मॉनसून से पहले लू और अल नीनो का खतरा, खरीफ फसलों पर मंडरा रहा संकट
लेखक: शशिकांत त्रिवेदी , वरिष्ठ पत्रकार
21 मई 2026, नई दिल्ली: मॉनसून से पहले लू और अल नीनो का खतरा, खरीफ फसलों पर मंडरा रहा संकट – इस साल गर्मी के मौसम में लंबे समय तक चलने वाली लू, मॉनसून के असमान वितरण और अल नीनो से जुड़े सूखे का खतरा भारत के वर्षा-आधारित कृषि क्षेत्रों में चावल, दालों, तिलहनों और अन्य प्रमुख फसलों की पैदावार को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। पिछले कुछ दिनों में दुनिया भर से मानसून को लेकर विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि भारत जैसे देश के पश्चिमी, उत्तरी और मध्य भागों में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के आगमन से पहले ही भीषण गर्मी और लू की स्थिति बनी हुई है और अल नीनो के प्रभाव के कारण इस बार मॉनसून सामान्य से कमजोर रहने की संभावना है।
इसके कारण तापमान कई इलाकों में सामान्य से दो तीन डिग्री तक ज़्यादा है. यह बढ़ी हुई गर्मी पौधों में तनाव उत्पन्न करती है, जिससे फूलों का खिलना, दानों का बनना और फसल की सारी विकास प्रक्रिया प्रभावित होती है। नतीजतन फसलों की मात्रा और गुणवत्ता दोनों में गिरावट आ जाती है। उदाहरणस्वरूप, चावल की पैदावार में 32 से 40 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। विशेष रूप से वर्षा पर निर्भर कृषि क्षेत्र, जो देश के कुल खाद्य उत्पादन का लगभग 40 प्रतिशत योगदान देता है, इस बार गंभीर जोखिम का सामना कर रहा है। किसान मॉनसून की बारिश का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक इसके 26 मई तक पहुंचने की उम्मीद है। अल नीनो के कारण बादलों का आवरण कम हो जाता है, आकाश साफ रहता है और मिट्टी की नमी तेजी से घट जाती है।
इससे जमीन की सतह शीघ्र गर्म होती है और लू की घटनाएँ अधिक तीव्र, बार-बार और लंबे समय तक चलने वाली हो जाती हैं। लंबे समय तक चलने वाली लू और सामान्य से कम या अपर्याप्त बारिश, दोनों ही खरीफ फसलों के लिए चिंताजनक संकेत हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में सूखे का संकट गहरा सकता है और फ्लैश ड्राउट की स्थिति पैदा हो सकती है। लेकिन इस साल की स्थितियाँ कोई अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि 1950 के दशक से लगातार बढ़ रहे औसत तापमान के दीर्घकालिक रुझान का हिस्सा हैं। कुछ प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय निवेश अनुसंधान कंपनियों के विशेषज्ञों ने स्पष्ट संकेत दिया है कि बढ़ती गर्मी सब्जियों, फलों, अनाजों, दालों और तिलहनों जैसी खरीफ फसलों की पैदावार और बाजार कीमतों दोनों पर गंभीर असर डाल रही है। अल नीनो की स्थिति मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने के कारण बनती है। इससे मॉनसून की बारिश कमजोर पड़ जाती है। अमेरिकी एजेंसी नेशनल ओशन एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने आशंका जताई है कि अल नीनो मई से जुलाई के बीच सक्रिय हो सकता है, जिसका मॉनसून की मात्रा, समय और क्षेत्रीय वितरण पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।
ऐतिहासिक आंकड़ों से भी यह चिंता साफ दिखती है। 2014, 2015, 2017, 2018 और 2023 जैसे सामान्य से कम बारिश वाले वर्षों में खरीफ अनाज उत्पादन में औसतन 0.09 प्रतिशत की वार्षिक गिरावट दर्ज की गई। वहीं 2016, 2019, 2020, 2021, 2022, 2024 और 2025 जैसे सामान्य या अधिक बारिश वाले वर्षों में यह विकास दर औसतन 4.5 प्रतिशत रही। समग्र कृषि उत्पादन की विकास दर में भी यही अंतर दिखता है। कम बारिश वाले वर्षों में औसत विकास दर 2.4 प्रतिशत रही, जबकि अच्छी बारिश वाले वर्षों में यह 5 प्रतिशत से अधिक रही। इन चुनौतियों से निपटने के लिए राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन के तहत जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को जिला स्तर पर बढ़ावा देना आवश्यक है। सूखा सहन करने वाली फसलों की नई किस्मों पर शोध को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अच्छी बात यह है कि वर्ष 2014 से 2025 के बीच 2,996 जलवायु-अनुकूल फसल किस्में जारी की जा चुकी हैं। उत्तर-पश्चिम भारत में गेहूं की गर्मी सहन करने वाली किस्मों को भी व्यापक स्तर पर अपनाया गया है।
इन किस्मों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए अधिक बीज बैंक स्थापित करने और जलवायु-अनुकूल प्रौद्योगिकी पैकेजों का प्रदर्शन करने की जरूरत है। विशेष रूप से सूखा प्रभावित संवेदनशील जिलों में ‘नेशनल इनोवेशंस इन क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर’ पहल के तहत जिला स्तर पर प्रभावी रणनीतियाँ बनाना समय की मांग है। उम्मीद है सरकार कोई प्रभावी क़दम उठाएगी। (लेखक भोपाल में वरिष्ठ पत्रकार हैं)
आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture

