राज्य कृषि समाचार (State News)

मानसून में देरी के बीच धान किसानों के लिए ICAR की एडवाइजरी, जानें क्या करें और क्या नहीं

17 जुलाई 2026, रायपुर: मानसून में देरी के बीच धान किसानों के लिए ICAR की एडवाइजरी, जानें क्या करें और क्या नहीं – दक्षिण-पश्चिम मानसून में देरी और छत्तीसगढ़ के कई हिस्सों में बारिश की अनिश्चित स्थिति को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान (NIBSM), रायपुर ने धान किसानों के लिए विशेष कृषि परामर्श जारी किया है। संस्थान ने किसानों से अपील की है कि खरीफ सीजन में फसल की सफल स्थापना और संभावित उत्पादन हानि से बचने के लिए मौसम की स्थिति के अनुसार वैज्ञानिक एवं आकस्मिक कृषि उपाय अपनाएं। समय पर सही निर्णय लेने से फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है और बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

संस्थान के अनुसार, जिन क्षेत्रों में पर्याप्त वर्षा हो चुकी है, वहां किसान 20 से 25 दिन पुराने स्वस्थ धान के पौधों की अनुशंसित दूरी पर जल्द से जल्द रोपाई पूरी करें। यदि बारिश में अधिक देरी होती है और समय पर रोपाई संभव नहीं हो पाती है, तो किसानों को कम या मध्यम अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्मों का चयन करना चाहिए, ताकि फसल समय पर पक सके और उत्पादन प्रभावित न हो।

रोपाई संभव नहीं तो अपनाएं सीधी बुवाई

आईसीएआर-एनआईबीएसएम ने सलाह दी है कि जिन क्षेत्रों में रोपाई करना संभव नहीं है, वहां किसान अंकुरित बीजों की ड्रम सीडर या छिड़काव (ब्रॉडकास्टिंग) विधि से धान की सीधी बुवाई कर सकते हैं। यह तकनीक समय की बचत के साथ फसल स्थापना में भी मददगार साबित हो सकती है।

उर्वरकों का करें संतुलित उपयोग

संस्थान ने किसानों को संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने की सलाह दी है। फास्फोरस और पोटाश की अनुशंसित मात्रा आधार खाद के रूप में खेत में दें, जबकि नत्रजन (यूरिया) का प्रयोग फसल की आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग चरणों में करें। संस्थान ने विशेष रूप से चेतावनी दी है कि भारी बारिश की संभावना से ठीक पहले यूरिया का छिड़काव न करें, क्योंकि इससे पोषक तत्व बह सकते हैं और फसल को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाएगा।

खरपतवार, जलभराव और कीट-रोगों पर रखें नजर

परामर्श में किसानों से समय पर खरपतवार नियंत्रण, खेत में उचित नमी बनाए रखने और जलभराव की स्थिति में प्रभावी जल निकासी सुनिश्चित करने को कहा गया है। इसके साथ ही तना छेदक, पत्ती लपेटक जैसे प्रमुख कीटों तथा ब्लास्ट और जीवाणुजनित पत्ती झुलसा जैसे रोगों की नियमित निगरानी करने और आवश्यकता पड़ने पर कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार पौध संरक्षण उपाय अपनाने की सलाह दी गई है।

वैज्ञानिकों ने दी यह अहम सलाह

संस्थान के निदेशक डॉ. पी.के. राय ने कहा कि बदलती जलवायु और अनिश्चित वर्षा की परिस्थितियों में वैज्ञानिक फसल प्रबंधन और आकस्मिक योजना अपनाना बेहद जरूरी है। उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि वे स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप सलाह के लिए अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) और कृषि विशेषज्ञों के संपर्क में रहें।

वहीं, संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. पंकज शर्मा ने कहा कि विलंबित मानसून की स्थिति में फसल की शुरुआती अवस्था सबसे महत्वपूर्ण होती है। किसानों को खेत संबंधी कार्यों में अनावश्यक देरी नहीं करनी चाहिए और संतुलित पोषण, प्रभावी खरपतवार नियंत्रण तथा कीट एवं रोगों की नियमित निगरानी पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

बारिश कम हो तो इन फसलों पर करें विचार

आईसीएआर-एनआईबीएसएम ने सलाह दी है कि जिन क्षेत्रों में लंबे समय तक पर्याप्त वर्षा नहीं होती और धान की खेती प्रभावित होने की आशंका है, वहां किसान स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुसार मक्का, अरहर, उड़द, मूंग, तिल और मोटे अनाज जैसी वैकल्पिक फसलों की खेती पर भी विचार कर सकते हैं। इससे जोखिम कम होगा और किसानों को आर्थिक नुकसान से बचाने में मदद मिलेगी।

संस्थान ने अंत में किसानों से अपील की है कि वे मौसम आधारित कृषि परामर्श और वैज्ञानिक सिफारिशों का पालन करें। समय पर अपनाए गए वैज्ञानिक उपाय न केवल खरीफ फसलों को सुरक्षित रखेंगे, बल्कि उत्पादन और किसानों की आय को भी स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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