राज्य कृषि समाचार (State News)

मध्य भारत में कमजोर मानसून की आशंका, किसान कैसे बचाएं अपनी खेती?

लेखक: अंशिका बघेल, डॉ. भरत सिंह, डॉ. अंजली भार्गव, डॉ. दिव्या भायल, डॉ. आस्था पाण्डेय, कृषि महाविद्यालय, इंदौर

04 जुलाई 2026, भोपाल: मध्य भारत में कमजोर मानसून की आशंका, किसान कैसे बचाएं अपनी खेती? – इस वर्ष मानसून को लेकर किसानों की चिंता बढ़ती दिखाई दे रही है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस साल सामान्य से कम बारिश और पानी के असमान वितरण की संभावना जताई जा रही है। खासतौर पर मध्य भारत, जहां की खेती मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर है, वहां चिंता “कम बारिश” से ज्यादा “बीच मानसून में लंबे ड्राई स्पेल (सूखे का अंतराल)” को लेकर मानी जा रही है। यानी मानसून समय पर आने और बुवाई होने के बाद भी कई दिनों या हफ्तों तक बारिश रुक सकती है, जिसका सीधा असर खरीफ फसलों पर पड़ेगा।

मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे क्षेत्र मानसून के सबसे संवेदनशील कृषि क्षेत्र हैं। यहां बड़ी संख्या में किसान खेती के लिए बारिश पर निर्भर रहते हैं। इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से काली मिट्टी पाई जाती है। सुनने में 15 से 20 प्रतिशत कम वर्षा का आंकड़ा छोटा लग सकता है, लेकिन काली मिट्टी में लंबे समय तक बारिश न होने पर गहरी दरारें पड़ने लगती हैं, जिससे जमीन की बची हुई नमी भी तेजी से खत्म होने लगती है। वर्षा आधारित खेती करने वाले किसानों के लिए यही अंतर अच्छी पैदावार और भारी नुकसान के बीच की दूरी बन जाता है।

क्यों बढ़ रही है किसानों की चिंता?

पिछले कुछ वर्षों में मानसून का स्वरूप तेजी से बदला है। पहले जहां ज्यादातर संतुलित बारिश होती थी, वहीं अब कुछ ही दिनों में भारी वर्षा और फिर लंबे समय तक सूखे जैसे हालात देखने को मिलते हैं। कई बार मानसून समय पर आता है, किसान बुवाई भी कर लेते हैं, लेकिन उसके बाद कई दिनों या हफ्तों तक बारिश पूरी तरह रुक जाती है। ऐसी स्थिति फसलों के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदायक बन जाती है।

IMD का पूर्वानुमान किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

कई किसान सोचते हैं कि मौसम विभाग की जानकारी केवल समाचारों के लिए होती है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है। मौसम पूर्वानुमान किसानों को पहले से संकेत देता है कि आने वाले महीनों में कौन-सी परिस्थितियां बन सकती हैं।

यदि किसान पहले से जान लें कि—

  • मानसून देर से आ सकता है,
  • वर्षा कम हो सकती है,
  • ड्राई स्पेल (सूखे का अंतराल) की संभावना बढ़ सकती है,
  • अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ सकती हैं,

तो वे अपनी खेती की रणनीति समय रहते बदल सकते हैं। खेती में जोखिम को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता, लेकिन तैयारी करके उसे काफी हद तक कम किया जा सकता है।

कम वर्षा से ज्यादा खतरनाक है “ड्राई स्पेल”

किसानों को अक्सर लगता है कि फसल केवल तब प्रभावित होती है जब बारिश कम हो। लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि कई बार सामान्य वर्षा होने के बावजूद उत्पादन घट जाता है, क्योंकि वर्षा का वितरण असमान होता है। मान लीजिए किसी किसान के क्षेत्र में पूरे मौसम में सामान्य वर्षा हुई, लेकिन उसका अधिकांश भाग केवल 10–15 दिनों में ही हो गया और फिर 20 दिनों तक बारिश नहीं हुई। ऐसी स्थिति में मिट्टी की नमी तेजी से कम हो जाती है और फसल तनाव (Stress) का शिकार हो जाती है।

सोयाबीन में यह समस्या विशेष रूप से फूल आने और फली बनने की अवस्था में अधिक नुकसान पहुंचाती है।

खरीफ फसलों पर सबसे ज्यादा असर

मध्य भारत में खरीफ मौसम के दौरान सोयाबीन, मक्का, धान, उड़द और मूंग जैसी फसलें बड़े पैमाने पर बोई जाती हैं। इन फसलों को शुरुआती अवस्था में पर्याप्त नमी की जरूरत होती है।

  • मानसून देर से आए,
  • बुवाई के बाद बारिश रुक जाए,
  • या फसल बढ़ने की अवस्था में लंबे समय तक सूखे जैसे हालात हो जाएं, तो अंकुरण, पौधों की वृद्धि और उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। विशेष रूप से सोयाबीन की फसल लंबे सूखे के अंतराल (ड्राई स्पेल) से बहुत जल्दी प्रभावित होती है। वहीं, अचानक अत्यधिक बारिश होने पर जलभराव और जड़ों में सड़न जैसी समस्याएं बढ़ने लगती हैं। यही कारण है कि अब किसानों को पुराने तरीकों को छोड़कर मौसम के अनुसार अपनी खेती के तरीकों को बदलने की जरूरत है।

खेत की नमी बचाना सबसे जरूरी

कम बारिश और लंबे ड्राई स्पेल की स्थिति में खेत की नमी ही फसल का सबसे बड़ा सहारा बनती है। यदि मिट्टी में नमी बनी रहती है, तो फसल कुछ समय तक बिना बारिश के भी टिक सकती है।

“ब्रॉड बेड एंड फरो (BBF)” या “रिज एंड फरो” पद्धति अपनाएं: कम और ज्यादा- दोनों प्रकार की वर्षा का समाधान:

पारंपरिक समतल बुवाई के बजाय फसलों को मेड़ों (Beds/Ridges) पर बोएं और दोनों ओर नालियां (Furrows) बनाएं। यह तकनीक मध्य भारत की काली मिट्टी के लिए बेहद उपयोगी मानी जाती है।

इसके फायदे

  • अधिक वर्षा होने पर अतिरिक्त पानी निकल जाता है।
  • कम वर्षा होने पर नमी लंबे समय तक बनी रहती है।
  • जड़ों का विकास बेहतर होता है।
  • जड़ सड़न और जलभराव का खतरा कम होता है।

मेड़बंदी करें: सबसे सस्ता और सबसे प्रभावी उपाय

खेत के चारों ओर मजबूत मेड़ बनाएं। कई किसान इसे सामान्य कार्य समझते हैं, लेकिन वास्तव में मेड़बंदी वर्षा जल संरक्षण की पहली सीढ़ी है।

जब खेत की मेड़ मजबूत होती है, तो

  • पानी तेजी से बाहर नहीं जाता।
  • मिट्टी का कटाव कम होता है।
  • अधिक पानी मिट्टी में समा जाता है।
  • नमी लंबे समय तक बनी रहती है।

जहां मेड़बंदी नहीं होती, वहां बारिश का बड़ा हिस्सा बहकर खेत से बाहर चला जाता है।

फसल अवशेष न जलाएं, मल्चिंग (पलवार) अपनाएं

जब मिट्टी खुली रहती है, तो सूर्य की गर्मी से बड़ी मात्रा में पानी भाप बनकर उड़ जाता है। फसल अवशेष जलाने से मिट्टी के जीवाणु और जैविक कार्बन दोनों नष्ट हो जाते हैं।

यदि किसान भूसा, सूखी घास या फसल अवशेष को मिट्टी की सतह पर फैला दें, तो यह मिट्टी के लिए “कवच” का काम करता है और तेज धूप में भी पानी को भाप बनकर उड़ने से रोकता है।

लाभ

  • नमी संरक्षण
  • खरपतवार नियंत्रण
  • मिट्टी का तापमान संतुलित रहता है।
  • मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है।

जैविक खाद बढ़ाएं

जिन खेतों में जैविक पदार्थ अधिक होता है, वहां सूखे का असर अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।

जैविक खाद की मात्रा बढ़ाएं:

मिट्टी में जितना अधिक जैविक पदार्थ होगा, उतनी अधिक पानी रोकने की क्षमता होगी। इसलिए गोबर खाद, कम्पोस्ट और वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग बढ़ाएं। इनसे मिट्टी की जलधारण क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। जिन खेतों में जैविक पदार्थ ज्यादा होता है, वे सूखे को बेहतर सहन करते हैं।

जोखिम और समाधान : एक नजर में

किसान भाई इस तालिका को तुरंत समझ सकते हैं कि मौसम के बदलाव से उन्हें क्या कदम उठाने हैं –

मानसून की स्थितिफसल पर संभावित असरकिसान क्या करें?
मानसून में देरी होनाबुवाई देर से होनाकम अवधि में पकने वाली किस्में चुनें
बुवाई के बाद लंबे समय तक रुकना (ड्राई स्पेल)अंकुरण और पौधों की वृद्धि प्रभावितBBF (ब्रॉड बेड फरो) या बारिश का रिज-पट्टा पद्धति अपनाएं।
फूल और दाने आते समय सूखादाने कम बनना/हल्केजीवन रक्षक सिंचाई या पत्तियों पर स्प्रे का सही छिड़काव करें।
अचानक अत्यधिक भारी बारिशखेत में जलभराव और जड़खेत से पानी निकालें (जल निकास) सड़न रोग का रास्ता साफ रखें।

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