राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

भारत की अगली कृषि क्रांति के लिए क्यों जरूरी हैं 10 लाख कृषि-एमएसएमई

प्रवेश शर्मा, अध्यक्ष, संचालन समिति, नेशनल एसोसिएशन फॉर फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशंस (NAFPO)। पूर्व प्रबंध निदेशक, SFAC एवं पूर्व कृषि सचिव, मध्य प्रदेश।

02 जुलाई 2026, नई दिल्ली: भारत की अगली कृषि क्रांति के लिए क्यों जरूरी हैं 10 लाख कृषि-एमएसएमई – भारत ने पिछले लगभग छह दशकों का अधिकांश समय कृषि की एक बड़ी चुनौती का समाधान खोजने में लगाया है—अधिक उत्पादन कैसे किया जाए। हरित क्रांति के बाद से सरकारी नीतियों का मुख्य फोकस सिंचाई, उन्नत बीज, उर्वरक, कृषि यंत्रीकरण, ग्रामीण ऋण और सरकारी खरीद पर रहा। यह रणनीति सफल भी रही। देश ने अकाल और खाद्यान्न की स्थायी कमी जैसी समस्याओं पर विजय प्राप्त की और आज भारत खाद्यान्न अधिशेष राष्ट्र बन चुका है।

आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक है तथा अनाज, फल, सब्जियां, दलहन और मत्स्य उत्पादन में अग्रणी देशों में शामिल है। इसके साथ ही भारत अनेक कृषि उत्पादों का महत्वपूर्ण निर्यातक भी है। लेकिन इन उल्लेखनीय उपलब्धियों के बावजूद कृषि आज भी कम आय, अधरोज़गारी और ग्रामीण संकट से जुड़ी हुई दिखाई देती है। आखिर ऐसा क्यों?

इसका उत्तर एक सरल लेकिन अक्सर नजरअंदाज किए जाने वाले तथ्य में छिपा है। भारतीय कृषि की सबसे बड़ी चुनौती अब उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि उत्पादन से मूल्य सृजन (Value Creation) करना है।

जब किसान अपनी फसल मंडी में बेच देता है या कोई महिला डेयरी सहकारी समिति में दूध जमा कर देती है, तभी उस उत्पाद की वास्तविक आर्थिक यात्रा शुरू होती है। किसान से उत्पाद व्यापारी, एग्रीगेटर, थोक विक्रेता, प्रोसेसर, वितरक और खुदरा विक्रेता तक पहुंचता है और अंततः उपभोक्ता के हाथों में जाता है। इस पूरी श्रृंखला का हर चरण मूल्य जोड़ता है, रोजगार पैदा करता है और लाभ कमाता है, लेकिन इनमें से अधिकांश गतिविधियां गांवों से दूर होती हैं, जहां यह उत्पादन होता है। किसान केवल कच्चा उत्पाद बेचता है, जबकि उसके आधार पर दूसरे लोग बड़े व्यवसाय खड़े कर लेते हैं।

भारत को आज नई सब्सिडी, अतिरिक्त उत्पादन प्रोत्साहन या नई सरकारी खरीद व्यवस्था की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी गांवों और उनके आसपास कृषि आधारित सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) के मजबूत नेटवर्क की जरूरत है, जो कृषि उत्पादों में गांव से बाहर जाने से पहले ही मूल्य संवर्धन कर सकें।

यही “मिसिंग मिडिल” भारतीय कृषि की अनेक संरचनात्मक कमजोरियों का मुख्य कारण है। आज भी फलों और सब्जियों का बड़ा हिस्सा कटाई के बाद खराब हो जाता है क्योंकि भंडारण, ग्रेडिंग और प्रसंस्करण की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। अधिकांश दूध तरल रूप में ही बिक जाता है, जबकि अपेक्षाकृत कम लागत वाली उपलब्ध तकनीकों से उसे पनीर, चीज़, मक्खन और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों में बदला जा सकता है।

