मानसून का अनुमान और इस साल खेती पर असर
लेखक: शशिकांत त्रिवेदी
02 मई 2026, भोपाल: मानसून का अनुमान और इस साल खेती पर असर – भारत मौसम विज्ञान विभाग ने इस साल जून से सितंबर तक दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश सामान्य से कम रहने का अनुमान जताया है। विशेषज्ञों का कहना है कि सिंचित क्षेत्र में हुई बढ़ोतरी के कारण खाद्यान्न उत्पादन पर बड़ा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन जिन इलाकों की खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर है, वहां किसानों की आय पर दबाव आ सकता है। खरीफ की फसलों का लगभग पंद्रह प्रतिशत उत्पादन ऐसे ही क्षेत्रों से आता है।
पश्चिमोत्तर, पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में बारिश सामान्य या उससे अधिक रहने की संभावना है, जिससे धान की फसल को फायदा होगा। हालांकि, अगर फसल के बढ़ने और फूल आने के समय बारिश कम हो गई, तो दालों, तिलहनों और कपास जैसी फसलों को नुकसान पहुंच सकता है। असली चुनौती बारिश के वितरण में है—जुलाई से सितंबर के बीच यह कैसे फैलती है, यही तय करेगा कि उत्पादन पर कितना असर पड़ेगा। सिंचाई का दायरा अब कुल बोए गए क्षेत्र के 56 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जबकि 2014-15 में यह 49 प्रतिशत था। इस बढ़ोतरी से खेती अब मानसून की अनिश्चितताओं का सामना करने में अधिक सक्षम हो गई है।
फिलहाल देश के 166 बड़े जलाशयों में उनकी क्षमता का 41 प्रतिशत पानी भरा है, जो पिछले साल से 14.7 प्रतिशत और दस साल के औसत से 26 प्रतिशत अधिक है जिससे सिंचाई को बढ़ावा मिल सकता है। कुल मिलाकर खरीफ अनाज—चावल, दालें और मोटे अनाज—का उत्पादन कुल सालाना उत्पादन का लगभग 55% होता है। कुछ राज्यों के बड़े इलाके ऐसे हैं जो काफी हद तक बारिश पर निर्भर रहते हैं। अगर बारिश कम होकर 92% तक रह जाती है, तो उनका उत्पादन और किसानों की आमदनी खतरे में पड़ सकती है। देश में चावल और गेहूं का भंडार पर्याप्त है, जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ज़रिए गरीब तबके तक मुफ्त में भी पहुंचता है। 1 अप्रैल 2026 तक चावल का भंडार बफर मानक से लगभग पांच गुना और गेहूं का भंडार तीन गुना अधिक है। लेकिन दालें, तिलहन, फल और सब्ज़ियों की पैदावार प्रभावित हो सकती है, जिससे उनकी कीमतों पर दबाव बढ़ेगा। ऐसे में बड़े पैमाने पर आयात की ज़रूरत पड़ सकती है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार, कृषि क्षेत्र में वित्त वर्ष 2026 में सकल मूल्य वर्धन में 3.1 प्रतिशत वृद्धि की उम्मीद है। पिछले दो वर्षों में यह वृद्धि क्रमशः 4.6 और 2.7 प्रतिशत रही थी। विशेषज्ञों का कहना है कि असली चिंता कुल बारिश की कमी से नहीं, बल्कि बारिश में आने वाले अंतरालों से होती है। बहुत लंबा सूखा फसलों को शुरुआत में ही नुकसान पहुंचाता है, जबकि अत्यधिक बारिश दूसरी समस्याएं खड़ी कर देती है। अल नीनो की स्थितियों के कारण इस बार मानसून का अनुमान लंबे समय के औसत का 92 प्रतिशत है, जो पिछले 26 सालों में सबसे कम शुरुआती अनुमान है। पश्चिम एशिया में जारी संकट भी भारत की आर्थिक वृद्धि पर असर डाल सकता है। मौसम विभाग अगले महीने के अंत में मानसून का दूसरा अनुमान जारी करेगा, जिससे स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी। (लेखक भोपाल में वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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