भारी बारिश के बाद धान में झूठा कंड, ब्लास्ट और जीवाणु रोग का खतरा
15 अक्टूबर 2026, कटक (ओड़िशा): भारी बारिश के बाद धान में झूठा कंड, ब्लास्ट और जीवाणु रोग का खतरा – कम दबाव के क्षेत्र से हुई भारी बारिश के बाद ओड़िशा और आसपास के इलाकों में जलभराव वाले धान के खेतों में झूठा कंड यानी फॉल्स स्मट, ब्लास्ट और बैक्टीरियल ब्लाइट जैसे रोगों के फैलने का खतरा बढ़ गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय धान शोध संस्थान, कटक ने अक्टूबर के पहले पखवाड़े के लिए जारी अपनी सलाह में किसानों को इन रोगों से बचाव के उपाय बताए हैं।
संस्थान के मुताबिक जिन खेतों में पानी भर गया है, वहां पहले जितना संभव हो सके अतिरिक्त पानी निकालने की कोशिश करनी चाहिए। इसके बाद प्रति एकड़ पांच किलोग्राम पोटाश का इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है, ताकि पौधों की प्रतिरोधक क्षमता बनी रहे।
बाली निकलने से पहले झूठे कंड पर नजर रखें
झूठा कंड रोग बाली निकलने की अवस्था में सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। इसके नियंत्रण के लिए कॉपर हाइड्रॉक्साइड 77 प्रतिशत की 400 ग्राम प्रति एकड़ या टेबुकोनाज़ोल 25 प्रतिशत की 400 ग्राम प्रति एकड़ मात्रा का छिड़काव बालियां निकलने से ठीक पहले करने की सलाह दी गई है।
जरूरत पड़ने पर सात दिन बाद इसे दोहराया जा सकता है। संस्थान ने बताया कि एक बार लक्षण दिखने के बाद झूठे कंड का कोई असरदार इलाज नहीं बचता, इसलिए छिड़काव समय पर करना ही सबसे जरूरी है।
ब्लास्ट रोग के लिए टेबुकोनाज़ोल 50 प्रतिशत और ट्राइफ्लॉक्सीस्ट्रोबिन 25 प्रतिशत के मिश्रण की 0.4 ग्राम प्रति लीटर पानी, एडिफेनफॉस 50 ईसी की 2 मिलीलीटर प्रति लीटर या ट्राइसाइक्लाज़ोल 75 डब्ल्यूपी की 0.6 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है। भारी जलभराव वाले खेतों के लिए यह मात्रा थोड़ी अलग है, जहां दस लीटर पानी में चार ग्राम उक्त मिश्रण या आइसोप्रोथियोलेन 40 ईसी की 15 मिलीलीटर मात्रा मिलाकर, सात से दस दिन के अंतराल पर दोबारा छिड़काव करने को कहा गया है।
जीवाणु रोगों के लिए प्लांटोमाइसिन का सुझाव
बैक्टीरियल ब्लाइट और बैक्टीरियल लीफ स्ट्रीक जैसे जीवाणुजनित रोगों के लिए प्लांटोमाइसिन की एक ग्राम और कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की एक ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है। भारी बारिश से जलभराव वाले खेतों के लिए संस्थान ने दस लीटर पानी में एक ग्राम प्लांटोमाइसिन और 20 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड, या प्रति एकड़ 200 ग्राम प्रत्येक की मात्रा का सुझाव दिया है।
संस्थान ने यह भी बताया कि जहां बारिश की वजह से धान की बुवाई या रोपाई नहीं हो पाई, वहां किसान कम अवधि की फसलें जैसे चौलाई, रागी, कुल्थी, मूंग, उड़द, लोबिया, शकरकंद या तिल लगाकर जमीन का इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे खेत खाली रहने के बजाय किसानों को कुछ अतिरिक्त आय मिल सकती है।
संस्थान ने किसानों को सलाह दी है कि किसी भी रसायन का इस्तेमाल करने से पहले अनुपात की दोबारा जांच कर लें और स्थानीय कृषि विस्तार अधिकारी से सलाह लें, क्योंकि अलग-अलग इलाकों में मिट्टी और जलभराव की स्थिति अलग हो सकती है। कटक स्थित धान स्वास्थ्य क्लिनिक में सोमवार से शुक्रवार सुबह साढ़े दस से दोपहर साढ़े बारह बजे तक किसान अपनी फसल के नमूने लेकर जा सकते हैं।
वैज्ञानिकों के मुताबिक लगातार बादल छाए रहने और नमी ज्यादा रहने की स्थिति में फफूंद और जीवाणुजनित रोग बहुत तेजी से फैलते हैं, इसलिए खेतों का नियमित निरीक्षण करना सबसे जरूरी कदम है। जिन खेतों में पौधे ज्यादा घने लगे हैं, वहां रोग फैलने की रफ्तार और तेज हो सकती है, इसलिए समय पर निराई-गुड़ाई और अतिरिक्त पानी की निकासी पर खास ध्यान देने की सलाह दी गई है। संस्थान ने यह भी कहा है कि एक ही प्रकार की दवा का बार-बार इस्तेमाल करने से कीट और रोगों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है, इसलिए सुझाई गई दवाओं को बदल-बदल कर इस्तेमाल करना बेहतर रहता है।
आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture


