गेहूं के भरपूर उत्पादन के लिए नई किस्में और उन्नत तकनीक : डॉ. साई प्रसाद

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15 अक्टूबर 2020, इंदौर। गेहूं के भरपूर उत्पादन के लिए नई किस्में और उन्नत तकनीक : डॉ. साई प्रसाद – कृषक जगत किसान सत्र (रबी 2020) के तहत गत दिनों वेबिनार की श्रृंखला में ‘गेहूं के भरपूर उत्पादन के लिए नई कि़स्में और उन्नत तकनीक’ विषय पर आयोजित वेबिनार में आईसीएआर- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, क्षेत्रीय केंद्र इंदौर के प्रमुख डॉ. एस.व्ही. साई प्रसाद ने गेहूं से की नई किस्मों और अन्य तकनीक से अवगत कराया. इस कार्यक्रम में उनके सहयोगी वैज्ञानिक डॉ. ए.के.सिंह (कृषि विस्तार) ने भी सहयोग किया. संचालन कृषक जगत के निदेशक श्री सचिन बोन्द्रिया ने किया. डॉ. प्रसाद ने बताया कि इंदौर केंद्र की स्थापना 3 अक्टूबर 1951 को हुई. केंद्र में 8 कृषि वैज्ञानिक कार्यरत हैं. और केंद्र में गेहूं की नई किस्मों की खोज के साथ गेहूं की गुणवत्ता और उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रयास किए जाते हैं. 2019-20 में देश में 108 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन हुआ. म.प्र. में 20 प्रतिशत गेहूं उत्पादन बढ़ा. 32 क्विंटल /हे.औसत उत्पादन हुआ.इसमें इस केंद्र के कारण 40 प्रतिशत रकबा बढ़ा।

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विभिन्न गेहूं किस्में

डॉ. प्रसाद ने इस केंद्र से सामान्य और देरी से पकने वाली विकसित कम/अधिक पानी वाली विभिन्न किस्मों अमृता, हर्षिता, मालव कीर्ति, पूसा मंगल,पूसा अनमोल, स्वर्णा, पूसा तेजस, पूसा उजाला और पूर्णा आदि की विशेषताएं बताई. गत अगस्त मेंइसी केंद्र से दो नई कि़स्में 1633 और 1634 के चिन्हित होने की जानकारी भी दी और कहा कि इनके अधिसूचित होने के बाद अगले वर्ष तक इसका बीज मिलने की संभावना है. न्यूट्रीफैरम स्कीम, मिड डे मिल आंगनवाडिय़ों के लिए 1544 पूर्वा 8663 पोषण लोकप्रिय है. कम पानी वाली पूसा 1612 उत्तर पूर्वी क्षेत्र और 1620 उत्तर पश्चिम क्षेत्र के लिए विकसित की गई है. 1621 जनवरी में उत्तर भारत पश्चिम में देरी से बोने के लिए के लिए उचित है. 1628 उत्तर पश्चिम क्षेत्र के कम पानी वाले क्षेत्र के लिए है. इसके अलावा 8802 ,8805 भी है. नई चिन्हित 1633 और 1634 में प्रोटीन, जि़ंक ज्यादा है.देरी से बोने वाली इस किस्म का 4 पानी के बाद 45 -50 क्विंटल/हे.उत्पादन होता है. इसमें गेरुआ नहीं आता. आपने मध्य भारत के लिए विभिन्न किस्मों की भी जानकारी दी।

गेहूं फसल प्रबंधन

डॉ. प्रसाद ने विविध उचित फसल प्रणाली का चयन कर फसल में विविधता अपनाने और नवीन प्रजातियां लगाने की सलाह दी. सिंचाई जल की उपलब्धता के आधार पर बीज का चयन, सही समय पर बुवाई करें. पलेवा नहीं करके सूखे में बुवाई करके तुरंत सिंचाई करें. छोटे दानों के लिए 100 किलो/हे और बड़े दानों के लिए 125 किलो/हे.बीज का उपयोग करें. 1000 दाने का वजन 40 ग्राम होता है. इस हिसाब से 40 किलो बीज/एकड़ पर्याप्त है. खाद को गहरा(ढाई से तीन इंच) और बीज को उथला (डेढ़ से दो इंच) बोएं. संतुलित उर्वरक का प्रयोग करें. नत्रजन 4 भाग,स्फुर 2 भाग और पोटाश 1 भाग का उपयोग पहले करें. इससे अंकुरण सही होता है. शरबती किस्मों को एनपीके 120:60:30 और मालवी किस्मों के लिए 140:70:35 किलोग्राम/हेक्टेयर देना चाहिए. नत्रजन की आधी मात्रा और स्फुर की /पोटाश की पूरी मात्रा बुआई पूर्व देना चाहिए. शेष आधी मात्रा प्रथम सिंचाई/बुआई के 20 दिन बाद देनी चाहिए।

