नौकरी छोड़ खेती को बनाया करियर, चिया-किनोवा की खेती से दोगुनी हुई आय; अब 400 किसानों को दे रहे प्रशिक्षण
15 जून 2026, भोपाल: नौकरी छोड़ खेती को बनाया करियर, चिया-किनोवा की खेती से दोगुनी हुई आय; अब 400 किसानों को दे रहे प्रशिक्षण – मध्यप्रदेश राज्य शासन द्वारा किसानों की आय बढ़ाने और पर्यावरण अनुकूल प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के प्रयासों के सकारात्मक परिणाम अब जमीनी स्तर पर दिखाई देने लगे हैं। मंडला जिले के बिछिया विकासखंड अंतर्गत ग्राम घुघरी निवासी प्रगतिशील किसान राजेंद्र सिंह पन्द्रे ने पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर प्राकृतिक खेती और सुपर फूड फसलों के माध्यम से सफलता की नई मिसाल पेश की है।
स्नातकोत्तर (एम.ए.) शिक्षित राजेंद्र सिंह ने नौकरी की राह छोड़कर खेती को अपना करियर बनाया और आज न केवल अपनी आय दोगुनी कर चुके हैं, बल्कि क्षेत्र के सैकड़ों किसानों को भी आधुनिक एवं प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण दे रहे हैं।
कृषि विभाग और आत्मा परियोजना से मिला मार्गदर्शन
शुरुआत में पारंपरिक खेती करने वाले राजेंद्र सिंह ने कृषि विभाग और आत्मा परियोजना के अधिकारियों से संपर्क कर कृषि की नई तकनीकों को समझा। आत्मा योजना के विकासखंड तकनीकी प्रबंधक ओमवीर सिंह रघुवंशी के तकनीकी मार्गदर्शन और नियमित फील्ड विजिट ने उनके खेती के प्रति दृष्टिकोण को बदल दिया। उन्होंने विभाग द्वारा आयोजित विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेकर जैविक खेती, उन्नत बीज चयन, पोषक तत्व प्रबंधन और कीट नियंत्रण की वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी प्राप्त की।
चिया और किनोवा जैसी सुपर फूड फसलों से बढ़ी आमदनी
राजेंद्र सिंह ने पारंपरिक फसलों के साथ-साथ चिया सीड और किनोवा जैसी उच्च मूल्य वाली सुपर फूड फसलों की खेती शुरू की। उन्होंने जीवामृत, जैविक खाद, बहुफसली और मिश्रित खेती प्रणाली को अपनाकर खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी लाई। रासायनिक खादों पर होने वाला खर्च लगभग समाप्त हो गया, जबकि उत्पादन और आय दोनों में वृद्धि दर्ज की गई। प्राकृतिक खेती और नवाचार के इस मॉडल से उनकी कृषि आय में लगभग दोगुनी बढ़ोतरी हुई है।
बायो रिसोर्स सेंटर बना किसानों के लिए प्रेरणा केंद्र
राजेंद्र सिंह की उपलब्धियों को देखते हुए राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत उनके यहां बायो रिसोर्स सेंटर (BRC)की स्थापना की गई है। इस केंद्र के माध्यम से वे स्वयं के उपयोग के साथ-साथ अन्य किसानों को भी जीवामृत, नीमास्त्र जैसे जैविक उत्पाद और कृषि इनपुट उपलब्ध करा रहे हैं।
वर्तमान में वे नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग के तहत मास्टर ट्रेनर के रूप में कार्य कर रहे हैं। वे अपने गांव के लगभग 125 किसानों सहित बिछिया विकासखंड के विभिन्न क्लस्टरों के 300 से अधिक किसानों को प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन देकर आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
कटाई से पहले ही बुक हो जाती है उपज
प्राकृतिक और शुद्ध पद्धति से तैयार की गई उनकी फसलों की बाजार में विशेष मांग है। स्थिति यह है कि उनकी उपज बेचने के लिए मंडी तक नहीं पहुंचती, बल्कि कटाई से पहले ही खरीदारों द्वारा बुक कर ली जाती है। हाल ही में उन्होंने प्राकृतिक पद्धति से उत्पादित गेहूं को 2600 से 2700 रुपये प्रति क्विंटल के प्रीमियम भाव पर बेचा, जो सामान्य बाजार दर से काफी अधिक है।
प्रगतिशील किसान के रूप में हुए सम्मानित
उत्कृष्ट कृषि पद्धतियों को अपनाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में योगदान देने के लिए राजेंद्र सिंह पन्द्रे को आत्मा योजना के तहत प्रगतिशील कृषक के रूप में सम्मानित भी किया जा चुका है। उनकी सफलता में मेहनत, नवाचार, परिवार का सहयोग और शासन की विभिन्न किसान हितैषी योजनाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
युवा किसानों के लिए बने प्रेरणा स्रोत
राजेंद्र सिंह का मानना है कि मेहनत, नवाचार और प्राकृतिक खेती का समन्वय ही सफलता की वास्तविक पहचान है। उनका कहना है कि यदि किसान सही मार्गदर्शन और आधुनिक तकनीकों को अपनाएं तो खेती को आत्मनिर्भरता और समृद्धि का सबसे मजबूत आधार बनाया जा सकता है। आज उनकी सफलता की कहानी मंडला जिले ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के युवा किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है।
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