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राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

देश में दलहन उत्पादन में बड़ा बदलाव, मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी घटी; महाराष्ट्र और गुजरात आगे बढ़े

राजस्थान तीसरे स्थान पर, छत्तीसगढ़ के उत्पादन में गिरावट; 2015-16 से 2024-25 के आंकड़े दलहन क्षेत्र में बदलते फसल परिदृश्य की कहानी कहते हैं

लेखक: डॉ संदीप शर्मा

28 अक्टूबर 2026, नई दिल्ली: देश में दलहन उत्पादन में बड़ा बदलाव, मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी घटी; महाराष्ट्र और गुजरात आगे बढ़े – उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2015-16 से 2024-25 के बीच देश के प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों की स्थिति में उल्लेखनीय बदलाव आया है। मध्य प्रदेश लंबे समय तक देश में दलहन उत्पादन का अग्रणी राज्य रहा है और 2024-25 में भी वह पहले स्थान पर बना हुआ है, लेकिन राष्ट्रीय उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी कम हुई है। दूसरी ओर, महाराष्ट्र और गुजरात ने उत्पादन में बड़ी वृद्धि दर्ज कर अपनी स्थिति मजबूत की है। राजस्थान तीसरे स्थान पर पहुंचा है, जबकि छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में उत्पादन घटा है।

इन आंकड़ों का सबसे महत्वपूर्ण संकेत यह है कि देश के कुल दलहन उत्पादन में वृद्धि के साथ उत्पादन का भौगोलिक केंद्र भी बदल रहा है। इससे मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे मध्य भारत के राज्यों के लिए दलहन उत्पादन, उत्पादकता और किसानों की लाभप्रदता पर नए सिरे से ध्यान देने की आवश्यकता सामने आती है।

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मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 32.48 से घटकर 20.39 प्रतिशत

वर्ष 2015-16 में मध्य प्रदेश का दलहन उत्पादन 53.02 लाख टन था, जो 2024-25 में मामूली गिरावट के साथ 52.38 लाख टन रह गया। इस अवधि में देश का कुल दलहन उत्पादन 163.23 लाख टन से बढ़कर 256.83 लाख टन हो गया। यानी राष्ट्रीय उत्पादन में 57.34 प्रतिशत की वृद्धि हुई, लेकिन मध्य प्रदेश का उत्पादन 1.21 प्रतिशत घट गया।

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इसका सीधा असर राष्ट्रीय उत्पादन में प्रदेश की हिस्सेदारी पर पड़ा। वर्ष 2015-16 में देश के कुल दलहन उत्पादन में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 32.48 प्रतिशत थी, जो 2024-25 में घटकर 20.39 प्रतिशत रह गई। इस तरह प्रदेश की हिस्सेदारी में 12.09 प्रतिशत अंक की कमी आई। हालांकि मध्य प्रदेश देश में पहले स्थान पर बना हुआ है, लेकिन राष्ट्रीय उत्पादन में उसका सापेक्ष योगदान काफी कम हुआ है।

राजस्थान में दलहन उत्पादन लगभग दोगुना

राजस्थान ने इस अवधि में उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 2015-16 में राज्य का दलहन उत्पादन 19.90 लाख टन था, जो 2024-25 में बढ़कर 39.28 लाख टन हो गया। इस प्रकार उत्पादन में 97.39 प्रतिशत की वृद्धि हुई और राजस्थान दूसरे स्थान से तीसरे स्थान पर नहीं, बल्कि तीसरे स्थान से तीसरे स्थान पर? नहीं—तालिका के अनुसार राजस्थान 2015-16 में दूसरे स्थान पर था और 2024-25 में तीसरे स्थान पर आ गया, क्योंकि महाराष्ट्र उससे आगे निकल गया।

राजस्थान की राष्ट्रीय उत्पादन में हिस्सेदारी भी 12.19 प्रतिशत से बढ़कर 15.29 प्रतिशत हो गई। इससे स्पष्ट है कि उत्पादन बढ़ने के बावजूद दूसरे राज्यों में इससे भी तेज वृद्धि के कारण उसकी रैंकिंग में बदलाव आया।

छत्तीसगढ़ में उत्पादन और राष्ट्रीय हिस्सेदारी दोनों घटीं

छत्तीसगढ़ में दलहन उत्पादन का रुझान चिंताजनक है। वर्ष 2015-16 में राज्य में 5.12 लाख टन दलहन का उत्पादन हुआ था, जो 2024-25 में घटकर 4.01 लाख टन रह गया। इस अवधि में उत्पादन में 21.68 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

राष्ट्रीय उत्पादन में छत्तीसगढ़ की हिस्सेदारी भी 3.14 प्रतिशत से घटकर 1.56 प्रतिशत रह गई। यानी राज्य की हिस्सेदारी लगभग आधी हो गई। यह स्थिति दलहन की खेती के रकबे, उत्पादकता, फसल चयन और किसानों को मिलने वाले आर्थिक प्रोत्साहनों की समीक्षा की जरूरत दर्शाती है। हालांकि, केवल इन आंकड़ों के आधार पर गिरावट के किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

