गेहूं की नई किस्म पूसा अहिल्या (एच.आई.1634 ) एक हेक्टेयर में 70 क्विंटल उत्पादन देती है

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26 सितंबर 2020, इंदौर। गेहूं की नई किस्म पूसा अहिल्या (एच.आई.1634 ) एक हेक्टेयर में 70 क्विंटल उत्पादन देती है  भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान,क्षेत्रीय केंद्र इंदौर द्वारा गेहूं की दो नई किस्में पूसा वानी (एच.आई .1633 ) और पूसा अहिल्या (एच.आई.1634 ) विकसित की गई है .जो चपाती के लिए उपयुक्त है.इन किस्मों के विकास में डॉ. एस.वी. साई प्रसाद और वैज्ञानिक श्री जंगबहादुर सिंह का योगदान रहा है.

इस बारे में भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान,क्षेत्रीय केंद्र इंदौर के प्रमुख डॉ.एस.वी. साई प्रसाद ने  इन दोनों नई प्रजातियों के बारे में कृषक जगत को बताया कि इन दोनों प्रजातियों को अगस्त  में आयोजित अखिल भारतीय गेहूं एवं जौ शोध कार्यशाला में चिन्हित किया गया है.इन दोनों प्रजातियों की विशेषताएं इस प्रकार हैं –

पूसा अहिल्या (एच.आई .1634 ) : इस प्रजाति को मध्य भारत के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र म.प्र., छ.ग., गुजरात ,झाँसी एवं उदयपुर डिवीजन के लिए देर से बुवाई सिंचित अवस्था में अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए चिन्हित किया गया है .पूसा अहिल्या की औसत उत्पादन क्षमता 51.6 क्विंटल /हेक्टेयर और अधिकतम उत्पादन क्षमता 70.6  क्विंटल/हेक्टेयर है .यह प्रजाति  काले /भूरे रतुआ रोग अवरोधी होने के साथ ही इसमें करनाल बंट रोग की प्रतिरोधक क्षमता भी है . इसका दाना बड़ा, कठोर , चमकदार और प्रोटीनयुक्त है.चपाती भी गुणवत्ता से परिपूर्ण है .

पूसा वानी (एच.आई .1633 ) :  इसे प्रायद्वीपी क्षेत्र (महाराष्ट्र और कर्नाटक) में देर से बुवाई और सिंचित अवस्था में उत्पादन हेतु चिन्हित किया गया है .पूसा वानी की औसत उत्पादन क्षमता 41.7 क्विंटल /हेक्टेयर और अधिकतम उत्पादन क्षमता 65 .8 क्विंटल /हेक्टेयर है.यह किस्म प्रचलित एच.डी.2992 से 6 .4 % अधिक उपज देती है .यह प्रजाति काले और भूरे रतुआ रोग से पूर्ण अवरोधी और है और कीटों का प्रकोप भी नगण्य है .इसकी चपाती की गुणवत्ता इसलिए उत्तम है ,क्योंकि इसमें प्रोटीन 12.4 %, लौह तत्व 41 .6 पीपीएम  और ज़िंक तत्व 41.1 पीपीएम  होकर पोषक तत्वों से भरपूर है .वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि दोनों प्रजातियां अपनी गुणवत्ता और उच्च  उत्पादन क्षमता के कारण किसानों के लिए वरदान साबित होगी और एक अच्छा विकल्प बनेगी.

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