पपीता से पाएं अधिक आय
जलवायु पपीते की अच्छी खेती गर्म नमी युक्त जलवायु में की जा सकती है। इसे अधिकतम 38 डिग्री सेल्सियस से 44 डिग्री सेल्सियस तक तापमान होने पर उगाया जा सकता है। न्यूनतम पांच डिग्री सेल्सियस से कम नहीं होना चाहिए।
फसल की खेती (Crop Cultivation) से जुड़ी संपूर्ण जानकारी प्राप्त करें। गेहूं, धान, सोयाबीन, मक्का, चना, सरसों, कपास, दालों और तिलहनी फसलों की उन्नत खेती, बुवाई, सिंचाई, पोषण प्रबंधन, रोग एवं कीट नियंत्रण के विशेषज्ञ सुझाव पढ़ें।
जलवायु पपीते की अच्छी खेती गर्म नमी युक्त जलवायु में की जा सकती है। इसे अधिकतम 38 डिग्री सेल्सियस से 44 डिग्री सेल्सियस तक तापमान होने पर उगाया जा सकता है। न्यूनतम पांच डिग्री सेल्सियस से कम नहीं होना चाहिए।
उत्तम किस्में : पूसा ए-4, पंजाब-7, अर्का अभय, अर्का अनामिका, वर्षा उपहार, हिसार उन्नत, वी.आर.ओ.-6 बीज की मात्रा व बुआई का तरीका : ग्रीष्म ऋतु के लिए 18 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तथा खरीफ हेतु के लिए 10 से
कृषि विज्ञान केन्द्र पन्ना के डॉं. बी.एस.किरार, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख द्वारा विगत दिवस ग्राम इटौरी वि.ख. गुनौर में चना फसल में कीट प्रबंधन पर कृषकों को प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षण में डॉ. किरार ने बताया कि चना फसल को मुख्य
आंवला एक फल देने वाला वृक्ष है। यह करीब 20 फीट से 25 फीट लम्बा झाड़ीदार वृक्ष होता है। भारत की जलवायु आंवले की खेती के उपयुक्त मानी जाती है। भारत में मुख्य रूप से आंवले की खेती उत्तर प्रदेश,
समाधान – नींबू तथा इस जाति के अन्य पौधों में फूल यदि अपोषित तो उनके झडऩे की संभावना अधिक रहती है। यदि पौधे मेें क्षमता से अधिक फूल लगे हो तो वे प्राकृतिक रूप से छड़ जाते हैं। फूल में
भूमि का चुनाव – मक्के की खेती ऐसी भूमि में की जानी चाहिए जिसका पी.एच.मान 6.0 से 7.0 तक हो। जल भराव मक्के की फसल के लिए बहुत हानिकारक होता है। सामान्यत: मक्का की खेती सभी प्रकार की मृदाओं, बालुई
शाजापुर| कृषि विज्ञान केन्द्र, शाजापुर द्वारा गत दिनों ग्राम डंगीचा में सरसों प्रक्षेत्र दिवस का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि श्री शिवनारायण पाटीदार, अध्यक्ष,जिला सहकारी बैक शाजापुर रहे कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री गोवर्धन पाटीदार, सहकारी समिति मोहन
भण्डारण के समय उपज का लगभग 30 प्रतिशत भाग (21.13 लाख मिट्रिक टन) खाद्य पदार्थ नष्ट हो जाता है। अन्न को मुख्यत: चूहों, कीटों, माइट्स (अष्टपादी), सूक्ष्म जीवों एवं सीलन द्वारा क्षति होती है। सम्पूर्ण क्षति का अनुमानत: 60 प्रतिशत
आजकल फलदार पौधों के उत्पादन पर इनके ऊर्जादायक एवं औषधीय प्रभाव वाले गुणों पर अधिक ध्यान है। फल विटामिन, प्रोटीन एवं अन्य पोषक तत्वों के सर्वोत्तम श्रोत होते हैं। फलों के बेहतर उत्पादन के लिए पौधों में पर्याप्त मात्रा में
समाधान- अफीम एक औषधि फसल है जिसे आम कृषक नहीं लगा सकता है इसके लिये केन्द्रीय शासन के आबकारी विभाग से लायसेंस लेना अनिवार्य होता है। यह बात आपने पूर्व में प्रकाशित अफीम उत्पादन तकनीकी पर प्रकाशित लेख में पढ़ी