खरीफ फसलों में कीट प्रबंधन

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खरीफ के प्रमुख कीट व प्रबंधन – खरीफ मौसम में अनेक छोटे-बड़े कीट फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। जिनमें मुख्य कीट व उनका प्रबंधन निम्न प्रकार से है-
दीमक – यह कीट सर्वभक्षी कीट है। यह कीट खरीफ के मौसम में उगाई जाने वाली सभी फसलों जैसे मक्का, ज्वार, बाजरा, लोबिया, अरहर, गन्ना, मूंगफली, मिर्च, बैंगन आदि को क्षति पहुंचाता है। दीमक पौधों की जड़ों तथा भूमि से सटे हुए तने के भाग को खोखला कर देती है। दीमक के प्रकोप से फसलों को बचाने के लिये निम्नानुसार प्रबंध किया जाना चाहिये, जो इस प्रकार है-

  • फसल के कटने के बाद खेत की दो या तीन बार गहरी जुताई करें, साथ ही गर्मी में खेत की जुताई आवश्यक रूप से करें।
  • प्रभावित खेत में समय-समय पर सिंचाई करते रहेें।
  • खेत में हमेशा अच्छी प्रकार से सड़ी हुई गोबर की खाद का ही प्रयोग किया जाये।
  • बीज को बुवाई से पूर्व इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यू. एस.0.1 प्रतिशत से या क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. 4 मि.ली. प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करके बुवाई करें।
  • खड़ी फसल में दीमक का प्रकोप होने पर क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. की 3 से 4 लीटर मात्रा को बालू रेत में मिलाकर प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें।
  • 1 किलोग्राम बिवेरिया तथा 1 किलोग्राम मेटाराईजियम को लगभग 25 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद में अच्छी तरह मिलाकर छाया में 10 दिन के लिए रख देनी चाहिये, तत्पश्चात इस मात्रा को प्रति एकड़ के हिसाब से दीमक प्रभावित क्षेत्र में बुवाई पूर्व इसका प्रयोग करें।

कातरा – खरीफ की फसलों में खासतौर से दलहनी फसलों में कातरे का प्रकोप अधिक हो पा रहा है। इस कीट की लट अवस्था ही फसलों को नुकसान पहुंचाती है। इसका नियंत्रण निम्न प्रकार से किया जाना चाहिये:-
वयस्क कीट का नियंत्रण – मानसून की वर्षा होते ही पतंगों का जमीन से निकलना शुरू हो जाता है। इन पतंगों को यदि समय पर नष्ट कर दिया जाये तो फसलों में कातरे की लट अवस्था का प्रकोप बहुत ही कम हो जाता है। इसके लिये निम्न उपाय किये जाने चाहिये-

  • पतंगों को प्रकाश की ओर आकर्षित कर खेतों की मेड़ों, चारागाहों व खेत में गैस लालटेन या बिजली का बल्ब (जहां बिजली की सुविधा हो) जलायें तथा इसके नीचे मिट्टी के तेल में मिले पानी की परात रखें ताकि रोशनी पर आकर्षित होकर पतंगे पानी में गिर कर नष्ट हो जाये।
  • खेत के आसपास जगह-जगह पर घास-कचरा एकत्रित कर जला देना चाहिये जिससे पतंगे रोशनी पर आकर्षित हो तथा जल कर नष्ट हो जाये।
खरीफ मौसम में अनाज वाली फसलों के साथ-साथ दलहनी व तिलहनी फसलों को भी मुख्य रूप से उगाया जाता है। जिनमें मुख्य रूप से मक्का, ज्वार, बाजरा, कपास, गन्ना, धान, मूंगफली, सोयाबीन, तिल अरंडी, ग्वार, मूंग, अरहर, उड़द, चवला, तम्बाकू आदि प्रमुख हैं। खरीफ मौसम में वातावरण में नमी की अधिकता के कारण फसलों में कीट व रोगों का प्रकोप तीव्र गति से बढऩे लगता है, इसके साथ ही खेत की मिट्टी अधिक गीली होने के फलस्वरूप खरपतवार भी तीव्र गति से पनपने लगते हैं। ऐसे में खरपतवार फसलों के साथ प्रकाश, नमी, पोषक तत्वों के लिए तो प्रतिस्पर्धा करते ही हंै, साथ ही कीट व रोगों की भी भारणास्थली होते हैं। अनेक कीट व रोग खरपतवारों पर आश्रय लेकर फसलों को नुकसान पहुंचाते है। अत: कीट-रोग प्रबंधन हेतु प्रथम उपाय के रूप में कृषि भूमि को खरपतवार से मुक्त रखना अत्यंत आवश्यक है।

