ग्लेडियोलस से होगा किसानों को लाभ

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ग्लेडियोलस की 260 प्रजातियां पाई जाती है। इसे लिली तलवार भी कहा जाता है। ये फूल एशिया, यूरोप, दक्षिण अफ्रीका और उष्ण कटिबंधीय अफ्रीका में पाया जाता है। ग्लेडियोलस का उपयोग गुलदस्ते बनाकर शादी, पार्टी आदि अनेक प्रकार के कार्यक्रमों में बहुत ही महत्वपूर्ण है। औषधि के रूप में यह दस्त और पेट की गड़बड़ी के उपचार में पारंपरिक चिकित्सा में इस्तेमाल किया जाता है। ग्लेडियोलस की खेती करके किसान अधिक धन कमा सकते हैं। इस फूल की अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी मांग है। ग्लेडियोलस शब्द लैटिन भाषा के शब्द ग्लेडियस से बना है, जिसका अर्थ ''तलवार'' क्योंकि ग्लेडियोलस की पत्तियों का आकार तलवार जैसा होता है। इसके आकर्षक फूल जिन्हें फ्लोरेट्स भी कहते हैं। पुष्प, दंडिका (स्पाइक) पर विकसित होते हैं और ये 10 से 14 दिनों तक खिले हुए रहते हैं। ग्लेडियोलस की कुछ अद्वितीय विशेषताओं जैसे अधिक आर्थिक लाभ, आसान खेती, शीघ्र पुष्प प्राप्ति, पुष्पकों का विभिन्न रंगों, स्पाइक के अधिक समय तक तरोताजा बने रहने की क्षमता एवं कीट रोगों के कम प्रकोप आदि के कारण इसकी लोकप्रियता दिन प्रतिदिन बढ़़ती जा रही है। 

भूमि और जलवायु : ग्लेडियोलस की खेती सभी प्रकार की मृदा में की जा सकती है, किन्तु बलुई दोमट मृदा जिसका पीएच मान 5.5 से 6.5 के मध्य हो तथा जीवांश पदार्थ की प्रचुरता हो, साथ ही भूमि के जल निकास का उचित प्रबंध हो, सर्वोत्तम मानी जाती है। खुला स्थान जहां पर सूर्य की रोशनी सुबह से शाम तक रहती हो, ऐसे स्थान पर ग्लेडियोलस की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। भूमि का तापमान 13-15 डिग्री सेल्सियस होने पर कार्मस को सडऩ रोग से बचाया जा सकता है। इस तापमान से कम होने पर कार्मस सडऩ अधिक होता है। ग्लेडियोलस की खेती हेतु कम से कम 16 डिग्री सेल्सियस तथा अधिक तापक्रम 23-40 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त होता है। इसमें फूल आने पर बरसात नहीं होनी चाहिए। ग्लेडियोलस की फसल में फूलों के खिलने के समय खुला मौसम व सूर्य का प्रकाश पर्याप्त मिलने पर उत्पादन में बढ़ोतरी पाई गई है। 

भूमि की तैयारी और बुवाई: जिस खेत में ग्लेडियोलस की खेती करनी हो, उसकी दो-तीन जुताई कल्टीवेटर से करके मिट्टी को भुरभुरा बना दें। ग्लेडियोलस की फसल का प्रसारण धनकंदों (कॉमर्स) के द्वारा होता है। बुवाई करने का सही समय 15 अक्टूबर से नवम्बर के महीने तक का उचित समय होता है। किस्मों को उनके फूल खिलने के समयानुसार अगेती, मध्यम और पिछेती के हिसाब से अलग-अलग क्यारियों में लगाना चाहिए, जिससे किसानों को लम्बे समय तक पैदावार मिलती रहे, और किसान अधिक लाभ कमा सके। कार्मस् की बुवाई से पहले कंदों को बाविस्टिन के 0.02 प्रतिशत के घोल में आधा घंटे तक डूबा कर उपचार कर लेना चाहिए, जिससे कंदों के सडऩ की बीमारी से बचा जा सकता है। 

ग्लेडियोलस एक बहुत ही सुन्दर फूल है जो सबसे ज्यादा लोकप्रिय कट फ्लावर में से एक है। इसके पौधों की ऊंचाई 2 से 8 फीट तक होती है। ग्लेडियोलस फूलों के रंग और आकार के आधार पर एक बहुत बड़ा समूह है। एक स्पाईक या एक दंडी में 15 से 25 फूल (फ्लोरेट्स) तक पाये जाते हैं, जो या तो एक ही रंग या फिर दो या तीन रंगों के सम्मिश्रण मेंं होते हैं। भारत में ग्लेडियोलस सबसे लोकप्रिय व्यवसायिक कट फ्लावर वाली फसल बन गई है, जो भारत के पूर्वी क्षेत्र कलकत्ता, कलिंगपोंग, मणिपुर, श्रीलंका में सबसे अधिक उगाया जाता है। ग्लेडियोलस की मांग दिन प्रतिदिन बढ़ रही है, क्योंकि बहुरंगी किस्मों अलग-अलग रंग, फूलों का आकार और फूल (स्पाईक) के लम्बे दिनों तक तरोताजा बने रहना (लम्बि बैस लाईफ), गमलों में उगाना, क्यारियों में उगाना, गार्डन एवं रास्तों के किनारों पर उगाकर गार्डनों की सुन्दरता में चार चांद लगाने का काम करता है। घरेलू बाजार में इस फूल की खेती बहुत ही लोकप्रिय हो गई है। ग्लेडियोलस भारत में मैदानी और पहाड़ी इलाकों की जलवायु में अधिकतर उगाया जाता है। ग्लेडियोलस एक बारहमासी कार्मस के द्वारा प्रसारण करने वाला पौधा है।

प्रति हेक्टेयर बुवाई: ग्लेडियोलस के कंदों को 20&20 सेमी पौधों से पौधों की दूरी व कतार से कतार की दूरी पर 2,50,000 और 15&25 से.मी. पर बुवाई करने से 2,66,666 कार्मस की प्रति हेक्टेयर आवश्यता पड़ती है। कंदों का साईज छोटे होने पर दूरी कम रखना तथा बड़े साईज के कार्मस के लिए दूरी बड़ा दें। 5 से.मी. साईज के कार्मस उपयुक्त रहते हैं। प्रति हेक्टेयर कार्मस की आवश्यकता पौधे से पौधे की दूरी घटने व बडऩे पर घट बड़ जाती है। कंदों को 5 सेमी की गहराई में बुवाई करें। क्यारियों या मेड़ो की लाईन में बुवाई करें, जिससे निंदाई गुड़ाई, बुवाई, उर्वरक देना, मिट्टी चड़ाना आदि कल्चरल क्रियाएं करने में आसानी रहती है।

निंदाई-गुड़ाई व मिट्टी चड़ाना : ग्लेडियोलस की फसल में 4.5 निंदाई-गुड़ाई की आवश्यकता पड़ती है। दो बार मिट्टी पौधों पर चड़ानी चाहिए, उसी समय नाईट्रोजन का प्रयोग टॉप ड्रेसिंग के रूप में करें। तीन पत्ती आने पर पहली बार व छ: पत्ती पर दूसरी बार मिट्टी चड़ानी चाहिए, जिससे पौधे हवा से गिरने से बच जाते हैं, उससे फूलों को गिरने से काफी नुकसान होता है, उससे बच जाते है। 

खाद एवं उर्वरक: अच्छी सड़ी-गली गोबर की खाद 5 कि.ग्रा. प्रति वर्गमीटर, नाईट्रोजन 30 ग्रा., फास्फोरस 20 ग्रा., पोटाश 20 ग्रा. प्रति वर्गमीटर खेत तैयारी की आखरी जुताई करते समय दें। इसके साथ ही पोषक तत्वों की अधिक आवश्यकता होने पर 200 किग्रा नाईट्रोजन, 400 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 200 कि.ग्रा. पोटाश उर्वरक के रूप में प्रति हेक्टेयर दें। नत्रजन की आधी मात्रा, फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा खेत की तैयारी के समय बेसल डोज के रूप मे दें। शेष नत्रजन की आधी मात्रा कंदों की रोपाई/बुवाई के एक माह बाद टॉप ड्रेसिंग के रुप में दें। 

सिंचाई: ग्लेडियोलस की फसल में पहली सिंचाई कंदों की बुवाई के 10-15 दिन के बाद अंकुरण के समय पर करें। सिंचाई मौसम, मिट्टी की जल धारण क्षमता के अनुसार, अलग-अलग स्थान पर अलग-अलग रहती है। सर्दियों में 10-15 दिन व गर्मी के दिनों मे 5-6 दिनों के अंतर से सिंचाई करें। सिंचाई इतनी मात्रा में करें कि खेत में पानी भरा न रहे। और खेत में पर्याप्त मात्रा में नमी बनी रहे। कंदों/कामर्स की खुदाई के लिए एक से डेढ़ माह पहले सिंचाई करें। 

किस्में:
ग्लेडियोलस की विभिन्न रंगों वाली अनेक प्रजातियां प्रचलित हैं, जिनमें से कुछ उन्नत किस्में निम्न प्रकार हैं:- 

  • सफेद: व्हाईट फ्रेंडशीप, वाईट प्रोस्पेरिटी, स्नो व्हाईट, मीरा। 
  • गुलाबी: पिंक फ्रेंडशिप।
  • पीला: समर पर्ल, टोपाल, सपना, टीएस-14।
  • लाल: अमेरिकन ब्यूटी, ऑस्कर, नजराना, रेड ब्यूटी गुलाबी।
  • नारंगी: रोज सुप्रीम।
  • बैंगनी: हरमैजस्टी, समर सन साईन, डेहली लोकल, पंजाब मोरनिंग। 

भारत में विकसित किस्में: सपना, पूनम, नजराना, अप्सरा, अग्निरेखा, मयूर, सुचित्रा, मनमोहन, मनोहर, मुक्ता, अर्चना, अरूण और शोभा हैं। 

