Animal Husbandry (पशुपालन)

कॉप 28: छोटे किसानों पर संकट फ़िलहाल टला

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आलेख: शशिकांत त्रिवेदी

16 दिसम्बर 2023, नई दिल्ली: कॉप 28: छोटे किसानों पर संकट फ़िलहाल टला – पिछले दिनों जब मध्यप्रदेश में नई सरकार का गठन हो रहा था तब दुबई में मध्यप्रदेश के किसानों, खासकर सीमान्त और छोटे किसानों और पशुपालकों का भविष्य तय किया जा रहा था. मौका था जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक सम्मलेन Cop28 जो 30 नवंबर से 13 दिसंबर तक जारी रहा और इस टिप्पणी के साथ समाप्त हुआ कि आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन में निर्णय लेने के लिए युवाओं की भागीदारी बढ़ाई जानी बहुत आवश्यक है. लेकिन मध्यप्रदेश जैसे राज्य के किसानों का जलवायु परिवर्तन से क्या वास्ता है?

दरअसल दुनिया भर के देशों या चर्चा की कि मवेशी, पशुधन और खेतों से आना वाला भोजन, मांस वगैरह जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे बड़े कारक हैं|

दुबई में COP28 में कई कृषि से सम्बंधित प्रस्तुतियों में यह बात सामने आयी कि मांस और डेयरी जलवायु परिवर्तन, खासकर ग्रीन हॉउस गैसों के उत्सर्जन में सबसे आगे हैं और कृषि और पशुधन प्राथमिक क्षेत्रों में इन गैसों के उत्सर्जन में अच्छा खासा इजाफा कर रहे हैं. चर्चा यह भी हुई कि यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि पिछले दस वर्षों में, पशुधन क्षेत्र का योगदान लगातार बढ़ा है, जो वर्ष 2011-12 में 2.96 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 5.93 प्रतिशत हो गया है।

क्या इसका अर्थ या है कि मध्यप्रदेश के किसानों या मांस के उत्पादकों के सामने कोई बड़ी चुनौती है? आंकड़ों पर गौर किया जाए तो राज्य में वर्ष 2014 से 2021 की अवधि के दौरान मांस उत्पादन बढ़ा है. वर्ष 2014 से 2021 के दौरान मांस के उत्पादन में प्रति वर्ष औसतन 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

वर्ष 2021 में मांस का कुल उत्पादन लगभग 116.34 हजार टन था जिसमें वर्ष 2019-20 की तुलना में 9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्ष 2020-21 में मांस की प्रति व्यक्ति उपलब्धता लगभग 1.40 किलोग्राम प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष थी। कुल मांस उत्पादन में सर्वाधिक योगदान मुर्गीपालन (41 प्रतिशत) का है इसी प्रकार बकरी का योगदान 29 प्रतिशत है। वित्तीय वर्ष 2022 में, भारत भर में मांस का उत्पादन लगभग 9.3 मिलियन मीट्रिक टन होने का अनुमान लगाया गया था, जो कि वित्तीय वर्ष 2006 में लगभग 2.3 मिलियन मीट्रिक टन से उल्लेखनीय वृद्धि है।

सन 2022 में भारत की मवेशी की संख्या लगभग 30.8 करोड़ थी। जबकि वैश्विक मवेशी आबादी एक अरब से अधिक थी, भारत में उस वर्ष ब्राजील, चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद सबसे अधिक मवेशी आबादी थी। इस वर्ष उत्तर प्रदेश राज्य में मांस का उत्पादन देश में सबसे अधिक हुआ था।

वित्तीय वर्ष 2022 में, भारत भर में मांस का उत्पादन लगभग 9.3 मिलियन मीट्रिक टन होने का अनुमान लगाया गया था, जो कि वित्तीय वर्ष 2006 में लगभग 2.3 मिलियन मीट्रिक टन से उल्लेखनीय वृद्धि है।

हालाँकि, अभी भी बहुत कुछ तय किया जाना बाकी है लेकिन COP28 में भागीदार देशों ने छोटे किसानों के सामने आने वाली चुनौतियों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होने का कोई संकेत नहीं दिया।

कम आय वाले देशों में लगभग 80 प्रतिशत श्रम शक्ति खेतों में काम करती है, यह भारत के लिए विशेष रूप से सच है, जहां की 60 प्रतिशत आबादी कृषि में काम करती है। वे लगभग सभी औपचारिक अर्थव्यवस्थाओं के हाशिए पर हैं, बैंकिंग प्रणालियों और जीवन रक्षक वित्त उनसे बहुत दूर है. और वे पहले से ही जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से पीड़ित हैं।

सभी देशों की 100 बिलियन डॉलर (लगभग 8 लाख करोड़ रूपये) की माँग के खिलाफ केवल 700 मिलियन डॉलर (लगभग 6000 करोड़ रूपये) की राशि देने को सहमति जताई है जो बहुत कम है. यह राशि इसलिए माँगी गई ताकि विकासशील और गरीब देश खेती में कटौती आदि से होने वाले नुकसान की भरपाई कर सकें।

अत्यधिक गर्मी, सूखा और वर्षा का चक्र, खाद, बीज का संकट मध्यप्रदेश की फ़सल को नाटकीय रूप से प्रभावित कर रहा है, जिससे भारतीय किसानों को जीवन यापन के लिए खतरा पैदा हो गया है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक गर्मी की लहरों ने पहले ही देश को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जिससे बिजली कटौती, धूल और वायु प्रदूषण में वृद्धि हुई है, और भारत के उत्तर में हिमनदों का पिघलना तेज हो गया है|

राहत की बात फिलहाल यह है कि लगभग 200 देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि पूरी दुनिया को पेट्रोल उत्पादों पर अपनी निर्भरता को ख़त्म करना होगा। यह लक्ष्य निर्धारित किया गया कि सन 2030 तक पृथ्वी का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा न बढ़े. एक तरह से विकसित देशों को यह मानना पड़ा कि पट्रोलियम उत्पाद ही ग्रीन हॉउस गैसों और जलवायु परिवर्तन के ख़ास कारण हैं और इन पर निर्भरता जितने जल्दी काम हो उतना अच्छा। क्या भारत के या मध्यप्रदेश के किसानों को चिंता करने की ज़रूरत नहीं है? खतरा अभी टला नहीं है; सरकारों को खेती के साथ साथ वैकल्पिक आय के साधनों पर ज़ोर देते हुए रोज़गार के नए विकल्प जनता को देने होंगे, पशुधन और मांस आदि से ग्रीन हॉउस गैसों को बढ़ने से कैसे रोका जाय इसका एक वैज्ञानिक हल ढूँढना होगा। उम्मीद है राज्यों में बनी नई सरकारें इस और भी कुछ ध्यान देंगी।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं|

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