मुंगेली के रामलाल की बकरी पालन से बदली जिंदगी
15 अक्टूबर 2026, मुंगेली (छत्तीसगढ़): मुंगेली के रामलाल की बकरी पालन से बदली जिंदगी – छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले के सुरही गांव के किसान रामलाल लकड़ा ने बकरी पालन को अपनी आजीविका का मुख्य जरिया बनाकर गांव के दूसरे किसानों के लिए भी मिसाल पेश की है। करीब दस साल पहले बहुत कम बकरियों और सीमित संसाधनों के साथ शुरू किया गया यह काम आज बढ़कर 185 बकरियों तक पहुंच गया है।
रामलाल बताते हैं कि बकरी पालन में उन्हें कभी महंगे संसाधनों की जरूरत नहीं पड़ी। गांव में मौजूद प्राकृतिक चारे और संसाधनों के सहारे ही वे अपने पशुओं का पालन कर रहे हैं। उनका कहना है कि बकरी पालन के लिए सबसे ज्यादा जरूरी पशुओं की सेहत का ध्यान रखना, समय पर चारा देना और नस्ल सुधार पर काम करना है।
कम खर्च में ज्यादा मुनाफा
रामलाल के मुताबिक बकरी पालन से उन्हें अब सालाना करीब एक लाख रुपये की आमदनी हो रही है। इस कमाई से वे अपने बच्चों की पढ़ाई, घर के रोजमर्रा के खर्च पूरे कर रहे हैं और कुछ बचत भी कर पा रहे हैं। उनका कहना है कि बकरियों की बाजार में मांग हमेशा बनी रहती है, इसलिए पैसे फंसने का डर भी नहीं रहता।
रामलाल अब गांव के युवाओं को भी परंपरागत नौकरियों तक सीमित न रहकर खेती के साथ पशुपालन को अपनाने की सलाह देते हैं। आसपास के कई गांवों से लोग उनसे बकरी पालन की बारीकियां सीखने के लिए मिलने आते हैं। वे बताते हैं कि कैसे सही समय पर टीकाकरण, साफ-सफाई और संतुलित चारे से बकरियों में बीमारियां कम होती हैं और नुकसान घटता है।
पशुपालन विशेषज्ञों का मानना है कि बकरी पालन छोटे और सीमांत किसानों के लिए खासतौर पर उपयोगी है, क्योंकि इसमें शुरुआती निवेश कम होता है और यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का भी काम करता है। रामलाल की कहानी बताती है कि बड़ी पूंजी के बिना भी धीरे-धीरे अपने पशुधन को बढ़ाकर स्थायी आमदनी का जरिया खड़ा किया जा सकता है।
मुंगेली जैसे इलाकों में जहां खेती योग्य जमीन सीमित है, वहां पशुपालन किसानों के लिए खेती के साथ अतिरिक्त कमाई का जरिया बन रहा है। रामलाल जैसे किसानों के अनुभव से यह भी साफ होता है कि धैर्य और नियमित देखभाल से छोटे स्तर पर शुरू किया गया काम भी वक्त के साथ परिवार की आर्थिक स्थिति बदल सकता है।
गांव के लिए बना सीखने का केंद्र
रामलाल के बाड़े में अब बकरियों की देखभाल के लिए अलग से छायादार शेड बनाया गया है, जिससे गर्मी और बारिश दोनों में उनकी सेहत पर असर कम पड़े। वे बताते हैं कि नियमित कृमि-नाशक दवा देने और समय-समय पर पशु चिकित्सक से जांच कराने से बकरियों में बीमारी की आशंका काफी कम हो जाती है। बकरियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए वे अब नर बकरों को स्थानीय हाट-बाजार के साथ शहर के व्यापारियों को भी सीधे बेचने लगे हैं, जिससे उन्हें बिचौलियों के मुकाबले बेहतर दाम मिल पाता है।
सुरही और आसपास के गांवों में अब कई परिवार रामलाल के तरीके को अपनाकर छोटे स्तर पर बकरी पालन शुरू कर चुके हैं। गांव के सरपंच और स्थानीय कृषि विस्तार कार्यकर्ता भी समय-समय पर उनके बाड़े का दौरा कर नए किसानों को वहीं व्यावहारिक प्रशिक्षण दिलाने की कोशिश करते हैं।
रामलाल का कहना है कि अगर सही जानकारी और नियमित देखभाल की आदत बन जाए, तो बकरी पालन खेती के साथ-साथ परिवार के लिए एक भरोसेमंद अतिरिक्त आय का स्थायी जरिया बन सकता है। उनकी कहानी मुंगेली जैसे उन इलाकों के लिए भी मिसाल है, जहां खेती की जमीन सीमित होने के बावजूद किसान पशुपालन के सहारे धीरे-धीरे अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकते हैं।
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