सूखे खेत में बुवाई के लाभ गिनाते हुए डॉ. प्रसाद ने कहा कि इससे बार-बार अनावश्यककी जाने वाली जुताई की बचत होती है. गेहूं बीज और खरपतवार बीजों में खाद हेतु प्रतिस्पर्धा कम हो जाते है. फसल का उठाव अच्छा होता है. एक सिंचाई और 10-15 दिन के समय की बचत होती है. आपने सारी विधि की जगह क्यारी विधि से सिचाई करने की सलाह दी. आपने विभिन न किस्मों के लिए उर्वरक की जरूरत और सिंचाई की क्रांतिक अवस्थाओं का पानी उपलब्धता के आधार पर 1 से 5 सिंचाई के लिए 35 से 95 दिनों की अवधि का अलग विवरण देते हुए कहा कि गेहूं में पीलापन आने लगे तो सिंचाई न करें. पहले माह में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार का ध्यान रखें।

डॉ. प्रसाद ने बताया कि पूसा तेजस, मालव कीर्ति पोषण, पूसा मंगल में आयरन, केरोटीन, प्रोटीन अधिक होने से पास्ता बनाने वाली 15-16 कंपनियां रूचि ले रही है. इसमें यलो पिग्मेंट 7 पीपीएम और प्रोटीन 12 प्रतिशत है. कनाडा के गेहूं से आपने देश के गेहूं की तुलना कर बताया कि कनाडा में जहां उत्पादन 25-30 क्विंटल/हे. है, वहीं भारत में 40-50 क्विंटल/हे. है।

प्रश्नोत्तरी

ऑनलाईन प्रश्नोत्तरी में किसानों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया. आरौन जिला गुना के किसान श्री जगदीश नायक ने पूछा कि क्या एचडी -3226 उनके यहां के लिए उपयुक्त है? डॉ. प्रसाद ने कहा कि यह किस्म उत्तर भारत के पश्चिम क्षेत्र के लिए रिलीज हुई है. इस क्षेत्र के लिए नहीं. उसमें कर्नल बंट का खतरा है .इसे नहीं लगाना चाहिए. म.प्र. में गेहूं कि़स्में करनाल बंट से मुक्त है. इसलिए म.प्र. के लिए अधिसूचित किस्में ही लगाना चाहिए.उन्होंने खुलासा किया कि करनाल बंट रोग में गेहू काला पाउडर बन जाता है. आपने काले गेहूं और लाभपति किस्म के बारे में भी बताया जो अधिसूचित नहीं है और कम पसंद की जा रही है. श्री करण पटेल, हरदा ने तेजस गेहूं में पत्ते पीले होने और सूखने और शपे ज्यादा लगने की शिकायत की.इस पर डॉ प्रसाद ने सलाह दी की प्रमाणित बीज ही उपयोग करें. पहले लगाई अन्य किस्म की जानकारी दें. समस्या का समाधान किया जाएगा. श्री रघुवंशी सिलवानी रायसेन ने सूखे खेत में धान काटकर खेती करने और क्रॉसिंग करने की जानकारी दी. इसके जवाब में डॉ सिंह ने कहा कि ऐसी खेती की जा सकती है, लेकिन सही समय पर सही बीज/मात्रा और विधि से करें. स्र5ॉस न करें. एक तरफ से बुवाई करें. सिंचाई का उचित प्रबंध करें. 100-110 किलो बीज से अधिक न बोएं. श्री रामस्वरूप ने खाद की संतुलित मात्रा पूछी।

बीज की मात्रा

श्री विनोद पटेल ने एक एकड़ 70 किलो बीज बोने की बात कही जिस पर डॉ प्रसाद ने कहा कि यह बहुत ज्यादा है. एक एकड़ में अधिकतम 42 किलो बीज पर्याप्त है। श्री अंशुमन पाण्डे और श्री राजेश बांके ने पूसा मंगल बीज की उपलब्धता पूछी. डॉ. प्रसाद ने कहा कि प्रजनक बीज थोड़ी मात्रा में दे सकते हैं. अन्यथा राष्ट्रीय बीज निगम या राज्य के बीज निगम से ले सकते हैं. एचडी -2967 बुंदेलखंड सेन्ट्रल इण्डिया में आता है, इसलिए ये किस्म वहां लगा सकते हैं. श्री राजनारायण सक्सेना ने गेहूं फसल में रुट एफिड के अच्छा नियंत्रण संबंधी सवाल पूछा. इस पर कहा गया कि क्लोरोपारीफॉस को सिंचाई के साथ देने से यह नियंत्रित हो सकता है।

