दर्द के रिश्तों की बुनियाद पर हमारा भविष्य

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दर्द के रिश्तों की बुनियाद पर हमारा भविष्य

देखते- देखते काफी कुछ बदल गया, दो महीने के ही भीतर। रहन-सहन, नाते-रिश्ते, जीवनदृष्टि, जल-थल-नभ का वातावरण। संकट ऐसी कसौटी है जिससे कसकर निकला मनुष्य भविष्य में धोखा नहीं खाता। संकट की पाठशाला से जो सबक लेकर निकलता है उसका भविष्य ज्यादा सुरक्षित और सुनिश्चित होता है। दर्द का रिश्ता उल्लास की नातेदारी से ज्यादा मजबूत होता है। विश्व के जितने भी देश परतंत्रता या अन्य संकटों मुक्त हुए हैं उसकी पृष्ठभूमि में दर्द के रिश्ते की प्रगाढ़ता की ही ताकत रही है। इसलिए जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डा. मोहन भागवत अपने बौद्धिक प्रबोधन में इस संकट के भीतर भी सुअवसर देखने और स्वाभिमानी-स्वावलंबी देश को गढऩे की बात करते हैं तो लगता है कि हमारे सनातन समाज की सांस्कृतिक परंपरा के घनीभूत सूत्रों को हमारे समक्ष रख रहे हैं। यही सूत्र विश्व के भविष्य को भी बचा सकते हैं। हमारी चिंता सनातन से वैश्विक रही है इसलिए हम वसुधैव कुटुम्बकम, सर्वे भवंतु सुखिन: की बात करते हैं।

करोना काल की विपत्ति में फँसे समाज के लिए संघ प्रमुख डा. भागवत के आधे घंटे का बौद्धिक आशा का संचारक रहा है। उन्होंने ऐसी कोई नई बात नहीं कही, जो कही वह सभी के अवचेतन मन में कहीं न कहीं है, संघ प्रमुख ने उसे मुखरता के साथ स्वर दिया है। संघ प्रमुख के बौद्धिक से निकले जो सूत्र सीधे-सीधे हम सब की समझ में आए उनमें से, यह कि वर्तमान के संकट से निपटने के लिए धैर्य, अनुशासन और संयम जरूरी है। हम इस संकट पर विलाप की जगह उसमें सकारात्मकता की गुंजाइश देखें। अपनी जीवन शैली और प्राथमिकताओं को स्वदेश, स्वाभिमान और स्वावलंबन के साथ जोड़ें तथा देश की भावी अर्थव्यवस्था का यही आधार बनाएं।

विगत दो महीनों से हम आत्मविचार कर सकते हैं कि कौन सी वस्तुएं हैं जिसे बाजारवाद ने हमारे ऊपर जबरिया थोप दिया है। इन गैर जरूरी वस्तुओं के प्रति आर्थिक गुलामी से अपन कैसे मुक्त हो सकते हैं। 1990 में उदारीकरण के बाद हमारे जीवन पर बाजार का कब्जा होता गया हम भोगवादी मानसिकता के गुलाम होते गए। यह समय बाहर से न्योती गई इस बाजारू गुलामी के सत्य को समझने का है। संकट और एकांत में मनुष्य के ज्ञानचक्षु खुल जाते हैं उन्हें आज खोलने की जरूरत है। बाजार आज हमें हाँक रहा है। हम क्या खाएं, क्या देखें, सुनें, सोचें कैसे रहें इन सब बातों का नियामक आज बाजार और उपभोगवाद बन गया है। विगत दो महीनों से जिस तरह हमसब जी रहे हैं उससे यह सोचने का अवसर तो मिलता ही है कि हम क्यों बाजार की कठपुतली के तौरपर खुद को बदले दे रहे हैं। इस ओढ़ी हुई गुलामी को उतार फेंकें और उतने में ही गुजारा करने की सोचें जो हमारा अपना है, स्वदेशी है, स्वनिर्मित है।

अपने बौद्धिक में डा. भागवत ने स्वदेशी की उसी बात को आगे बढ़ाने की बात की जिसकी अवधारणा गांधी जी ने हिंद स्वराज’ और ‘मेरे सपनों के भारत में रखी, डाक्टर राममनोहर लोहिया, पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने समय-समय पर अपने लेखन व प्रबोधनों में व्यक्त की थी। स्वदेशी का विचार ही हमारे स्वाभिमानी भविष्य का आधार बन सकता है यह सोचना चाहिए। आज यदि स्वदेशी का प्रादर्श/प्रकल्प हमारे पास होता तो हम इस संकट को भी पहले की भाँति चीटी-मटे के दंश की तरह झेल जाते। हम ज्यादा नहीं साठ के दशक की ओर ही लौटें। देश में आधुनिक संसाधन कुछ भी नहीं थे। सिंचाई, सड़क, बिजली, संचार, परिवहन बहुत ही कम, सिफऱ् शहरों, कस्बों तक सीमित। वैश्विक पैमाने पर दरिद्रता भले ही रही हो पर ग्राम्यसमाज में स्वदेशी का स्वाभाविमान था। हर छोटे से बड़ा गांव अपने आप में आर्थिक इकाई था। इस ग्राम्यसमाज में हर वृत्ति कर्ताओं का बराबरी का योगदान था। गांव का उत्पादन और पूँजी गाँव को तृप्त करने के बाद ही बाहर निकलती थी. पक्के मकान, मोटर गाड़ी, मोबाइल, कुछ नहीं थे लेकिन आदमी खुश था। समाज सन् सरसठ का अकाल झेल गया। शायद ही किसी ने किसानों या मजदूरों के आत्महत्या की खबर सुनी हो। देसी अन्न, देसी मन, देसी पद्धति सब कुछ देसी।

भले ही उत्पादन कम रहा हो लेकिन सबकुछ तृप्ति दायक था। अब इस नई खेती ने हमारे पाँच हजार वर्ष पुराने सहकार को एक झटके में नष्ट कर दिया. जिस सहकार ने गोधन, गोबरधन, गोपाल, कृषि, कृष्ण, किसन, किसान, हलधर जैसे शब्द दिए और समाज ने इनकी दैवीय प्राण प्रतिष्ठा की। बाजार ने हमारी उत्सव धर्मिता को विद्रूप कर दिया, उसके मायने बदल दिए।

आज खेत अन्न उगल रहे हैं लेकिन हर अन्न अपने भीतर एक बीमारी लिए हुए है। बीज डंकल पेटेन्ट. और उसके साथ खरपतवार बोनस में फ्री। उस खरपतवार को मारने वाली दवा बीज से भी मँहगी। कीटपतंगों को मारने वाला पेस्टीसाइड नई भयंकर बीमारियों के साथ हमारे जीवन में घुस गया। अन्न उपजाने वाले पंजाब हरियाणा से दिल्ली-मुंबई जाने वाली रेलगाडिय़ां भाँगड़े का उल्लास नहीं अपितु कैंसर की कराह ढोती हैं। अन्न के उत्पादन का ड्योढ़ा बीमारियों का इलाज खा जाता है। इलाज के उपकरण और दवाई भी वहीं से आयातित जहां से अन्न का बीज, खरपतवार नाशक विष। खेती गुलाम बना दी गई। हमारे बीज छिन गए। मैकाले ने हमारी विद्यापद्धति छीनी थी, डंकल ने हमारे पारंपरिक बीज और खेती की पुरातन पद्धति छीन ली। खेतों से गोवंश का निर्वसन हो गया। अमानवीय, निर्दयी और ह्रदयहीन खेती से उपजा अन्न शरीर में नहीं लगेगा, ऐसी ही ब्याधियां जन्मेगा। ऐसे समय में डा. मोहन भागवत के बौद्धिक ने जगाने का काम किया हे। स्वदेशी, पारंपरिक और जैविक खेती, गोवंशीय सहकारिता के साथ। संघ प्रमुख ने पर्यावरण की भी बात की है। उन्होंने इन दो महीनों में पर्यावरणीय शुद्धिकरण की ओर ध्यान खींचा। प्रकृति संरक्षण की दृष्टि से देखा जाए तो लगता है कि यदि कोई महामारी व ब्याधि न भी आए तो भी पूरी दुनिया के प्रत्येक वर्ष दो महीने का अनिवार्य लाक डाउन कर दिया जाना चाहिए। वातावरण इसना स्वच्छ और साफ कि हरियाणा के कुरुक्षेत्र से हिमालय के दर्शन कर लें। दिल्ली की घुटन गायब। गंगा का जल इतना स्वच्छ जितना की पारदर्शी सीसा। वन्यजीवों और पक्षी शहर की सड़कों पर। तोता-मैना और गौरैय्या फिर घरों की मुड़ेर पर। इन सभी को यदि मौद्रिक अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ा जाए तो यह करोना की वजह से हुए प्रत्यक्ष नुकसान के मुकाबले कई गुना ज्यादा भरपाई करने वाली हैं। जब किसी को यह चिंता सताए कि करोना ने हमारी अर्थव्यवस्था को कहीं का नहीं छोड़ा तब उससे कहिए कि वह प्रकृति के उपादानों के मूल्य और बाजार में उनकी कीमतों पर विचार जरूर करे। वह यह विचार करे कि इन दो महीनों में वन प्रांतरों ने कुछ ज्यादा प्राणवायु वातावरण को दिए हैं। जल और हवा बिना किसी प्यूरीफायर के ज्यादा शुद्ध है। नशा-पत्ती, धुँआ धक्कड़ से मुक्त मनुष्य की रोगनिरोधक क्षमता बिना इंजेक्शन, गोली के ज्यादा मजबूत हुई है। मितव्ययिता घटी, अपनों के साथ वक्त गुजारा। रिश्ते और प्रगाढ़ हुए। पुस्तकों ने अपना महत्व फिर बताया। मितव्ययिता और आत्मसंयम के साथ जीवनदृष्टि बदली। राज्य और अपने समाज की नागरिकों के प्रति नियति का भी पता चला। इन सबको यदि बाजार की कीमतों के मुकाबले आँकें तो ये निश्चित ही ये ज्यादा मूल्यवान निकलेंगी इस बात को समझ लेना चाहिए।

