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किसानों की सफलता की कहानी (Farmer Success Story)राज्य कृषि समाचार (State News)

जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम से खेती कर प्रेरणास्रोत बने श्री किशोर पवार

23 फरवरी 2026, छिन्‍दवाड़ा: जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम से खेती कर प्रेरणास्रोत बने श्री किशोर पवार – मध्यप्रदेश शासन द्वारा किसानों की आय में वृद्धि, उत्पादन लागत में कमी तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के उद्देश्य से विभिन्न नवाचार आधारित कृषि योजनाएं संचालित की जा रही हैं। बदलते जलवायु परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए शासन ने कृषि विभाग के माध्यम से जिला स्तर पर जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रमों को प्रभावी रूप से लागू किया है।

इन्हीं प्रयासों के परिणामस्वरूप जिला छिंदवाड़ा के विकासखंड मोहखेड़ के ग्राम कामठी के प्रगतिशील किसान श्री किशोर पवार ने कृषि विभाग एवं बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया ( बीसा) के वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में जलवायु अनुकूल तकनीकों को अपनाकर उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। उन्होंने जीरो टिलेज एवं अवशेष प्रबंधन जैसी आधुनिक पद्धतियों को अपनाते हुए कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त कर यह सिद्ध किया है कि शासन की योजनाओं का समुचित लाभ लेकर खेती को लाभकारी एवं टिकाऊ बनाया जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन की चुनौती और नई दिशा- विगत वर्षों में असमय वर्षा, अनियमित मौसम तथा प्राकृतिक विपरीत परिस्थितियों ने कृषि कार्य को प्रभावित किया है। पारंपरिक खेती पद्धतियों में लागत अधिक और जोखिम भी अधिक था। ऐसे समय में कृषि विभाग, छिंदवाड़ा द्वारा किसानों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण प्रदान किया गया तथा बीसा के वैज्ञानिकों ने खेत स्तर पर मार्गदर्शन उपलब्ध कराया। श्री किशोर पंवार ने इस प्रशिक्षण को गंभीरता से अपनाया। उनका मानना है कि “पहले हम वही करते थे जो वर्षों से चलता आ रहा था, लेकिन जब मौसम बदल गया है तो खेती का तरीका भी बदलना जरूरी है।”

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न पराली जलाई, न खेत जोता फिर भी भरपूर फसल– धान कटाई के पश्चात सामान्यतः पराली जलाई जाती है या खेत की गहरी जुताई की जाती है, जिससे लागत बढ़ती है और पर्यावरण प्रदूषित होता है। श्री पवार ने शासन की मंशा के अनुरूप पराली नहीं जलाई और बिना जुताई किए जीरो टिलेज मशीन से DBW-303 गेहूँ की बुवाई की। पराली को खेत में ही रहने दिया गया, जिससे मिट्टी की नमी संरक्षित रही और जैविक उर्वरता में वृद्धि हुई। इस निर्णय से प्रति एकड़ लगभग ₹2,000 से ₹3,000 तक की बचत हुई। वे कहते हैं कि “पहले पराली जलाते थे तो धुएँ से आँखों में आँसू आ जाते थे। इस बार न धुआँ उठा, न आँसू आए… बस खेत में हरियाली आई।”

 बारिश ने रोका, जीरो टिलेज ने बचाया – इस वर्ष बुवाई के समय अप्रत्याशित वर्षा के कारण खेतों में अधिक नमी बनी रही। पारंपरिक पद्धति में खेत सूखने की प्रतीक्षा करनी पड़ती और बुवाई में विलंब होता। किंतु जीरो टिलेज तकनीक के माध्यम से बिना खेत सुखाए समय पर बुवाई संभव हुई। समय पर बुवाई का सीधा लाभ उत्पादन में दिखाई दिया। फसल की बढ़वार उत्कृष्ट रही, बालियां लंबी निकलीं और दाने भरे हुए प्राप्त हुए।

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जब बीज दिखा तो लोगों ने मज़ाक उड़ाया–  जीरो टिलेज से बुवाई के बाद कुछ बीज सतह पर दिखाई दे रहे थे। इसे देखकर कुछ ग्रामीणों ने संदेह व्यक्त किया और रोटावेटर चलाने की सलाह दी। लेकिन श्री पवार ने वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन पर विश्वास रखा और निर्णय नहीं बदला।
 कुछ ही दिनों में खेत हरे-भरे पौधों से लहलहा उठा। सफल परिणाम देखकर वही किसान नई तकनीक अपनाने के लिए उत्सुक हो गए।

पहले और अब  जमीन खुद बता रही है फर्क – पूर्व में छिड़काव विधि से बुवाई करने पर बीज की मात्रा अधिक लगती थी और पानी की खपत भी ज्यादा होती थी। जीरो टिलेज तकनीक से कतारबद्ध एवं उचित गहराई पर बुवाई होने से बीज की बचत हुई, सिंचाई कम लगी और पौधों की जड़ें मजबूत विकसित हुईं। श्री पवार के अनुसार- “पहले लगता था खेत पानी पी ही नहीं रहा, अब कम पानी में भी फसल हरी-भरी रहती है।”

शासन एवं प्रशासन के समन्वित प्रयास का परिणाम-  श्री किशोर पवार की सफलता मध्यप्रदेश शासन की किसान हितैषी नीतियों, कृषि विभाग छिंदवाड़ा के सतत मार्गदर्शन तथा बीसा के वैज्ञानिक सहयोग का प्रत्यक्ष परिणाम है। जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम ने जिले में वैज्ञानिक खेती की दिशा में सकारात्मक वातावरण निर्मित किया है। आज उनका खेत अन्य किसानों के लिए प्रेरणा केंद्र बन गया है। अनेक कृषक जीरो टिलेज एवं पराली प्रबंधन को अपनाने के लिए आगे आ रहे हैं।  “खेती बदलने से डर लगता है, पर सही मार्गदर्शन मिल जाए तो परिणाम उम्मीद से बेहतर होते हैं।”

श्री किशोर पवार की सफलता यह सिद्ध करती है कि शासन की योजनाओं, प्रशासनिक सहयोग और वैज्ञानिक तकनीकों के समन्वय से कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। यह कहानी न केवल छिंदवाड़ा जिले बल्कि सम्पूर्ण मध्य प्रदेश के किसानों के लिए प्रेरणास्रोत है और जलवायु अनुकूल कृषि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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