पूसा तेजस की बोनी

पिपरिया जिला होशंगाबाद के श्री आकाश पटेल ने पूछा कि पूसा तेजस को किस विधि से बोया जाए? इस पर बताया गया कि 5 से 25 नवंबर के बीच बोनी करें. कतार से कतार की दूरी 20 सेमी रखें. बीज 50 -55 किलो/एकड़ डालें. 4-5 पानी ही दें. खरपतवार नियंत्रण करें .बीजोपचार किस -किस से करना चाहिए. इस सवाल के जवाब में डॉ सिंह ने कहा कि यदि बीज की गुणवत्ता अच्छी है तो बीजोपचार की जरूरत नहीं है , लेकिन यदि ऐसा नहीं है तो थीरम/बाविस्टीन 3 -5 ग्राम/किलो के साथ चिपकने के लिए गुड़ डालें. यदि दीमक की समस्या है तो क्लोरोपायरीफास से या अन्य जैविक चीजों से बीज शोधन करें. श्री रामनिवास जाट ने पूसा तेजस की सही बीज दर क्या होनी चाहिए? डॉ. प्रसाद ने कहा कि 50-55 किलो /एकड़ या 120-125 किलो/हेक्टेयर पर्याप्त है. अंकुरण 90 प्रतिशत से ऊपर होना चाहिए. पेटलावद (झाबुआ) के श्री योगेश ने खाद की सही मात्रा पूछी. कहा गया कि 75 किलो स्फूर, 50 पोटाश के साथ 150 किलो नत्रजन में से 75 किलो बोने के समय दे दें. शेष पहली सिंचाई में देना चाहिए।

काला गेहूं मध्य भारत के लिए नहीं है

पिपरिया के संजीव रॉय ने पूछा कि काला गेहूं लगाना चाहिए की नहीं? डॉ. प्रसाद ने स्पष्ट कहा कि यह किस्म नाबी द्वारा विकसित की गई है, जो मध्य भारत के लिए अधिसूचित नहीं है. इसलिए इसकी अनुशंसा नहीं कर रहे हैं. अपने क्षेत्र में जब तक अधिसूचित न हों तब तक न लगाएं. इस गेहूं के बेचने वालों को खरीदार नहीं मिल रहे हैं. बाजार भी नहीं है. किसान भाई आगे से ऐसी गलती न करें. इस क्षेत्र के लिए कई विकसित कि़स्में हैं, उन्हें लगाएं। श्री डी.एस.पटेल ने सूखे में बोने पर अंकुरण कम होने की शिकायत की तो जवाब में डॉ सिंह ने कहा कि बीज की गहराई का ध्यान रखें, बीज उथला लगाएं ऊपर से पाटा न चलाएं. चास खुले रखें. बीज अच्छी गुणवत्ता वाला होना चाहिए।

घाटाबिल्लौद (धार) के श्री रामनारायण चौधरी ने पूछा कि सब्जियों और फलों में केमिकल की मात्रा बढ़ रही है तो क्या साल दो साल में गेहूं में भी यह स्थिति बनेगी ? डॉ. प्रसाद ने कहा कि गेहूं में खरपतवार के अलावा कोई रसायन की ज़रूरत नहीं है. नई कि़स्में गेरुआ और रोग से मुक्त है. केवीके और अनुसन्धान से जानकारी लिए बगैर रसायन न डालें. माहू लगने पर डॉ सिंह ने कहा कि वर्षाकाल लम्बा हो गया था. मिट्टी को हवा और धूप मिलना चाहिए थी वो नहीं मिली. इस कारण जो कीटाणु मरना चाहिए थे वो नहीं मरे. इस कारण यह समस्या आई।

इनामी कृषि ज्ञान प्रतियोगिता – बीजोपचार के कोई तीन लाभ बताएं? श्री करण पटेल, श्री योगेश पाटीदार और आकाश पटेल ने इसके लाभ बताए, लेकिन सबसे सटीक और सही उत्तर श्री आकाश पटेल ने दिया. उन्होंने कहा कि बीजोपचार का बहुत महत्व है. फंजीसाइड से बीजोपचार बीजजनित रोगों से मुक्ति मिलती है. इससे अंकुरण अच्छा होता है और जड़ों की भी रक्षा होगी. इंसेक्टिसाइड बीजोपचार से पौधों के रसचूसक कीटों से रक्षा होगी. राइजोबियम कल्चर से भी बीजोपचार से खाद की उपलब्धता बढ़ती. जड़ों का विकास अच्छा होगा और पौधे का विकास अच्छा होगा. दवाइयां कम लगेगी. परिणाम अच्छे आएँगे. इसलिए डॉ. प्रसाद की सहमति से श्री आकाश पटेल को कृषक जगत की ओर से सदा बहार खेती नामक पुस्तक उपहार में देने की घोषणा की गई. इस वेबिनार कोकृषकों और दर्शकों का अच्छा प्रतिसाद मिला।

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