरीर के अंतिम खंड पर चार काले बिंदुओं की चौकोर बनावट से होती है।
नियंत्रण में प्रयुक्त रसायन:
- क्लोरएंट्रानिलिप्रोल 18.5% SC — 0.5 मि.ली./लीटर पानी
- स्पिनेटोरम 11.7% SC — 1.0 मि.ली./लीटर पानी
- इमामेक्टिन बेंजोएट 5% SG —0.5 ग्राम/लीटर पानी
- छिड़काव सुबह या शाम के समय करना बेहतर रहता है, क्योंकि यह लार्वा दिन में भँवर के अंदर छिपा रहता है।
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