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राज्य कृषि समाचार (State News)

धान में तना छेदक, पत्ती लपेटक और भूरे फुदके का खतरा, वैज्ञानिकों ने दी सलाह

15 अक्टूबर 2026, कटक (ओड़िशा): धान में तना छेदक, पत्ती लपेटक और भूरे फुदके का खतरा, वैज्ञानिकों ने दी सलाह – अक्टूबर के पहले पखवाड़े में धान की खड़ी फसल पर तना छेदक, पत्ती लपेटक और भूरे फुदके यानी ब्राउन प्लांट हॉपर का खतरा बढ़ गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय धान शोध संस्थान, कटक ने अपनी ताजा कृषि सलाहकार सेवा में किसानों को इन कीटों की पहचान और नियंत्रण के उपाय बताए हैं।

संस्थान के मुताबिक रोपी गई धान की फसल में जहां पुष्पगुच्छ निकलने की अवस्था आ चुकी है, वहां यूरिया की दूसरी टॉप ड्रेसिंग प्रति एकड़ 17.5 किलोग्राम की दर से देने की सलाह दी गई है। रेतीली मिट्टी में इसके साथ प्रति एकड़ 13 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश भी डालना चाहिए।

फेरोमोन ट्रैप से रखें निगरानी

तना छेदक और पत्ती लपेटक कीटों की निगरानी के लिए संस्थान ने प्रति एकड़ चार से पांच फेरोमोन ट्रैप लगाने की सलाह दी है। जब ट्रैप में नर पतंगों की संख्या चार से पांच प्रति ट्रैप तक पहुंच जाए, तभी छिड़काव करना चाहिए।

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इसके लिए क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5 प्रतिशत एससी की 60 मिलीलीटर प्रति एकड़ या टेट्रानिलिप्रोल 200 एससी की 100 से 120 मिलीलीटर प्रति एकड़ मात्रा का छिड़काव किया जा सकता है। फ्लूबेंडियामाइड 20 डब्ल्यूजी की 50 ग्राम प्रति एकड़ मात्रा भी असरदार बताई गई है।

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जैविक नियंत्रण के लिए ट्राइकोग्रामा जैपोनिकम और ट्राइकोग्रामा काइलोनिस परजीवी कार्ड का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिसकी तीन कार्ड प्रति हेक्टेयर की दर से पांच बार, सात से दस दिन के अंतराल पर रिहाई करनी चाहिए।

भूरे फुदके के लिए आर्थिक क्षति स्तर प्रति पौधा पांच से दस कीट तय किया गया है। संस्थान ने सबसे पहले खेत में बारी-बारी पानी भरने और सुखाने की सलाह दी है, जिससे कीट का प्रकोप प्राकृतिक रूप से कम हो सके।

अगर समस्या बनी रहे तो ट्राइफ्लूमेज़ोपाइरिम 10 प्रतिशत एससी की 94 मिलीलीटर प्रति एकड़, डाइनोटेफ्यूरान 20 प्रतिशत एसजी की 60 से 80 ग्राम प्रति एकड़ या पायमेट्रोज़िन 50 प्रतिशत डब्ल्यूजी की 120 ग्राम प्रति एकड़ मात्रा का इस्तेमाल किया जा सकता है। संस्थान ने साफ कहा है कि भूरे फुदके के प्रकोप के दौरान खेत में नाइट्रोजन खाद का इस्तेमाल बिल्कुल न करें, क्योंकि इससे कीट और बढ़ सकता है।

फसल की शुरुआती अवस्था में थ्रिप्स का भी ध्यान रखें

जल्दी रोपी गई फसल में थ्रिप्स कीट का भी असर देखा जा रहा है। इसके लिए एज़ाडिरेक्टिन 0.15 प्रतिशत की एक लीटर प्रति एकड़, लैम्ब्डा-साइहेलोथ्रिन 5 प्रतिशत ईसी की 100 मिलीलीटर प्रति एकड़ या थायोमेथोक्सम 25 प्रतिशत डब्ल्यूजी की 40 ग्राम प्रति एकड़ (200 लीटर पानी में घोलकर) मात्रा छिड़कने की सलाह दी गई है। इसके अलावा गॉल मिज कीट के लिए फिप्रोनिल 5 प्रतिशत एससी की 400 से 600 मिलीलीटर प्रति एकड़ मात्रा कारगर बताई गई है।

संस्थान ने किसानों से कहा है कि किसी भी कीटनाशक का छिड़काव करने से पहले एक बार अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विस्तार अधिकारी से मात्रा की पुष्टि जरूर कर लें, क्योंकि अलग-अलग इलाकों में मिट्टी और मौसम की स्थिति के हिसाब से सुझाव में कुछ बदलाव हो सकता है। संस्थान में एक धान स्वास्थ्य क्लिनिक भी चलाया जा रहा है, जहां किसान अपनी फसल के नमूने लेकर सीधे सलाह ले सकते हैं।

स्वार्मिंग कैटरपिलर, केस वर्म और हिस्पा कीटों के लिए क्लोरपायरीफॉस 20 ईसी की 500 मिलीलीटर प्रति एकड़ या क्विनालफॉस 25 प्रतिशत ईसी की 800 मिलीलीटर प्रति एकड़ मात्रा का छिड़काव कारगर बताया गया है। बाद में रोपी गई फसल में स्वार्मिंग कैटरपिलर दिखने पर संस्थान ने सबसे पहले प्रति हेक्टेयर दो लीटर केरोसिन का इस्तेमाल करते हुए खेत में रस्सी खींचकर पौधों को हिलाने की सलाह दी है, ताकि कीट गिर जाएं।

इससे फायदा न होने पर ही रासायनिक दवाओं का सहारा लेना चाहिए। संस्थान के वैज्ञानिकों का कहना है कि शुरुआती दौर में ही निगरानी और सही कदम उठाने से दवाओं पर खर्च भी कम होता है और फसल को होने वाला नुकसान भी टाला जा सकता है।

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