नियंत्रण – कातरे की छोटी अवस्था खेतों के पास उगे जंगली पौधों एवं जहां फसल उगी हुई हो, वहां पर कातरा वयस्क के अंडों से निकली लटें व इसकी प्रथम व द्वितीय अवस्था में क्विनालफॉस 1.5 प्रतिशत या मिथाईल पैराथियॉन 2 प्रतिशत चूर्ण दवा का 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करें। बंजर जमीन या चारागाह में उगे जंगली पौधों से खेतों की फसलों पर कातरे की लट का आगमन रोकने के लिए खेत के चारों तरफ खाइयां खोदकर इनमें मिथाईल पेराथियॉन 2 प्रतिशत चूर्ण भुरक देना चाहिये ताकि खाई में आने वाली लटें नष्ट हो जायें।
सफेद लट – खरीफ की अधिकांशत: फसलों मूंगफली, ज्वार, बाजरा, गन्ना, भिंडी, बैंगन आदि में यह कीट भारी क्षति पहुंचाता है। इस कीट की प्रौढ अवस्था व लट अवस्था दोनों की नुकसान पहुंचाती है। फसलों में साधारणतया लट (ग्रब) एवं पेड़-पौधों में प्रौढ़ कीट (बीटल) द्वारा नुकसान होता है। इसकी रोकथाम निम्नानुसार की जानी चाहिये:-

प्रौढ कीट का नियंत्रण – इस कीट के भृंग मानसून की प्रथम वर्षा पर पश्चात सूर्यास्त के पश्चात प्रतिदिन भूमि से बाहर निकलते हैं तथा आसपास के पौषी वृक्षों जैसे बेर, खेजड़ी, नीम, गुलर, सेंजना आदि पर बैठते है तथा इनकी पत्तियां खाते है। सफेद लट से फसलों को बचाने के लिये भृंग नियंत्रण सबसे कारगर उपाय है। इसके लिये चुने गये वृक्षों पर कीटनाशी दवाओं का छिड़काव किया जाता है। 15 मी. अद्र्धव्यास क्षेत्र में केवल एक ही परपोशी वृक्ष का चयन कर उसी पर कीटनाशी इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 1.5 मि.ली. प्रति ली. अथवा क्विनालफॉस 25 ई.सी. 2 मि.ली. प्रति ली. या कार्बोरिल 50 ड्ब्ल्यू पी 4 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें। इसके अतिरिक्त चयनित वृक्ष पर 3 से 4 फेरोमोन स्पन्ज प्रति दिन शाम को भृंग निकलने के समय ही तैयार कर वृक्षों पर लटकाये। फेरोमोन विधि द्वारा भृंग नियंत्रण सबसे सस्ता एवं कम प्रदूषण फैलाने वाला उपचार है।

लट अवस्था में नियंत्रण – बुवाई या रोपाई से पूर्व दानेदार दवा द्वारा भूमि उपचार किया जाना चाहिये। इसके लिये 1 हेक्टेयर में 25 किग्रा फोरेट 10 प्रतिशत या क्विनालफॉस 5 प्रतिशत या कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत में से कोई एक दवा को बुवाई से पूर्व हल द्वारा कतारों में ऊर कर दें। तथा इन्हीं कतारों परबुवाई करें।

फड़का – फड़का खरीफ की लगभग सभी फसलों को अत्यंत भारी क्षति पहुंचाता है। यह सर्वभक्षी कीट है। इसकी शिशु (निम्न) एवं प्रौढ़ (वयस्क) दोनों अवस्था पौधों को हानि पहुंचाता है। इसकी रोकथाम निम्नानुसार करें।

  • प्रकाश प्रपंच का उपयोग करें।
  • ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें।
  • मक्का के खेत के चारों ओर दो-तीन कतार ज्वार के बोने से इसका प्रकोप ज्वार पर ही ज्यादा रहता है। ज्वार को ट्रेप के रूप में काम में लिया जाना चाहिये।
  • खेत की समस्त पालियों एवं धोरों पर मिथाइल पेराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण का भुरकाव 25 किलो प्रति हेक्टेयर के हिसाब से करना चाहिये। इसके अतिरिक्त क्लोरोपायरीफॉस 1.25 ली या प्रोफेनाफोस 1.25 ली. या डायक्लोरोवॉस 1 ली. प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

मक्का तना भेदक- छोटे लार्वा मक्का, बाजरा, ज्वार, गन्ना आदि की पत्तियों को खुरच कर खाते हैं। और फिर तने में सुराख करके प्रवेश कर जाते हैं। छोटे पौधों का बढऩे वाला सिरा मर जाता है।

  • नियंत्रण हेतु पौधे के कीटग्रस्त भाग को जलाकर नष्ट कर दें।

फसल बुवाई के 15 से 30 दिन के भीतर फोरेट 10 जी या कार्बोफ्यूरान 3 जी 7-8 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से पौधों के पोरों में डालें अथवा कार्बोरिल 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण 2 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकें।

  • प्रतिरोधी किस्मों का चयन कर उनकी बुवाई करें।
  • मक्का से साथ अन्तरास्य के रूप में चंवला (4:1) बोयें।
  • शकुंतला पालीवाल

 

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