टीकमगढ़: मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए चलाया गया विशेष अभियान
22 अप्रैल 2026, टीकमगढ़: टीकमगढ़: मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए चलाया गया विशेष अभियान – कृषि विज्ञान केंद्र टीकमगढ़ द्वारा भूमि सुपोषण एवं संरक्षण राष्ट्रव्यापी जन अभियान का औपचारिक शुभारंभ विगत दिनों किया गया । बता दें कि केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने 19 मार्च 2026 को महाराष्ट्र के अमलनेर स्थित श्री मंगलग्रह मंदिर से इस राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत की थी । टीकमगढ़ जिले में 19 मार्च से 19 अप्रैल 2026 तक विशेष अभियान से चलाया गया है। यह अभियान केंद्र के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ बी.एस. किरार के मार्गदर्शन में सुचारित रूप से डॉ. एस. के. जाटव एवं डॉ. आई.डी.सिंह द्वारा संचालित किया गया।
केंद्र के प्रमुख डॉ. बी.एस. किरार द्वारा किसान संगोष्ठी दौरान बताया गया की भारतीय संस्कृति में भूमि को मात्र मिट्टी नहीं, बल्कि माता माना गया है। अथर्ववेद के भूमि सूक्त में स्पष्ट कहा गया है, माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः अर्थात भूमि मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। आज के आधुनिक युग में रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग और दोषपूर्ण कृषि पद्धतियों के कारण यह माता कुपोषित और बीमार हो गई है। इसी संकट को दूर करने के लिए भारत में भूमि सुपोषण एवं संरक्षण राष्ट्रव्यापी जन अभियान की शुरुआत की गई है। इसको जिले भर चलाया गया है।
इस अभियान के तहत जिले भर में चलाये जा रहे कार्यक्रमो के नोडल अधिकारी डॉ. आई. डी. सिंह द्वारा बताया किया गया कि इस अभियान का प्राथमिक लक्ष्य रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग को कम करना और किसानों को प्राकृतिक खेती और जैविक खेती को प्रति प्रोत्साहित करना है। इस अभियान की शुरुआत जिले के अलग अलग गाँवों में भूमि पूजन और भूमि वंदन के साथ हुई। इसमें वैज्ञानिक किसानों के साथ खेतों पर जाकर पूजा करते हैं और धरती माता के संरक्षण का संकल्प लेते हैं। डॉ. सिंह द्वारा किसानों को मिट्टी परीक्षण करवाने के लिए गाँवों में संगोष्ठियाँ आयोजित की जा रही हैं, जहाँ किसानों को मृदा परीक्षण और जैविक खाद के उपयोग का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
केंद्र के वैज्ञानिक डॉ.सुनील कुमार जाटव द्वारा बताया गया की बीते कुछ दशकों में हरित क्रांति के बाद पैदावार बढ़ाने के चक्कर में हमने मिट्टी के स्वास्थ्य की अनदेखी की जिससे मिट्टी की उर्वरता में गिरावट हुई हैं और रासायनिक खादों ने मिट्टी के सूक्ष्म जीवों और मित्र कीटों को नष्ट कर दिया है। इसके साथ-साथ मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ा हैं और मिट्टी विषैली हो गयी हैं, तो उससे उत्पन्न अन्न भी विषैला होगा, जिससे कैंसर और किडनी जैसी गंभीर बीमारियाँ बढ़ रही हैं और देखा गया हैं की भूमि की जल धारण क्षमता में कमी हुई हैं जिससे कुपोषित मिट्टी पानी को सोखने की क्षमता खो देती है, जिससे भू-जल स्तर गिर रहा है। इसका असर मिट्टी को बंजर होने की संभाबना अधिक हो गई हैं लगभग 30ः भारतीय भूमि अवनति की श्रेणी में आ चुकी है, जिसे बचाना विकसित भारत 2047 के लक्ष्य है। केंद्र के जयपाल छिंगरहा द्वारा किसान भाईयो को बताया की गेहूं की नरवाई न जलाये जिससे फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उन्हें मिट्टी में ही सड़ाकर खाद बनाना, जिससे मित्र कीट सुरक्षित रहें। भूमि को स्वस्थ रखने के लिये फसल चक्र अपनाये जिससे मिट्टी के पोषक तत्वों को संतुलित रखना हैं।
केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. एस. के. सिंह दवारा इस अभियान की शुरुआत भूमि पूजन से करने का उद्देश्य किसानों को अपनी मिट्टी के प्रति श्रद्धा भाव से जोड़ना है। जब किसान अपने खेत की मिट्टी को तिलक लगाता है और उसकी पूजा करता है, तो वह उसे निर्जीव वस्तु के बजाय एक जीवंत इकाई के रूप में देखता है। यह संकल्प उसे रासायनिक जहर छोड़कर प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। इस अभियान सार यह की मिट्टी केवल धूल नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। भूमि सुपोषण अभियान के माध्यम से भारत अपनी प्राचीन कृषि संस्कृति और आधुनिक विज्ञान का समन्वय कर रहा है। यदि हमारी मिट्टी स्वस्थ होगी, तभी हमारा भोजन शुद्ध होगा और आने वाली पीढ़ियाँ निरोगी रहेंगी। यह अभियान स्वस्थ धरा, खेत हरा के मंत्र को साकार करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इस अभियान में केंद्र के वैज्ञानिक डॉ आर. के. प्रजापति, डॉ. यू.एस धाकड़ एव हंसनाथ खान की विशेष योगदान रहा हैं।
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