इसी तरह मछलियां खुले क्रेट या टोकरियों में थोक बाजारों तक पहुंचाई जाती हैं, जबकि यदि उनका प्रसंस्करण मछली उतराई केंद्रों के पास ही हो तो किसानों और मछुआरों को कहीं अधिक लाभ मिल सकता है। पशुधन भी जीवित अवस्था में बेचा जाता है, जबकि उसके लिए संगठित मूल्य श्रृंखला विकसित की जा सकती है, जिसमें नस्ल सुधार, पशु आहार, पशु चिकित्सा सेवाएं, प्रसंस्करण और विपणन शामिल हों। लगभग हर क्षेत्र की कहानी यही है।

भारत ने कृषि उत्पादन बढ़ाने में तो भारी निवेश किया, लेकिन खेतों के आसपास ऐसे उद्यम विकसित करने में अपेक्षाकृत बहुत कम निवेश किया जो उत्पादन को आय में बदल सकें। वर्तमान में कृषि क्षेत्र से जुड़े लगभग 10 लाख एमएसएमई कार्यरत हैं, लेकिन इनमें अधिकांश इनपुट आपूर्ति और व्यापार तक ही सीमित हैं। मूल्य संवर्धन से जुड़ा बुनियादी ढांचा अभी भी मुख्यतः औद्योगिक और शहरी क्षेत्रों में केंद्रित है।

नीतिगत चर्चाएं आज भी मुख्य रूप से फसल उत्पादन पर केंद्रित रहती हैं, जबकि भारतीय कृषि की संरचना बदल चुकी है। आज डेयरी, पशुपालन, पोल्ट्री और मत्स्य क्षेत्र मिलकर कृषि उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा बनाते हैं और पिछले एक दशक में इनकी वृद्धि फसल उत्पादन की तुलना में अधिक तेज रही है। फिर भी इन क्षेत्रों की सबसे बड़ी कमजोरी वही है—ऐसे हजारों छोटे और मध्यम उद्यमों की कमी, जो संग्रहण, चिलिंग, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स और विपणन जैसी सेवाएं उपलब्ध करा सकें। वास्तविक बाधा खेत पर नहीं, बल्कि खेत और बाजार के बीच मौजूद है।

यही वह खाली स्थान है, जिस पर भारत की अगली कृषि रणनीति आधारित होनी चाहिए। अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि एक करोड़ टन अतिरिक्त अनाज कैसे पैदा किया जाए, बल्कि यह होना चाहिए कि एक करोड़ किसानों की आय बढ़ाने के लिए 10 लाख नए ग्रामीण उद्यम कैसे स्थापित किए जाएं।

कल्पना कीजिए ऐसे गांव की, जहां किसान कटाई के तुरंत बाद फसल बेचने को मजबूर न हों क्योंकि स्थानीय उद्यम दालों की सफाई, ग्रेडिंग और पैकेजिंग कर उन्हें खुदरा बाजार तक पहुंचाते हों या बेहतर दाम मिलने तक सुरक्षित भंडारण की सुविधा उपलब्ध कराते हों। जहां डेयरी इकाई दूध को मूल्यवर्धित उत्पादों में बदल रही हो। जहां मछली संग्रहण केंद्र सीधे निर्यातकों से जुड़े हों। जहां कोल्ड स्टोरेज सब्जियों की शेल्फ लाइफ बढ़ा रहे हों और डिजिटल उद्यम प्रीमियम घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए ट्रेसबिलिटी तथा गुणवत्ता प्रमाणन उपलब्ध करा रहे हों।

ऐसे प्रत्येक उद्यम स्थानीय लोगों को रोजगार देगा, गांवों में आय को बनाए रखेगा और आपूर्ति श्रृंखला को छोटा करेगा। सामूहिक रूप से ये कृषि को केवल उत्पादन आधारित व्यवस्था से निकालकर मूल्य सृजन आधारित अर्थव्यवस्था में बदल देंगे।

