भारतीय कृषि की अनदेखी शक्ति: महिला किसान-खेत से खाद्य सुरक्षा तक विकास की आधारशिला
लेखक: शशि मीणा¹, सुकुमार तरिया², ¹ पादप कार्यिकी संभाग, आईसीएआर -भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली–110012, ² आईसीएआर -केंद्रीय कृषि वानिकी अनुसंधान संस्थान, झाँसी, उत्तर प्रदेश–284003
25 जून 2026, भोपाल: भारतीय कृषि की अनदेखी शक्ति: महिला किसान-खेत से खाद्य सुरक्षा तक विकास की आधारशिला –
भूमिका
भारत की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और ग्रामीण जीवन में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। देश की एक बड़ी आबादी आज भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि एवं उससे संबंधित गतिविधियों पर निर्भर है। कृषि केवल खाद्यान्न उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि आजीविका, पोषण सुरक्षा और ग्रामीण विकास का आधार भी है। इस व्यापक कृषि व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होने के बावजूद लंबे समय तक अपेक्षित पहचान प्राप्त नहीं कर सकी है। ग्रामीण भारत में महिलाएँ खेती-किसानी से जुड़े लगभग सभी कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभाती हैं। बीज चयन, रोपाई, निराई-गुड़ाई, फसल कटाई, भंडारण, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन तथा खाद्य प्रसंस्करण जैसे कार्यों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके साथ ही वे परिवार की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी योगदान देती हैं। कृषि और ग्रामीण आजीविका के संचालन में उनकी यह बहुआयामी भागीदारी भारतीय कृषि व्यवस्था को मजबूती प्रदान करती है।
पिछले कुछ दशकों में कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन देखने को मिले हैं। रोजगार और बेहतर आय की तलाश में ग्रामीण पुरुषों के शहरों की ओर बढ़ते पलायन के कारण खेती की जिम्मेदारियाँ महिलाओं पर अधिक केंद्रित हुई हैं। परिणामस्वरूप, महिलाएँ अब केवल कृषि श्रमिक के रूप में ही नहीं, बल्कि खेतों के प्रबंधन और कृषि संबंधी निर्णयों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इस प्रवृत्ति को कृषि का स्त्रीकरण (Feminisation of Agriculture) कहा जाता है, जो भारतीय कृषि के बदलते स्वरूप को दर्शाती है। हालाँकि कृषि में महिलाओं का योगदान व्यापक और बहुआयामी है, फिर भी उन्हें भूमि स्वामित्व, संस्थागत ऋण, तकनीकी प्रशिक्षण, कृषि विस्तार सेवाओं तथा बाजार तक पहुँच जैसी सुविधाओं में अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। भूमि के स्वामित्व का अभाव उन्हें औपचारिक रूप से किसान की पहचान प्राप्त करने से भी वंचित कर देता है। परिणामस्वरूप, उनकी भूमिका और योगदान के अनुरूप सामाजिक तथा आर्थिक सशक्तिकरण अभी भी एक चुनौती बना हुआ है।
वर्तमान में महिला किसानों के सशक्तिकरण के लिए विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास किए जा रहे हैं। स्वयं सहायता समूह, किसान उत्पादक संगठन, डिजिटल कृषि सेवाएँ तथा महिला-केंद्रित विकास कार्यक्रम ग्रामीण महिलाओं को उद्यमिता, नेतृत्व और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं। इसके अतिरिक्त, संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2026 को ‘अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष’ घोषित किया जाना इस बात का संकेत है कि वैश्विक स्तर पर कृषि और खाद्य सुरक्षा में महिलाओं की भूमिका को नई पहचान और महत्व मिल रहा है। जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा और सतत कृषि विकास जैसी उभरती चुनौतियों के संदर्भ में महिला किसानों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए आवश्यक है कि उन्हें कृषि विकास की मुख्यधारा में समान भागीदार के रूप में स्थान दिया जाए तथा संसाधनों, तकनीकों और अवसरों तक उनकी पहुँच सुनिश्चित की जाए। महिला किसानों का सशक्तिकरण न केवल लैंगिक समानता का प्रश्न है, बल्कि एक समावेशी, टिकाऊ और समृद्ध कृषि व्यवस्था के निर्माण की अनिवार्य शर्त भी है।
