छिंदवाड़ा के किसान ने केले और समन्वित खेती से बदली तस्वीर, सालाना मुनाफा 10 लाख रुपए
29 अक्टूबर 2026, छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश): छिंदवाड़ा के किसान ने केले और समन्वित खेती से बदली तस्वीर, सालाना मुनाफा 10 लाख रुपए – मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के हरई ब्लॉक स्थित भुमका गांव के किसान पूरनलाल ने अपनी छह एकड़ जमीन पर केले की प्राकृतिक खेती और समन्वित कृषि मॉडल अपनाकर अपनी आर्थिक स्थिति पूरी तरह बदल दी है। वे अब सालाना करीब 10 लाख रुपए का मुनाफा कमा रहे हैं।
पूरनलाल ने अपने खेत में टिश्यू कल्चर से तैयार केले की जी-9 किस्म लगाई है, और खेती पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से करते हैं। इस साल सिर्फ एक एकड़ के केले से ही उन्हें करीब 4 लाख रुपए की कमाई हुई। प्राकृतिक तरीके से उगाया गया उनका केला बाजार में करीब 25 रुपए प्रति किलो के भाव बिकता है, जबकि सामान्य तरीके से उगाया गया केला 15 से 18 रुपए प्रति किलो के बीच बिकता है।
केले से लेकर मुर्गी, बकरी और मछली पालन तक
पूरनलाल ने अपनी जमीन पर सिर्फ केले तक खुद को सीमित नहीं रखा है। खेत में बैंगन, टमाटर और मक्का जैसी सब्जियों और अनाज की फसलों के साथ-साथ आम, कटहल, आंवला, सेब, ड्रैगन फ्रूट, नींबू, संतरा और काजू के पौधे भी लगाए गए हैं। इससे साल भर कोई न कोई फसल या फल उनके खेत से निकलता रहता है।
खेती के साथ-साथ उन्होंने कड़कनाथ मुर्गी पालन, बकरी पालन और मछली पालन को भी अपनी आय का हिस्सा बनाया है। इससे उनकी कमाई सिर्फ एक फसल पर निर्भर नहीं रह गई, और मौसम की मार या बाजार में किसी एक उपज के दाम गिरने पर भी उनकी आमदनी पर ज्यादा असर नहीं पड़ता।
पूरनलाल अपने खेत में सिंचाई के लिए ड्रिप पद्धति का इस्तेमाल करते हैं, जिससे पानी की बचत होती है और हर पौधे को जरूरत के मुताबिक ही पानी मिलता है। खेत में बचे फसल अवशेषों से वे खुद खाद तैयार करते हैं, जिससे धीरे-धीरे उनकी मिट्टी की गुणवत्ता और उर्वरता भी बेहतर हुई है।
जबलपुर मंडी में बनी अलग पहचान
पूरनलाल का केला अब सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है। जबलपुर मंडी में उनकी उपज को “छिंदवाड़ा का केला” के नाम से पहचाना जाता है, जो उनके लिए एक तरह की अलग ब्रांड पहचान बन गई है। इससे व्यापारी और खरीदार सीधे उनके केले को पहचानकर खरीदते हैं।
समन्वित खेती मॉडल अपनाने से पहले पूरनलाल की आय ज्यादातर परंपरागत खेती पर निर्भर थी, जिसमें मौसम की अनिश्चितता का बड़ा असर पड़ता था। फल, सब्जी, अनाज और पशुपालन को एक साथ जोड़ने के बाद उनकी सालाना आय में लगातार सुधार हुआ है।
छिंदवाड़ा और आसपास के इलाकों के किसानों के लिए पूरनलाल का यह मॉडल एक मिसाल की तरह देखा जा रहा है, जिसमें कम जमीन पर भी विविधीकरण के जरिए अच्छी आय हासिल की जा सकती है। कृषि विभाग के अधिकारी भी समय-समय पर उनके खेत का दौरा करते रहे हैं, और आसपास के किसानों को उनसे प्रेरणा लेने की सलाह देते हैं।
छिंदवाड़ा जिले का भुमका गांव पहले परंपरागत तौर पर मुख्य रूप से अनाज वाली फसलों पर निर्भर रहा है, जहां बारिश और बाजार भाव की अनिश्चितता हर साल किसानों के लिए चिंता का विषय बनी रहती थी। पूरनलाल ने धीरे-धीरे अपने खेत को फल, सब्जी और पशुपालन को जोड़ते हुए एक समन्वित मॉडल में बदला, जिससे उनकी आय के स्रोत एक से बढ़कर कई हो गए।
केले की फसल को उन्होंने इस मॉडल का केंद्र बनाया, क्योंकि इससे साल में अच्छी नकद आमदनी मिल जाती है, जबकि आम, कटहल, आंवला और काजू जैसे फलदार पेड़ आगे आने वाले वर्षों में लंबी अवधि की आय का जरिया बनेंगे। इस तरह उनका खेत अलग-अलग समय पर पकने वाली फसलों से साल भर किसी न किसी रूप में आय देता रहता है।
पशुपालन को जोड़ने का फायदा यह भी हुआ कि खेत को गोबर और अन्य जैविक खाद आसानी से उपलब्ध होने लगी, जिससे बाहर से रासायनिक खाद खरीदने पर होने वाला खर्च घटा है। इससे खेती की कुल लागत में भी कमी आई है, और प्राकृतिक तरीके से उगाई गई उपज को बाजार में बेहतर दाम भी मिल रहा है।
पूरनलाल का कहना है कि उनकी योजना आने वाले समय में फलदार पेड़ों का क्षेत्र और बढ़ाने की है, ताकि केले के साथ-साथ दूसरे फलों से भी स्थिर आय मिलती रहे। आसपास के कई किसान अब उनसे मिलकर इस मॉडल को समझने और अपने खेत में अपनाने की कोशिश में जुटे हैं।
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