भारत के पास इस परिवर्तन के लिए आवश्यक अधिकांश आधार पहले से मौजूद हैं। देश में हजारों सहकारी समितियां और किसान उत्पादक संगठन (FPO), स्वयं सहायता समूहों का विशाल नेटवर्क, ग्रामीण उद्यमी, बेहतर ग्रामीण सड़कें और राष्ट्रीय राजमार्ग मौजूद हैं। मोबाइल नेटवर्क और स्मार्टफोन की व्यापक पहुंच ने सूचना, शिक्षा, बाजार भाव और उपभोक्ता मांग तक किसानों की पहुंच में पहले ही क्रांतिकारी बदलाव ला दिया है।

जिस चीज़ की कमी है, वह है एक ऐसी राष्ट्रीय रणनीति, जो कृषि को केवल कच्चे उत्पाद उपलब्ध कराने वाला क्षेत्र नहीं, बल्कि उद्यमों के व्यापक इकोसिस्टम के रूप में देखे।

आने वाले दस वर्षों में संग्रहण, भंडारण, प्रसंस्करण, डेयरी, मत्स्य, पशुपालन, पोल्ट्री, लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और डिजिटल सेवाओं जैसे क्षेत्रों में 10 लाख कृषि आधारित एमएसएमई स्थापित करने का राष्ट्रीय मिशन शुरू किया जाना चाहिए। ऐसा अभियान ग्रामीण भारत में अभूतपूर्व स्तर पर रोजगार पैदा करेगा, कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करेगा, किसानों की आय बढ़ाएगा और खाद्य अर्थव्यवस्था को अधिक मजबूत एवं टिकाऊ बनाएगा। इसके लिए वर्तमान संस्थागत ढांचे में किसी बड़े बदलाव की आवश्यकता भी नहीं होगी। जैसे-जैसे बाजार की मांग बढ़ेगी, वैसे-वैसे अनाज आधारित कृषि से विविधीकृत कृषि की ओर बदलाव स्वतः होता जाएगा।

इतिहास बताता है कि भारत की सबसे बड़ी कृषि सफलताएं तब मिली हैं, जब देश ने किसी बड़े राष्ट्रीय विचार को मिशन के रूप में अपनाया। हरित क्रांति ने उत्पादन में बदलाव लाया और ऑपरेशन फ्लड ने डेयरी क्षेत्र में क्रांति कर दी। अब अगली कृषि क्रांति का उद्देश्य केवल अधिक उत्पादन नहीं, बल्कि अधिक मूल्य सृजन होना चाहिए।

भारतीय कृषि का भविष्य केवल खेतों में उगने वाली फसल तय नहीं करेगी, बल्कि कटाई के बाद विकसित होने वाले उद्यम तय करेंगे। यदि भारत अगले दशक में 10 लाख कृषि आधारित एमएसएमई स्थापित करने का राष्ट्रीय मिशन शुरू करता है, तो यह ग्रामीण विकास की सबसे महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकती है।

NAFPO के बारे में

नेशनल एसोसिएशन फॉर फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशंस (NAFPO) एक गैर-लाभकारी, बहु-हितधारक राष्ट्रीय मंच है, जिसका उद्देश्य किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को सशक्त बनाकर किसानों की समृद्धि सुनिश्चित करना है। NAFPO डिजिटल तकनीक, क्षमता निर्माण, नीतिगत सहयोग और बाजार संपर्क के माध्यम से एफपीओ इकोसिस्टम को मजबूत करता है। इसका लक्ष्य ऐसे किसान-नेतृत्व वाले संस्थानों का निर्माण करना है, जो छोटे किसानों को वित्त, तकनीक, बाजार और बेहतर शासन व्यवस्था तक पहुंच प्रदान करते हुए समावेशी एवं टिकाऊ कृषि परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करें।

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