मल्टीनेशनल कंपनियां छोड़कर बना मूर्तिकार
एक शिल्पकार की कहानी, उसी की जुबानी

22 अप्रैल 2021, होशंगाबाद । मल्टीनेशनल कंपनियां छोड़कर बना मूर्तिकार – मेरा नाम सुधीर रघुवंशी है I मैं होशंगाबाद, जो कि एक कस्बाई शहर की हैसियत रखता है का निवासी हूँ I वर्तमान में मैं एक मूर्ति शिल्पकार के रूप में अपने पुराने शौक को व्यवसाय का रूप देने की कोशिश कर रहा हूँ I अतीत में मैंने इस क्षेत्र में आने के पूर्व अपना जीवन एक शिक्षक के रूप में शुरू किया I बाद में एम. बी. ए करने के उपरांत बहुराष्ट्रीय संस्थाओं में सेवाएं प्रदान की I रेखांकन एवं चित्रकला में मेरा बचपन से ही रुझान था परंतु मूर्ति शिल्प कभी किया नहीं था I 2 वर्ष पूर्व कुछ ऐसी परिस्थितियां बनी की नौकरी को तिलांजलि देकर कला क्षेत्र में प्रवेश करने का विचार बना I भोपाल के भारत भवन कला संग्रहालय में 1 सप्ताह की कार्यशाला में उपस्थिति दर्ज कराई जहां भारत भवन एवं मणिपुर के कलाकारों के साथ कार्य करने का अवसर मिला I इस कार्यशाला में सभी का उत्साहवर्धक आकलन , और अवलोकन कुशलता, शिल्प कारीगर पर पकड़ की प्रशंसा मिली I फल स्वरुप मैंने एक माह तक भारत भवन के कलाकारों को साथ कार्य कर अपनी मूर्ति शिल्प के कौशल को विकसित किया I उपरांत मुझे लगा कि अपने शौक को व्यवसाय में बदलने के बारे में गंभीर हुआ जाए I इस बीच कोरोना काल के दौरान मुझे सोचने और इस क्षेत्र में काम करने का और अवसर मिला I परिणाम यह निकला कि अपने मूल व्यवसाय को छोड़कर कुछ नया करने का मन मैंने बना लिया I

जीवन की आपाधापी में कई बार हम अपनी अभिरुचि छोड़कर व्यवसाय को हावी पाते हैं I लगा कि अब समय आ गया है कि मैं अपनी अभिरुचि को व्यवसाय के रूप में अपनाI इस संबंध में मुझे लोगों का समय समय पर प्रोत्साहन भी मिल रहा था I मैंने गांधी जी के मूर्ति शिल्प से शुरुआत की जिसे पर्याप्त सराहना मिली I
फल स्वरुप मैंने गांधीजी के शिल्प पर ही कार्य जारी रखा I वर्तमान में विभिन्न शालाओं एवं संस्थानों में मेरे बनाए हुए गांधी शिल्प स्थापित है I खादी ग्रामीण उद्योग एवं पॉलिटेक्निक कॉलेज भोपाल केंद्रीय विद्यालय जबलपुर एवं संस्था अन्य संस्थानों में भी शिल्प स्थापित हैं I
वर्तमान में इस शिल्पकला के लिए जो माध्यम हैं I उनमें पेपरमेशी और फाइबर ग्लास पेपर पर्यावरण के अनुकूल माध्यम हैं I हालांकि कुछ में कागज की लुगदी बनाकर सिर्फ निर्माण होता है इसके साथ ही फाइबरग्लास पर भी कार्य कर रहा हूं I यह माध्यम हल्का एवं टिकाऊ है , इसकी उम्र भी अधिक होती है और यह स्थापना के लिए उपयुक्त होते हैं I इन पर मौसम धूप पानी का भी असर नहीं होता तथा पर्यावरण के लिए भी उचित हैं I इनकी निर्माण प्रक्रिया में मिट्टी के प्रतिरूप बनाना एक मुख्य चरण है जो भी मूर्ति बनाना हो उसे पहले मिट्टी की मूर्ति के सांचे में डालना पड़ता है I तत्पश्चात उसका मोल्ड बनाया जाता है I बाद में मोल्ड में प्लास्टर या पेरिस की धातु या पेपर में से या फाइबरग्लास की ढलाई करके मूर्ति शिल्प तैयार करना होता हैI
इसे उसका रंग का एवं उचित रूप से बारीकी पूर्वक अंतिम कलाकृति में विकसित करना कठिन प्रक्रिया होती है I पर यह एक स्वर्गीय सुख का अहसास देता है मैं इस व्यवसाय में आगे बढ़ना चाहता हूं I आने वाली पीढ़ियों को भी जीविकोपार्जन के नए अवसरों से अवगत कराना , भारत का कला के क्षेत्र में एक अवसर जो बढ़ा रहा है उसकी प्रगति में यह एक अच्छा योगदान दे सकता है I