कृषि का बदलता परिदृश्य और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी
भारतीय कृषि में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है और आज वे कृषि क्षेत्र की एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभर रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से पुरुषों के रोजगार की तलाश में शहरों की ओर बढ़ते पलायन ने कृषि कार्यों की जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा महिलाओं के कंधों पर ला दिया है। परिणामस्वरूप, महिलाएँ अब केवल सहयोगी श्रमिक की भूमिका तक सीमित नहीं हैं, बल्कि खेती के प्रबंधन और निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी सक्रिय रूप से शामिल हो रही हैं। इस परिवर्तन को कृषि के स्त्रीकरण के रूप में देखा जा रहा है, जिसने ग्रामीण कृषि व्यवस्था को एक नया स्वरूप प्रदान किया है। वर्तमान समय में महिलाएँ कृषि उत्पादन की लगभग पूरी श्रृंखला में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। बीज चयन, पौध तैयार करना, रोपाई, निराई-गुड़ाई, कटाई, भंडारण तथा फसलोपरांत प्रबंधन जैसे कार्यों में उनकी भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, मुर्गी पालन, मत्स्य पालन और बागवानी जैसी सहायक गतिविधियों में भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय है। इन विविध कार्यों के माध्यम से वे न केवल कृषि उत्पादन को बनाए रखती हैं, बल्कि परिवार की आय और आजीविका को भी सुदृढ़ बनाती हैं। महिलाओं का योगदान खेतों की सीमाओं से कहीं आगे तक विस्तृत है। वे परिवार की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने, कृषि ज्ञान के संरक्षण तथा प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वास्तव में, यदि कृषि को ग्रामीण जीवन की धुरी माना जाए, तो महिलाएँ उस धुरी को गतिशील बनाए रखने वाली शक्ति हैं, जिनके श्रम, अनुभव और समर्पण पर भारतीय कृषि का एक बड़ा हिस्सा निर्भर करता है।
खाद्य एवं पोषण सुरक्षा की संरक्षक
भारतीय कृषि में महिलाओं की भूमिका केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि वे खाद्य एवं पोषण सुरक्षा की महत्वपूर्ण संरक्षक भी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएँ लंबे समय से स्थानीय बीजों, पारंपरिक फसल किस्मों और कृषि जैव विविधता के संरक्षण का कार्य करती रही हैं। मौसम और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बीजों का चयन तथा उनका संरक्षण ग्रामीण कृषि ज्ञान की एक महत्वपूर्ण धरोहर है, जिसे महिलाओं ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोकर रखा है। जलवायु परिवर्तन के वर्तमान दौर में यह पारंपरिक ज्ञान और अधिक प्रासंगिक हो गया है। मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, जल संरक्षण करने, मिश्रित खेती अपनाने तथा प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग जैसी टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने में महिलाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उनके अनुभव और स्थानीय ज्ञान से कृषि प्रणालियों को अधिक लचीला और पर्यावरण-अनुकूल बनाने में सहायता मिलती है। पोषण सुरक्षा के क्षेत्र में भी महिलाओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। परिवार के भोजन की योजना बनाने से लेकर पोषक फसलों, फल-सब्जियों और दुग्ध उत्पादों के उपयोग तक अनेक निर्णय महिलाओं द्वारा लिए जाते हैं। इस प्रकार वे केवल भोजन उपलब्ध कराने तक ही सीमित नहीं रहतीं, बल्कि परिवार के स्वास्थ्य, पोषण स्तर और जीवन गुणवत्ता को बेहतर बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए महिलाओं को कृषि और पोषण के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाता है।
