धान के बाद सरसों की खेती और तेल प्रसंस्करण से बढ़ेगी किसानों की आय: डॉ. पी.के. राय
आईसीएआर-एनआईबीएसएम, रायपुर में कच्ची घानी सरसों तेल एक्सपेलर इकाई शुरू
03 जुलाई 2026, रायपुर: धान के बाद सरसों की खेती और तेल प्रसंस्करण से बढ़ेगी किसानों की आय: डॉ. पी.के. राय – किसानों की आय बढ़ाने एवं कृषि उत्पादों में मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आईसीएआर-राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान (एनआईबीएसएम), रायपुर में कच्ची घानी सरसों तेल एक्सपेलर इकाई का शुभारंभ किया गया। इस इकाई के माध्यम से संस्थान में रबी 2025-26 के दौरान उत्पादित सरसों से कोल्ड-प्रेस्ड (कच्ची घानी) सरसों तेल तैयार किया जा रहा है।
यह “फार्म-टू-ऑयल” मॉडल किसानों के लिए मूल्य संवर्धन और कृषि उद्यमिता का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करेगा। संस्थान के निदेशक डॉ. पी.के. राय ने कहा कि छत्तीसगढ़ में धान की कटाई के बाद बड़ी मात्रा में कृषि भूमि खाली रहती है। यदि किसान रबी मौसम में सरसों की खेती कर स्थानीय स्तर पर उसका प्रसंस्करण करें, तो इससे अतिरिक्त आय के साथ-साथ घरेलू उपयोग के लिए शुद्ध सरसों तेल भी प्राप्त होगा। उन्होंने बताया कि संस्थान में स्थापित कच्ची घानी तेल एक्सपेलर प्रतिदिन लगभग 2 टन सरसों का प्रसंस्करण करने में सक्षम है। संस्थान ने अपने अनुसंधान प्रक्षेत्र में उगाई गई डीआरएमआर-150-35 किस्म की सरसों का सफलतापूर्वक प्रसंस्करण किया है, जिसमें लगभग 38 से 40 प्रतिशत तेल पाया जाता है।
संयुक्त निदेशक एवं एससीएसपी समन्वयक डॉ. पंकज शर्मा ने बताया कि इसी प्रकार की एक तेल एक्सपेलर इकाई अनुसूचित जाति उपयोजना (एससीएसपी) के अंतर्गत संस्थान द्वारा गोद लिए गए पचेरा गांव में भी स्थापित की गई है। यहां किसानों ने संस्थान द्वारा उपलब्ध कराए गए गुणवत्तायुक्त बीजों से सरसों की खेती की है और अब वे अपनी उपज से गांव में ही शुद्ध सरसों तेल तैयार कर घरेलू उपयोग के साथ-साथ मूल्य संवर्धित उत्पाद के रूप में बाजार में बेचकर अधिक लाभ कमा सकेंगे। उन्होंने बताया कि इस इकाई की स्थापना पर लगभग 5 से 6 लाख रुपये की लागत आती है, जिसे किसान समूह, किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), सहकारी समितियां एवं ग्रामीण उद्यमी आसानी से स्थापित कर सकते हैं। संस्थान का मानना है कि यह मॉडल धान के बाद फसल विविधीकरण, स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण, ग्रामीण रोजगार और कृषि आधारित उद्यमिता को बढ़ावा देगा। साथ ही किसानों की आय बढ़ाने और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
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