फसल की खेती (Crop Cultivation)राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

कश्मीर के किसानों को बड़ी सौगात, धान की 2 नई किस्में देंगी ढाई गुना तक ज्यादा पैदावार; जल्दी कटाई से दूसरी फसल का मौका

03 सितंबर 2026, नई दिल्ली: कश्मीर के किसानों को बड़ी सौगात, धान की 2 नई किस्में देंगी ढाई गुना तक ज्यादा पैदावार; जल्दी कटाई से दूसरी फसल का मौका – कश्मीर घाटी में धान की खेती करने वाले किसानों के लिए अच्छी खबर है। यहां वैज्ञानिकों ने धान की दो नई किस्में तैयार की हैं, जिनसे सामान्य किस्मों की तुलना में ज्यादा उत्पादन मिलने की उम्मीद है। शालीमार-4 और शालीमार-5 नाम की इन किस्मों से करीब 7.2 टन प्रति हेक्टेयर तक पैदावार दर्ज की गई है। यह देश में धान की औसत उत्पादकता से करीब ढाई गुना अधिक बताई गई है। खास बात यह है कि इन किस्मों की कटाई अपेक्षाकृत जल्दी हो जाती है, जिससे किसानों को उसी खेत में दूसरी फसल लेने का अवसर मिल सकता है।

कहां तैयार हुईं धान की ये नई किस्में?

शालीमार-4 और शालीमार-5 को शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी-कश्मीर के अंतर्गत खुडवानी स्थित माउंटेन रिसर्च सेंटर फॉर फील्ड क्रॉप्स (MRCFC) ने विकसित किया है। एमआरसीएफसी के एसोसिएट डायरेक्टर नजीब-उल-रहमान सोफी के मुताबिक, शालीमार-4 को मैदानी इलाकों में खेती के लिए तैयार किया गया है। वहीं, शालीमार-5 को अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों की जलवायु और खेती की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है।

7.2 टन प्रति हेक्टेयर तक पैदावार

एमआरसीएफसी के आंकड़ों के अनुसार, इन दोनों नई किस्मों से करीब 7.2 टन प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन हासिल हुआ है। यह देश में धान की औसत पैदावार से लगभग 2.5 गुना ज्यादा है। कश्मीर के ग्रामीण परिवारों के लिए धान महत्वपूर्ण फसल है। ऐसे में अधिक उत्पादन देने वाली ये किस्में किसानों को सीमित कृषि भूमि से ज्यादा उपज हासिल करने में मदद कर सकती हैं। इसका सीधा फायदा किसानों की आमदनी पर भी पड़ सकता है।

ब्लास्ट रोग से भी बचाव

शालीमार-4 और शालीमार-5 की एक अहम विशेषता यह है कि इन्हें ब्लास्ट रोग के प्रति प्रतिरोधी बताया गया है। ब्लास्ट धान की फसल को नुकसान पहुंचाने वाला फफूंदजनित रोग है, जिसके कारण उत्पादन प्रभावित हो सकता है। रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता होने से फसल को नुकसान का जोखिम कम हो सकता है। साथ ही किसानों को बीमारी से फसल बचाने के लिए होने वाले अतिरिक्त खर्च से भी राहत मिलने की संभावना है।

जल्दी कटाई, दूसरी फसल लेने का मौका

नई किस्मों का फसल चक्र भी अपेक्षाकृत कम है। नजीब-उल-रहमान सोफी के अनुसार, किसान इन किस्मों की 15 सितंबर से 25 सितंबर के बीच कटाई कर सकते हैं। जल्दी फसल तैयार होने से खेत सामान्य किस्मों की तुलना में पहले खाली हो जाएंगे। इससे किसानों को उसी जमीन पर अगली फसल की तैयारी के लिए ज्यादा समय मिल सकता है और एक ही कृषि भूमि से अतिरिक्त उत्पादन हासिल करने का रास्ता खुल सकता है।

छोटी जोत वाले किसानों को ज्यादा फायदा

कश्मीर में खेती योग्य जमीन का क्षेत्र लगातार घट रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 1996 से 2023 के बीच करीब 34 हजार हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि कम हुई है। ऐसे में कम जमीन से अधिक उत्पादन हासिल करना किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। ज्यादा उपज देने और कम समय में तैयार होने वाली शालीमार-4 और शालीमार-5 जैसी किस्में छोटी जोत वाले किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं।

धान के साथ पुआल से भी अतिरिक्त कमाई

इन किस्मों का फायदा सिर्फ धान के दाने तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इनसे मिलने वाले कुल बायोमास में करीब आधा हिस्सा दाने और बाकी हिस्सा पुआल का होता है। कश्मीर में धान के पुआल का इस्तेमाल सेब के कार्टन की पैकिंग में कुशनिंग सामग्री के तौर पर किया जाता है। इसके अलावा सर्दियों के दौरान इसका उपयोग पशुओं के चारे के रूप में भी होता है। इस तरह किसान धान बेचकर आमदनी हासिल करने के साथ-साथ पुआल की बिक्री से भी अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं। ज्यादा उत्पादन, जल्दी कटाई और पुआल के उपयोग की वजह से ये दोनों नई किस्में कश्मीर के धान किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक नया विकल्प बन सकती हैं।

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