कृषि अर्थव्यवस्था में महिलाओं का योगदान
ग्रामीण भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। खेतों में श्रम करने के साथ-साथ वे पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, बागवानी तथा कृषि-आधारित लघु उद्यमों के संचालन में भी सक्रिय भागीदारी निभाती हैं। देश के डेयरी क्षेत्र की प्रगति में ग्रामीण महिलाओं का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। पशुओं की देखभाल, चारे की व्यवस्था, दुग्ध उत्पादन तथा दूध के संग्रहण जैसे कार्यों की प्रमुख जिम्मेदारी प्रायः महिलाएँ ही संभालती हैं। पिछले कुछ वर्षों में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और अधिक मजबूत हुई है। संगठित प्रयासों के बल पर वे खाद्य प्रसंस्करण, जैविक उत्पाद निर्माण, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, फूलों की खेती तथा अन्य कृषि-आधारित उद्यमों में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर रही हैं। इन गतिविधियों ने न केवल परिवारों की आय में वृद्धि की है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी सृजित किए हैं। महिलाओं की यह भागीदारी कृषि उत्पादन तक सीमित नहीं है; वे स्थानीय बाजारों को सशक्त बनाने, ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने और सामुदायिक विकास की प्रक्रिया को गति देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इस प्रकार महिला किसान आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था की एक सशक्त प्रेरक शक्ति के रूप में उभर रही हैं।
चुनौतियाँ: योगदान अधिक, पहचान कम
भारतीय कृषि में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी निर्विवाद है, फिर भी उनके सामने अनेक सामाजिक, आर्थिक और संस्थागत चुनौतियाँ मौजूद हैं। कृषि कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान देने के बावजूद उन्हें अक्सर संसाधनों, निर्णयों और अवसरों तक समान पहुँच प्राप्त नहीं हो पाती। सबसे बड़ी चुनौती भूमि पर स्वामित्व की है। अधिकांश कृषि भूमि पुरुषों के नाम दर्ज होने के कारण महिलाएँ औपचारिक रूप से किसान की पहचान प्राप्त नहीं कर पातीं। इसका सीधा प्रभाव उनकी ऋण, बीमा, किसान क्रेडिट कार्ड तथा अन्य सरकारी योजनाओं तक पहुँच पर पड़ता है। भूमि अधिकारों की कमी उनकी आर्थिक स्वतंत्रता और निर्णय क्षमता को भी सीमित करती है। तकनीकी ज्ञान और आधुनिक कृषि प्रशिक्षण तक पहुँच भी महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण बाधा है। कृषि विस्तार कार्यक्रमों और वैज्ञानिक सलाह सेवाओं में उनकी भागीदारी अपेक्षाकृत कम रहती है, जिससे वे नई तकनीकों और नवाचारों का पूरा लाभ नहीं उठा पातीं। इसके अतिरिक्त कई क्षेत्रों में समान कार्य के लिए महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम पारिश्रमिक मिलता है, जो लैंगिक असमानता की निरंतर बनी हुई समस्या को दर्शाता है। ग्रामीण महिलाओं के सामने एक और बड़ी चुनौती दोहरी जिम्मेदारी की है। खेतों में श्रम करने के साथ-साथ घरेलू कार्यों, बच्चों के पालन-पोषण और परिवार के बुजुर्गों की देखभाल का दायित्व भी प्रायः उन्हीं के कंधों पर होता है। इतना ही नहीं, कृषि संबंधी महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी भागीदारी अक्सर सीमित रहती है, जबकि उनके पास स्थानीय परिस्थितियों और खेती का व्यापक अनुभव होता है।
डिजिटल कृषि: नए अवसरों की ओर
सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के विस्तार ने महिला किसानों के लिए नए अवसरों के द्वार खोले हैं। स्मार्टफोन, इंटरनेट और डिजिटल सेवाओं की उपलब्धता ने उन्हें मौसम पूर्वानुमान, बाजार मूल्य, सरकारी योजनाओं और कृषि सलाह से जोड़ना शुरू किया है। आज अनेक महिलाएँ मोबाइल आधारित एप्लिकेशनों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों के माध्यम से खेती से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त कर रही हैं। आने वाले समय में ड्रोन, सटीक कृषि, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सलाह सेवाएँ और डिजिटल विपणन मंच महिला किसानों को कृषि के आधुनिक स्वरूप से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि उन्हें तकनीकी प्रशिक्षण और डिजिटल साक्षरता के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जाएँ।