और अंत महाभारत के एक प्रसंग के साथ

पाँडवों को वनवास हुए एक महीने हुए होंगे। एक दिन दुर्योधन ने कर्ण से कहा कि चले जंगल में चलकर देंखे तो कि वे पांडूगण कैसे जी रहे हैं। मनुष्य में परपीड़ा का सुख कुछ अलग ही होता है। दुर्योधन इसी सुख की लालसा से पांडुओं की दुर्गति देखना चाहता था। वे लाव-लश्कर के साथ जंगल के लिए निकले। पांडुओं के आश्रय स्थल तक पहुंच पाते कि यक्ष-गंधर्वों से सामना हो गया। कर्ण की बहादुरी धरी रह गई और दुर्योधन की गदा भी। गंधर्वों ने सभी को बाँधकर कैद कर लिया। कौरव गंधर्वों के हाथों बंदी हैं यह सूचना युधिष्ठिर तक पहुँची, उन्होंने अपने भाइयों को बताया। भीम और अर्जुन बहुत खुश हुए..चलो अधर्मियों को सबक और सजा तो मिली। लेकिन युधिष्ठिर ने उनदोनों को फटकारा मूर्ख हो तुम लोग। आज वे भले ही मेरे दुश्मन हों पर हम सब हैं तो एक ही मातृभूमि की संतान। उसी हस्तिनापुर के पुत्र। आज किसी गैर ने हमारे बंधु-बांधवों को संकट में डाला है पहले उन्हें इस संकट से निकालें.. बने रहे तो आगे दुश्मनी भी भँजा लेंगे पर अभी नहीं। भीम और अर्जुन ने जाकर गंधर्वों से दुर्योधन और कर्ण को मुक्त कराया। लज्जित कौरव वापस चले गए। यह कथा से स्पष्ट संदेश निकलता है कि यह विपत्ति फिलहाल बैर भँजाने के लिए नहीं है।

संघ प्रमुख ने 130 करोड़ नागरिकों को भारतमाता का पुत्र कहा है। यह भी कहा कि कुछ कृत्यों, की वजह से समूह विशेष से हमें क्षोभ हो सकता है लेकिन यह क्षोभ क्रोध में न बदले यह देखना होगा। आज संकट काल में और भी विघ्नसंतोषी आएंगे उनकी भी ज्यादा परवाह नहीं करना है। जब हमारा समय ठीक होगा तब हम उन्हें उपयुक्त उत्तर देंगे। ऐसे मन बनाकर हमे इस समाज को और भी प्रगाढ़ बनाना है और समवेत शक्ति के साथ संकट से उबारना है।

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