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राज्य कृषि समाचार (State News)

सोयाबीन में इल्ली और पीला मोजेक का खतरा, शिवपुरी में कृषि विभाग ने जारी की साप्ताहिक सलाह

06 सितंबर 2026, शिवपुरी: सोयाबीन में इल्ली और पीला मोजेक का खतरा, शिवपुरी में कृषि विभाग ने जारी की साप्ताहिक सलाह – मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में कृषि विभाग ने सोयाबीन किसानों के लिए साप्ताहिक सलाह जारी करते हुए कहा है कि फसल पर तंबाकू की इल्ली, सेमीलूपर, चने की इल्ली, बिहार हेयरी कैटरपिलर, गर्डल बीटल और तना मक्खी जैसे कीटों के साथ-साथ पीला मोजेक रोग, एन्थ्रेक्नोज और राइजोक्टोनिया एरियल ब्लाइट जैसी बीमारियों का खतरा बना हुआ है। विभाग ने किसानों से खेतों की नियमित निगरानी करने और लक्षण दिखते ही नियंत्रण के उपाय अपनाने को कहा है।बीते कुछ हफ्तों में हुई बारिश के चलते सोयाबीन के खेतों में नमी ज्यादा बनी हुई है, जो इल्लियों और फफूंद जनित रोगों दोनों के फैलने के लिए अनुकूल मानी जाती है। ऐसे में समय पर पहचान और छिड़काव न होने पर उपज को नुकसान पहुंच सकता है।

इल्लियों के नियंत्रण के लिए दवा और मात्रा

कृषि विज्ञान केंद्रों की सामान्य सिफारिश के मुताबिक हरी सेमीलूपर, तना मक्खी और चक्र भृंग (गर्डल बीटल) के नियंत्रण के लिए क्लोरएन्ट्रानिलिप्रोल 18.5 एससी का 60 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव किया जा सकता है। विकल्प के तौर पर इमामेक्टिन बेंजोएट 1.9 ईसी 170 मिलीलीटर प्रति एकड़ या ब्रोफ्लानिलाइड 300 एससी 20 ग्राम प्रति एकड़ की मात्रा में इस्तेमाल किया जा सकता है।पत्ती खाने वाली इल्लियों जैसे तंबाकू की इल्ली और बिहार हेयरी कैटरपिलर के लिए फ्लूबेंडियामाइड 39.35 एससी को 60 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से छिड़कने की सलाह दी जाती है। सभी छिड़काव के लिए करीब 200 लीटर पानी प्रति एकड़ का इस्तेमाल किया जाता है।खेत में इल्लियों की पहचान के लिए किसान सुबह या शाम के समय पौधों की पत्तियों के नीचे का हिस्सा ध्यान से देखें, क्योंकि ज्यादातर इल्लियां दिन में पत्तियों की छांव में छिपी रहती हैं। शुरुआती अवस्था में कीट कम होने पर हाथ से चुनकर नष्ट करना भी असरदार तरीका माना जाता है।

पीला मोजेक और फफूंद रोगों से बचाव

पीला मोजेक रोग सफेद मक्खी के जरिए फैलता है, इसलिए इसकी रोकथाम के लिए सफेद मक्खी पर नियंत्रण जरूरी है। इसके लिए थायमेथोक्सम + लैम्ब्डा-साइहेलोथ्रिन को 60 मिलीलीटर प्रति एकड़ या बीटा-साइफ्लूथ्रिन + इमिडाक्लोप्रिड को 140 मिलीलीटर प्रति एकड़ की मात्रा में छिड़का जा सकता है। रोग ग्रस्त दिख रहे पौधों को तुरंत उखाड़कर खेत से दूर गड्ढे में दबा देना चाहिए, ताकि रोग आगे न फैले।एन्थ्रेक्नोज और राइजोक्टोनिया एरियल ब्लाइट जैसी फफूंद जनित बीमारियों के लिए टेबुकोनाजोल 25.9 ईसी को 250 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से छिड़का जा सकता है। इसके विकल्प के तौर पर टेबुकोनाजोल+सल्फर मिश्रण 500 ग्राम प्रति एकड़ या पायरोक्लोस्ट्रोबिन 20 डब्ल्यूपी 150 से 200 ग्राम प्रति एकड़ की मात्रा में इस्तेमाल किया जा सकता है।कृषि विशेषज्ञों ने साफ किया है कि किसी भी दवा का इस्तेमाल करने से पहले नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग के कार्यालय से सलाह जरूर लें, क्योंकि खेत की स्थिति और कीट-रोग की गंभीरता के हिसाब से सिफारिश बदल सकती है। छिड़काव करते समय दस्ताने और मास्क जैसे सुरक्षा उपकरण इस्तेमाल करने की भी सलाह दी जाती है।

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