राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

डाटा प्रोटेक्शन पर बनी समिति को तुरंत रद्द किया जाए- डॉ कृष्ण बीर चौधरी

12 दिसंबर 2024, नई दिल्ली: डाटा प्रोटेक्शन पर बनी समिति को तुरंत रद्द किया जाए- डॉ कृष्ण बीर चौधरी – भारतीय कृषक समाज को यह जानकारी  मिली है कि केंद्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा एक बहु मंत्रालय समिति का गठन किया गया है, जो पेटेंट के 20 वर्ष पूरा कर चुके पेस्टीसाइड्स को भारत में लाने वाली कंपनियों को डाटा प्रोटेक्शन देगी, जो भारतीय बाजार एवं किसानों को अपनी दवाएं कई गुना दामों पर बेचकर मुनाफा कमाएगी। यह भारतीय किसानों के हित में नहीं है। इस संबंध में  स्टेट फार्म्स कार्पोरेशन  ऑफ इण्डिया के पूर्व चेयरमैन डॉ कृष्ण बीर चौधरी ने केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर डाटा प्रोटेक्शन पर बनी समिति को तुरंत रद्द करने की मांग की है।

श्री चौधरी ने अपने पत्र में उल्लेखित किया है कि कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने अतिरिक्त सचिव ,पादप सुरक्षा श्री फैज़ अहमद किदवई की अध्यक्षता में एक बहु मंत्रालय समिति का गठन किया है। इस समिति को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह पेटेंट के 20 वर्ष पूरा कर चुके पेस्टिसाइड्स को भारत में लाने वाली कंपनियों को डाटा प्रोटेक्शन दिया जाए , ताकि वह भारतीय बाजार एवं किसानों को अपनी दवाएं कई गुना दामों पर बेचकर खूब मुनाफा कमा सके और भारतीय किसानों का शोषण कर सकें।

केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान को लिखे पत्र में श्री चौधरी ने उल्लेख किया है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों एवं उनसे जुड़े भारतीय उद्योगों के द्वारा कीटनाशक अधिनियम 1968 से जुड़े नियमों को बदलने के  प्रयासों का एक ही उद्देश्य रहा है, कि किसी न किसी प्रकार से भारतीय बाजार पर कब्ज़ा कर किसानों का शोषण किया जाए। भारतीय कृषक समाज का हमेशा मत रहा है कि जो Molecules विश्व के किसी भी देश में 20 वर्षों के पेटेंट का समय पूरा कर चुके हैं उन Global Off-Patented Molecules को भारत में कोई डाटा प्रोटेक्शन नहीं दिया जाना चाहिए। क्योकि इससे  बहुराष्ट्रीय कंपनियों  का  एकाधिकार  पेटेंट पूरा होने के बाद भी कायम रहता है और किसानों का शोषण जारी रहता है। अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अनुसार पेटेंट का समय 20 वर्ष है उसके बाद किसी भी प्रकार का डाटा प्रोटेक्शन दिया जाना असंवैधानिक है।

श्री चौधरी ने पत्र में केंद्रीय कृषि मंत्री का ध्यान आकृष्ट कराते हुए बताया कि 2019 -2020  में कृषि रसायनों का आयात जो करीब 9041 करोड़ रु से कुछ कम था , वह 2023 -24  में बढ़कर 14315  करोड़ रु हो गया। जो ठीक नहीं है।  इसे नियंत्रित करने की ज़रूरत है , क्योंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियां किसानों को खुले आम लूट रही है। उन्होंने कुछ कंपनियों के उत्पादों का उल्लेख किया।एक कम्पनी का उत्पाद  इमामेक्टिन बेंजोएट  2007 में 10 हज़ार रु प्रति किलो बेचा गया , लेकिन जैसे ही भारतीय कंपनियों को उत्पादन की इजाजत मिली ,तो तुरंत यह दाम 3500 रु और फिर 2 हज़ार प्रति किलो पर किसानों को मिलने लगा। इसी तरह एक अन्य उत्पाद सल्फोसल्फ्यूरान जो वर्ष 2001 में 48 हज़ार रु प्रति किलो से ज़्यादा पर बेचा गया आज भारतीय कंपनियां 70 % कम कीमत पर 14, 800  रु /किलो पर किसानों को उपलब्ध करा रही है। इसी तरह एक अन्य उत्पाद  एसिटामिप्रिड 2001 -2002 में करीब 6400 रु / किलो बेचा गया ,आज भारतीय कंपनियां इसे 800 रु किलो पर किसानों को उपलब्ध करा रही है।  

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यह उदाहरण सिद्ध करते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां और उनके साथ में लिप्त कुछ भारतीय उद्योगपतियों ने बड़े पैमाने पर किसानों का शोषण किया है। कुछ भारतीय कंपनियां डाटा प्रोटेक्शन के प्रस्ताव की वकालत करती है , इनसे सजग रहने की आवश्यकता है।  इन तथ्यों को ध्यान में हुए डाटा प्रोटेक्शन पर बनी समिति को तुरंत रद्द कर भारतीय उद्योगों को बढ़ावा देने वाली नीतियां बनाई जाए।

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