फूलों की कटाई: कंदों की बुवाई के पश्चात अगेती किस्मों में लगभग 60-65 दिनों में, मध्यम किस्मों में 80-85 दिनों में तथा पछेती किस्मों में 90-100 दिनों में पुष्प उत्पादन शुरु हो जाता है। फूलों/पुष्प दंडिकाओं को काटने का समय बाजार की दूरी तथा उपयोग करने के आधार पर निर्भर करता हैा पुष्प दंडिकाओं को सुबह के समय में कटाई करें। पास के बाजार में बेचने के लिए स्पाईक के दो से तीन फूल खिल जाने चाहिए। दूर के बाजार में फूलों को भेजने के लिए एक से दो फूलों का रंग दिखई देना शुरु हो तब कटाई करें। पुष्प दंडिका को काटने के बाद 20,25,50,100 के आकार में बंडल बना लें। कटाई के उपरंात पुष्प दंडिका को पानी से भरी बाल्टी में रखें ताकि पुष्प दंडिका में खेत की गर्मी समाप्त हो जाये। और पुष्प लम्बे समय तक तरो ताजा बने रहे। पुष्पों की कटाई से पहले एक सिंचाई कर देने से पुष्पों का विकास होता है एवं पुष्पों में लम्बे समय तक पानी अपूर्ति बनी रहे।

रोग व कीटों की रोकथाम: रोग - इस फसल में झुलसा रोग, कंद सडऩ रोग एवं पत्तियों के सूखने की बीमारी लगती है। इनके नियंत्रण के लिए 0.25 प्रतिशत डाईथेन एम 45, एक सप्ताह में दो बार छिड़काव करें, कंद सडऩ रोग की रोकथाम के लिए 50 डिग्री सेल्सियश पर 30 मिनट तक गर्म करते हैं। या 0.2 प्रतिशत का बाविस्टीन  अथवा बेलनेट 0.2 प्रतिशत का घोल बनाकर 10 से 12 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें । 

कीट- इस फसल में माहू एवं लाल सुंडी कीट लगते हैं। इनकी रोकथाम के लिए रोगोर 30 ई. सी. को 250 मिली दवाई को 250 मिली लीटर पानी में अर्थात् 1मिली लीटर दवाई 1लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें। 

ग्लेडियोलस की खेती में कंदों की लागत: ग्लेडियोलस की खेती में लगने वाली लागत के विषय में बहुत से किसानो को गलत जानकारी होती है जिसकी वजह से वो इसकी खेती करने में संकोच करते हैं। ग्लेडियोलस की खेती 20-20 से.मी. की दूरी पर लगाने पर 100000 (एक लाख) कंद प्रति एकड़ की आवश्यकता पड़ती है। ग्लेडियोलस के कंद 3-5 रू. प्रति कंद से 3 से 5 लाख रू. प्रति एकड़ खर्च करना पड़ता है। भूमि की आवश्यकता के अनुसार कंद लगाने की दूरी को घटाया-बढ़ाया जा सकता है। 

ग्लेडियोलस की खेती सेे लाभ: 

पुष्प डंडियों से लाभ: एक हेक्टर में 2.5 लाख कंदों को लगाने के हिसाब से प्रति कंद 1-2 पुष्प डंडिया, स्पाईक्स प्राप्त होती हैं। एक एकड़ में 2 लाख पुष्प डंडियां प्राप्त होती हैं, 3 रू. प्रति पुष्प डंडियां के हिसाब से 6 लाख रू. प्रति एकड़ प्राप्त होती है। इस प्रकार से 7.5 लाख रू. प्रति हेक्टर पुष्प डंडियों से लाभ प्राप्त होता हैं 

कार्मस और कार्मलेटस से लाभ: प्रति हेक्टर 2.5 लाख कंदों को लगाने के हिसाब से प्रति कंद से नये 1-2 कंद/कार्मस के अनुसार 5 लाख कंद प्राप्त होंगे एवं एक कार्मस से लगभग 10 कार्मेल्स मिलता है। इस प्रकार से 25 लाख कार्मेल्स प्रति हेक्टर मिलता है। 

कंदों की खुदाई: ग्लेडियोलस के कंदों की खुदाई 6-7 माह के बाद की जाती है। कंदों की खुदाई से एक माह पहले एक ंिसंचाई कर छोड़ देना चाहिए, ऐसा करने से कंदों का पूर्ण विकास हो जाता है एवं अच्छी गुणवत्ता के कंद प्राप्त होते हैं। और पैदावार में बढ़ोत्तरी होती है। कंदों/कार्मस को निकाल कर 0.02 प्रतिशत बाविस्टीन के घोल में डुबा कर उपचारित कर लें तथा छाया में सुखा कर जूट के बोरे या प्लास्टिक की बोरिीयों में भर कर ठंडे स्थान पर या कोल्ड स्टोरेज रख दें।  

  • नरेंद्र सिंह सोलंकी 
  • बी.एल. मालवीय

  email : ddagriraj@mp.gov.in
 

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