प्रमुख राज्यों में उत्पादन की तुलनात्मक स्थिति

उत्पादन लाख टन में; हिस्सेदारी देश के कुल उत्पादन में प्रतिशत के रूप में।

स्रोत: UPAg.gov.in पर आधारित उपलब्ध चित्र में दिए गए आंकड़े। प्रतिशत बदलाव मूल तालिका के अनुसार हैं।

महाराष्ट्र और गुजरात की तेज बढ़त ने बदला राष्ट्रीय परिदृश्य

महाराष्ट्र का दलहन उत्पादन 15.45 लाख टन से बढ़कर 50.35 लाख टन हो गया। इस प्रकार राज्य ने 225.89 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की और 2024-25 में देश में दूसरे स्थान पर पहुंच गया। गुजरात ने भी 5.44 लाख टन से 20.22 लाख टन तक पहुंचकर 271.69 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। उत्पादन वृद्धि की दृष्टि से गुजरात इन प्रमुख राज्यों में सबसे आगे रहा।

उत्तर प्रदेश में उत्पादन 11.65 लाख टन से बढ़कर 26.31 लाख टन और झारखंड में 5.27 लाख टन से बढ़कर 9.63 लाख टन हो गया। इन राज्यों की प्रगति बताती है कि दलहन उत्पादन में वृद्धि केवल पारंपरिक अग्रणी राज्यों तक सीमित नहीं रही।

इसके विपरीत, आंध्र प्रदेश में उत्पादन 18.96 प्रतिशत, तमिलनाडु में 34.59 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 21.68 प्रतिशत घटा। ओडिशा का उत्पादन बढ़ने के बावजूद राष्ट्रीय हिस्सेदारी 2.30 प्रतिशत से घटकर 2.01 प्रतिशत रही। यह अंतर बताता है कि किसी राज्य का उत्पादन बढ़ना और राष्ट्रीय उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी बढ़ना दो अलग-अलग बातें हैं।

मध्य भारत के लिए क्या हैं संकेत?

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की स्थिति को साथ रखकर देखने पर तीन अलग-अलग तस्वीरें सामने आती हैं।

मध्य प्रदेश: उत्पादन लगभग स्थिर रहा, लेकिन देश के कुल उत्पादन में हिस्सेदारी घटी। प्रदेश के लिए उत्पादकता बढ़ाना और उत्पादन में ठहराव के कारणों की पहचान करना महत्वपूर्ण होगा।

राजस्थान: उत्पादन लगभग दोगुना हुआ और राष्ट्रीय हिस्सेदारी में भी वृद्धि दर्ज की गई। यह राज्य की दलहन खेती में बढ़ती भूमिका का संकेत है।

छत्तीसगढ़: उत्पादन और राष्ट्रीय हिस्सेदारी दोनों में गिरावट दर्ज हुई। राज्य में दलहन क्षेत्र की चुनौतियों का फसलवार विश्लेषण जरूरी है।

इन राज्यों की तुलना से यह भी स्पष्ट होता है कि दलहन क्षेत्र की रणनीति केवल कुल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रह सकती। फसलवार उत्पादकता, उपयुक्त किस्मों का चयन, सिंचाई, प्रमाणित बीजों की उपलब्धता, कीट एवं रोग प्रबंधन, बाजार तक पहुंच और लाभकारी मूल्य जैसे पहलुओं पर एक साथ काम करना होगा।

निष्कर्ष: उत्पादन बढ़ाने के साथ हिस्सेदारी बचाने की चुनौती

वर्ष 2015-16 से 2024-25 के बीच देश के कुल दलहन उत्पादन में 57.34 प्रतिशत की वृद्धि उत्साहजनक है। लेकिन इस वृद्धि का लाभ सभी राज्यों को समान रूप से नहीं मिला। मध्य प्रदेश अब भी देश का सबसे बड़ा दलहन उत्पादक राज्य है, पर उसकी राष्ट्रीय हिस्सेदारी में आई गिरावट एक महत्वपूर्ण संकेत है। राजस्थान ने उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि की है, जबकि छत्तीसगढ़ में गिरावट चिंता का विषय है।

आगे की नीति में मध्य प्रदेश की अग्रणी स्थिति को मजबूत करने, राजस्थान की उत्पादन वृद्धि से सीख लेने और छत्तीसगढ़ में गिरावट के कारणों की पहचान करने पर ध्यान देना होगा। साथ ही महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में तेज वृद्धि के पीछे फसलवार रुझानों और कृषि पद्धतियों का अध्ययन भी उपयोगी होगा।

स्पष्ट है कि दलहन में आत्मनिर्भरता की दिशा में राष्ट्रीय उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ राज्यों की उत्पादकता, प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और किसानों की आय पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।

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