2047 तक सभी देसी पशु नस्लों का 100% पंजीकरण लक्ष्य, भाकृअनुप के कार्यक्रम में बोले केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह
15 जनवरी 2026, नई दिल्ली: 2047 तक सभी देसी पशु नस्लों का 100% पंजीकरण लक्ष्य, भाकृअनुप के कार्यक्रम में बोले केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह – भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भाकृअनुप) द्वारा मंगलवार को नई दिल्ली स्थित ए. पी. शिंदे ऑडिटोरियम में पशु नस्ल पंजीकरण प्रमाणपत्र एवं नस्ल संरक्षण पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि 2047 तक सभी देसी पशु नस्लों का 100 प्रतिशत पंजीकरण करना भाकृअनुप का लक्ष्य है, जो विकसित भारत के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने देसी पशु नस्लों के संरक्षण को पर्यावरण, किसानों की आजीविका और सतत कृषि से जुड़ा बताते हुए इसे जन आंदोलन का स्वरूप देने पर ज़ोर दिया।
जानवरों से भारत का रिश्ता इकोलॉजिकल
श्री चौहान ने कहा कि भारत का जानवरों के साथ रिश्ता केवल आर्थिक या पोषण आधारित नहीं है, बल्कि यह गहराई से इकोलॉजिकल संतुलन से जुड़ा हुआ है।
उन्होंने कहा, “यह एक संतुलन का रिश्ता है। यदि इस संतुलन में गड़बड़ी होती है तो उसका सीधा असर पर्यावरण और धरती की भलाई पर पड़ता है।”
उन्होंने देशभर में देसी पशु नस्लों के संरक्षण के लिए कार्य कर रहे वैज्ञानिकों, संस्थानों और किसान समुदाय की सराहना करते हुए कहा कि उनके प्रयास केवल पशुओं को बचाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे जैव विविधता की रक्षा, ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने और सस्टेनेबल खेती के भविष्य को सुरक्षित कर रहे हैं।
देसी पशुधन खेती की अर्थव्यवस्था की रीढ़
केंद्रीय मंत्री ने वर्ष 2019 में शुरू की गई देसी पशु नस्ल संरक्षण की राष्ट्रीय पहल को एक सराहनीय कदम बताते हुए कहा कि देसी मवेशी, भैंस, मुर्गी और छोटे जुगाली करने वाले पशु देश की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।
उन्होंने कहा कि इन नस्लों का विकास सीधे तौर पर किसानों की समृद्धि, मजबूती और आय सुरक्षा से जुड़ा है।
पॉलिसी से आगे बढ़े जन आंदोलन
श्री चौहान ने कहा कि पशु नस्ल संरक्षण का यह मिशन केवल नीति और सम्मेलनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे गांवों, खेतों और किसान परिवारों तक पहुंचाकर जन आंदोलन बनाना होगा।
उन्होंने कहा कि योगदान देने वालों को पहचान देना आवश्यक है, क्योंकि इससे दूसरों को प्रेरणा मिलती है और प्रयासों को गति मिलती है। साथ ही, उन्होंने मीडिया से सकारात्मक कार्यों को अधिक दृश्यता देने की अपील की।
242 पशु नस्लें पंजीकृत, लक्ष्य 100%
इस अवसर पर भाकृअनुप के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि “विकसित भारत – पशुधन” का विज़न संरक्षण के साथ-साथ संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग पर केंद्रित है।
उन्होंने बताया कि 2008 से अब तक 242 पशु नस्लों का पंजीकरण किया जा चुका है। 2047 तक सभी देसी पशु नस्लों का शत-प्रतिशत पंजीकरण भाकृअनुप का लक्ष्य है।
डॉ. जाट ने आर्थिक कारणों से भैंसों की तुलना में मवेशियों की घटती संख्या पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि नस्ल पंजीकरण केवल संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जैविक संसाधनों पर संप्रभु अधिकार, किसानों के लिए लाभ-साझेदारी और बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है।
उन्होंने बताया कि ज़ीरो नॉन-डिस्क्रिप्ट एनिमल्स मिशन इन लक्ष्यों को आगे बढ़ा रहा है।
नस्ल संरक्षण पुरस्कार वितरित
कार्यक्रम में नई पहचानी गई पशु एवं पोल्ट्री नस्लों को पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदान किए गए तथा वर्ष 2025 के लिए नस्ल संरक्षण पुरस्कार से किसानों, ब्रीडर्स और संस्थानों को सम्मानित किया गया।
व्यक्तिगत श्रेणी में जीतुल बुरागोहेन को लुइट भैंस संरक्षण के लिए प्रथम पुरस्कार, कुडाला राम दास को पुंगनूर मवेशी संरक्षण के लिए द्वितीय पुरस्कार और तिरुपति और श्री रामचंद्रन काहनार को सांत्वना पुरस्कार प्रदान किए गए।
संस्थागत श्रेणी में बिनझारपुरी मवेशी प्रमोटर्स एंड प्रोड्यूसर्स सोसाइटी को प्रथम पुरस्कार, तमिलनाडु पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय को पुलिक्कुलम मवेशी संरक्षण के लिए द्वितीय पुरस्कार और गाओलाओ मवेशी संरक्षण के लिए तृतीय पुरस्कार, मेचेरी भेड़ संरक्षण के लिए सांत्वना पुरस्कार प्रदान किया गया।
सस्टेनेबल पशुधन विकास का संदेश
कार्यक्रम में उप-महानिदेशक (पशुविज्ञान) डॉ. राघवेंद्र भट्टा ने पंजीकृत नस्लों की जानकारी देते हुए उनके संरक्षण को सस्टेनेबल पर्यावरण के लिए आवश्यक बताया।
यह समारोह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पशुधन क्षेत्र को सशक्त बनाने, किसानों की आय बढ़ाने और सतत कृषि विकास की बुनियाद के रूप में जैव विविधता संरक्षण के विज़न को प्रतिबिंबित करता है। कार्यक्रम में देशभर से वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, प्रगतिशील किसान एवं अन्य हितधारक उपस्थित रहे।
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