छिंदवाड़ा: लक्ष्मी बाई ने खेती, पशुपालन और ड्रोन तकनीक से अपनी आजीविका को दी नई दिशा
15 अक्टूबर 2026, छिंदवाड़ा: छिंदवाड़ा: लक्ष्मी बाई ने खेती, पशुपालन और ड्रोन तकनीक से अपनी आजीविका को दी नई दिशा – छिंदवाड़ा जिले के बिछुआ विकासखंड के ग्राम झांमटा की श्रीमती लक्ष्मी बाई घाघरे ने खेती, पशुपालन और आधुनिक कृषि तकनीक को अपनाकर अपनी आजीविका को नई दिशा दी है। मध्यप्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत स्व सहायता समूह से जुड़कर उन्होंने अपनी आर्थिक गतिविधियों का विस्तार किया और आज एक सफल दुग्ध व्यवसायी, प्रगतिशील जैविक कृषक तथा नमो ड्रोन दीदी के रूप में कार्य कर रही हैं। अपने प्रयासों से उन्होंने न केवल अपनी आय बढ़ाई, बल्कि दूसरी महिलाओं के लिए भी रोजगार और आजीविका के अवसर विकसित किए हैं। कृषि के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय कार्यों के लिए उन्हें प्रदेश स्तर पर प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित भी किया जा चुका है।
स्व सहायता समूह से मिला आगे बढ़ने का अवसर – श्रीमती लक्ष्मी बाई घाघरे के लिए स्व सहायता समूह से जुड़ना आर्थिक गतिविधियों को विस्तार देने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हुआ। समूह के माध्यम से उन्हें प्रशिक्षण, आर्थिक सहयोग और अपनी क्षमताओं को विकसित करने का अवसर मिला। उन्होंने इस सहयोग का उपयोग करते हुए आजीविका के अलग-अलग साधन विकसित किए। स्व सहायता समूह की अध्यक्ष होने के साथ-साथ वे संकुल स्तरीय संगठन से भी जुड़ी हैं और अन्य महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। उन्होंने समूह को केवल बचत तक सीमित न रखकर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर विकसित करने का माध्यम बनाया है।
डेयरी व्यवसाय से प्रतिमाह एक लाख रुपये तक की आय – श्रीमती लक्ष्मी बाई ने पशुपालन और दुग्ध उत्पादन को व्यवस्थित व्यवसाय के रूप में विकसित किया है। उनके पास लगभग 10 पशु हैं, जिनसे प्रतिदिन 30 से 35 लीटर दूध का उत्पादन होता है। वे दूध से घी, पनीर, दही और मिठाइयां तैयार कर बाजार में बेचती हैं। इसके अतिरिक्त, वे आसपास की महिलाओं से दूध एकत्रित कर डेयरी संघ को भी उपलब्ध कराती हैं। अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने दुग्ध उत्पादक समूह की स्थापना की है। इससे अन्य महिलाओं को भी दूध उत्पादन और बिक्री के माध्यम से आय अर्जित करने का अवसर मिला है। डेयरी व्यवसाय से उन्हें प्रतिमाह लगभग 90 हजार से एक लाख रुपये तक की आय प्राप्त हो रही है। विभिन्न आजीविका गतिविधियों के माध्यम से उनकी वार्षिक आय चार लाख रुपये से अधिक हो चुकी है।
जैविक खेती और फसल विविधीकरण से कृषि में नवाचार – श्रीमती लक्ष्मी बाई ने खेती में पारंपरिक अनुभव के साथ नई तकनीकों और प्राकृतिक खेती को भी अपनाया है। उन्होंने बायो इनपुट रिसोर्स सेंटर स्थापित किया है, जहां जैविक खाद और कीट नियंत्रण के लिए उपयोगी सामग्री तैयार की जाती है। वे मिश्रित एवं अंतर्वर्ती फसल पद्धति अपनाकर उपलब्ध कृषि भूमि का बेहतर उपयोग कर रही हैं। तुअर के साथ गेंदे तथा सोयाबीन के साथ धनिया जैसी फसलों की खेती के माध्यम से उन्होंने फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिया है। इस पद्धति से उन्हें खेती की लागत को नियंत्रित करने और अतिरिक्त आय के अवसर विकसित करने में मदद मिली है। जैविक खेती और फसल विविधीकरण के उनके प्रयास दूसरे किसानों के लिए भी उपयोगी उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
नमो ड्रोन दीदी बनकर कृषि सेवाओं से जुड़ीं – आधुनिक कृषि तकनीक को अपनाने की दिशा में लक्ष्मी बाई ने एक और कदम बढ़ाया है। भारत सरकार की नमो ड्रोन दीदी योजना के अंतर्गत चयनित होने के बाद उन्होंने ड्रोन संचालन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। अब वे ड्रोन के माध्यम से खेतों में दवाइयों के छिड़काव और फसल प्रबंधन से संबंधित कार्य करती हैं। इस गतिविधि से उन्हें सालाना लगभग 70 हजार रुपये की अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है। ड्रोन तकनीक के उपयोग से उनके कार्यक्षेत्र का विस्तार हुआ है। इससे उन्हें कृषि की आधुनिक पद्धतियों से जुड़ने और अपनी आजीविका के लिए एक अतिरिक्त आय स्रोत विकसित करने का अवसर मिला है।
अपने अनुभव से दूसरी महिलाओं को भी कर रहीं प्रोत्साहित – श्रीमती लक्ष्मी बाई की गतिविधियां अब उनके व्यक्तिगत व्यवसाय तक सीमित नहीं हैं। वे जैविक खेती, पशुपालन और फसल विविधीकरण जैसे विषयों पर दूसरी महिलाओं को मार्गदर्शन देती हैं। अपने अनुभवों के माध्यम से वे महिलाओं को उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने, नई तकनीक अपनाने और आजीविका के एक से अधिक साधन विकसित करने के लिए प्रेरित करती हैं। दुग्ध उत्पादक समूह के माध्यम से भी उन्होंने महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास किया है।
श्रीमती लक्ष्मी बाई घाघरे की उपलब्धियां बताती हैं कि स्व सहायता समूहों के माध्यम से मिलने वाला सहयोग, प्रशिक्षण और तकनीक का उपयोग ग्रामीण महिलाओं के लिए आजीविका के नए अवसर विकसित कर सकता है। उन्होंने खेती और पशुपालन के साथ आधुनिक कृषि सेवाओं को जोड़कर अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार किया है। उनकी पहल महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार, कृषि नवाचार और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को बढ़ावा देने का उदाहरण है।
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