स्वयं सहायता समूहों से सशक्तिकरण की राह
महिला स्वयं सहायता समूहों ने ग्रामीण भारत में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का एक सफल मॉडल प्रस्तुत किया है। इन समूहों के माध्यम से महिलाएँ बचत, ऋण, उत्पादन और विपणन गतिविधियों में संगठित रूप से भागीदारी कर रही हैं। कई राज्यों में महिलाएँ जैविक खेती, खाद्य प्रसंस्करण, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन और अन्य कृषि-आधारित उद्यमों का सफल संचालन कर रही हैं। इन समूहों ने महिलाओं को केवल आय अर्जित करने का अवसर ही नहीं दिया, बल्कि उनमें नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास और सामूहिक निर्णय लेने की शक्ति भी विकसित की है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में महिला किसानों की भूमिका
बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, सूखा और बाढ़ जैसी जलवायु संबंधी चुनौतियाँ कृषि क्षेत्र को प्रभावित कर रही हैं। इन परिस्थितियों का सबसे अधिक प्रभाव छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ता है, जिनमें महिलाओं की भागीदारी उल्लेखनीय है। ऐसे समय में जल संरक्षण, जैविक खेती, फसल विविधीकरण और जलवायु-स्मार्ट कृषि तकनीकों को अपनाने में महिला किसान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। महिलाओं के पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय संसाधनों के कुशल प्रबंधन की क्षमता को आधुनिक तकनीकों के साथ जोड़कर कृषि को अधिक टिकाऊ और जलवायु-अनुकूल बनाया जा सकता है।
कृषि का भविष्य और महिला सशक्तिकरण
भारतीय कृषि के सतत विकास में महिलाओं की भागीदारी को सुदृढ़ बनाना अत्यंत आवश्यक है। उन्हें भूमि अधिकार, वित्तीय सेवाओं, तकनीकी प्रशिक्षण, डिजिटल संसाधनों और बाजार तक समान पहुँच प्रदान करके कृषि क्षेत्र में उनकी भूमिका को और प्रभावी बनाया जा सकता है। महिला किसानों का सशक्तिकरण केवल सामाजिक न्याय का विषय नहीं, बल्कि कृषि उत्पादकता, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण विकास की आधारभूत आवश्यकता है। जब महिलाएँ कृषि व्यवस्था में समान भागीदार बनेंगी, तभी कृषि क्षेत्र की वास्तविक क्षमता का पूर्ण उपयोग संभव हो सकेगा।
निष्कर्ष
भारतीय कृषि की सफलता में महिलाओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुआयामी है। वे केवल कृषि कार्यों में सहयोग करने वाली श्रमिक नहीं, बल्कि उत्पादन, पोषण, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और ग्रामीण आजीविका की सशक्त आधारशिला हैं। खेती-किसानी से लेकर पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण और परिवार की पोषण सुरक्षा तक उनकी सक्रिय भागीदारी कृषि प्रणाली को मजबूती प्रदान करती है। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, संसाधनों की कमी और कृषि क्षेत्र की नई चुनौतियों के बीच महिला किसानों की भूमिका और अधिक प्रासंगिक हो गई है। इसलिए आवश्यक है कि उन्हें भूमि, ऋण, तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार तक समान पहुँच उपलब्ध कराई जाए। जब महिलाएँ कृषि विकास की प्रक्रिया में पूर्ण भागीदारी के साथ आगे बढ़ेंगी, तब न केवल उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी, बल्कि भारतीय कृषि भी अधिक उत्पादक, टिकाऊ और समावेशी बन सकेगी। महिला किसानों का सशक्तिकरण वास्तव में ग्रामीण समृद्धि, खाद्य सुरक्षा और सतत विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture

