राज्य कृषि समाचार (State News)

पुसा वकुला (HI-1636) ने बदली किसान की तस्वीर! एक एकड़ में हुआ 18.10 क्विंटल उत्पादन, ₹31 हजार से अधिक का मिला मुनाफा  

25 जुलाई 2026, भोपाल: पुसा वकुला (HI-1636) ने बदली किसान की तस्वीर! एक एकड़ में हुआ 18.10 क्विंटल उत्पादन, ₹31 हजार से अधिक का मिला मुनाफा – मध्य प्रदेश के जनजाति बाहुल्य झाबुआ जिले में गेहूं की बायोफोर्टिफाइड किस्म पुसा वकुला (HI-1636) किसानों के लिए लाभ का सौदा साबित हो रही है। कृषि विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन में इस उन्नत किस्म की खेती करने वाली प्रगतिशील महिला किसान श्रीमती खेतु पिसु ने एक एकड़ में 18.10 क्विंटल गेहूं का उत्पादन लेकर 31 हजार रुपये से अधिक का शुद्ध लाभ अर्जित किया है। उनकी सफलता अब जिले के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है।

कृषि विभाग के मार्गदर्शन में अपनाई उन्नत किस्म

झाबुआ विकासखंड के ग्राम बरोड निवासी श्रीमती खेतु पिसु के पास लगभग 0.90 हेक्टेयर कृषि भूमि है। वे खरीफ मौसम में मक्का, सोयाबीन और कपास, जबकि रबी मौसम में गेहूं, चना और सब्जियों की खेती करती हैं। कृषि विभाग के उन्नत तकनीक प्रदर्शन कार्यक्रम के तहत उन्हें पुसा वकुला (HI-1636) का प्रमाणित बीज उपलब्ध कराया गया। साथ ही आधुनिक खेती की तकनीकों और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया गया।

आधुनिक तकनीकों से बढ़ा उत्पादन

श्रीमती खेतु पिसु ने एक एकड़ क्षेत्र में उन्नत तकनीक, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन, उचित पौध संख्या और वैरायटी रिप्लेसमेंट जैसी आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाकर गेहूं की खेती की। इस खेती पर जुताई, बुवाई, उर्वरक, सूक्ष्म पोषक तत्व, कटाई, गहाई और अन्य कार्यों सहित कुल 17,620 रुपये की लागत आई।

फसल तैयार होने पर उन्हें 18.10 क्विंटल गेहूं का उत्पादन प्राप्त हुआ। 2,625 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिक्री करने पर कुल 47,512 रुपये की आय हुई और 31,892 रुपये का शुद्ध लाभ मिला। इस प्रकार लागत और लाभ का अनुपात 1:1.8 रहा, जो इस किस्म की आर्थिक उपयोगिता को दर्शाता है।

क्यों खास है पुसा वकुला (HI-1636) किस्म?

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार पुसा वकुला (HI-1636) एक बायोफोर्टिफाइड गेहूं की किस्म है, जिसमें सामान्य गेहूं की तुलना में अधिक पोषक तत्व मौजूद होते हैं। इसमें जिंक की मात्रा लगभग 40.4 पीपीएम होती है, जबकि सामान्य गेहूं में यह 30 से 32 पीपीएम के बीच रहती है।

यह किस्म कम सिंचाई में भी बेहतर उत्पादन देने में सक्षम है। इसके अलावा तना और पर्ण रतुआ रोग के प्रति इसकी प्रतिरोधक क्षमता अधिक है, कीट एवं रोगों का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है और फसल गिरने की समस्या भी नहीं आती। कृषि विभाग के अनुसार यह किस्म अन्य प्रचलित गेहूं की किस्मों की तुलना में 10 से 16 प्रतिशत तक अधिक उत्पादन देने की क्षमता रखती है। साथ ही यह चपाती, ब्रेड और बिस्किट निर्माण के लिए भी उपयुक्त मानी जाती है।

दूसरे किसानों के लिए बनी प्रेरणा

श्रीमती खेतु पिसु नियमित रूप से कृषि विभाग द्वारा आयोजित कृषक प्रशिक्षण, संगोष्ठियों और भ्रमण कार्यक्रमों में भाग लेती हैं। उनका कहना है कि किसान यदि प्रमाणित बीज, मृदा स्वास्थ्य कार्ड के अनुसार संतुलित उर्वरकों का उपयोग और आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाएं, तो खेती को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।

उन्होंने विशेष रूप से महिला किसानों से कृषि विभाग की योजनाओं और कार्यक्रमों का अधिक से अधिक लाभ उठाने की अपील की है। उनकी सफलता को देखते हुए आसपास के कई किसान भी अब पुसा वकुला (HI-1636) जैसी बायोफोर्टिफाइड गेहूं की उन्नत किस्म अपनाने के लिए आगे आ रहे हैं। इससे जिले में वैज्ञानिक खेती और पोषक तत्वों से भरपूर गेहूं की खेती को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

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