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राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

जंगली धान संरक्षण में बड़ी सफलता: असम का बोरजुली बना जैव विविधता धरोहर स्थल, जलवायु अनुकूल किस्मों को मिलेगा बढ़ावा

03 जुलाई 2026, नई दिल्ली: जंगली धान संरक्षण में बड़ी सफलता: असम का बोरजुली बना जैव विविधता धरोहर स्थल, जलवायु अनुकूल किस्मों को मिलेगा बढ़ावा – कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए) ने असम के सोनितपुर जिले में संचालित ‘जंगली धान (ओरिज़ा रूफ़ीपोगोन) के यथास्थान संरक्षण और प्रबंधन’ परियोजना के माध्यम से भारत के जंगली धान के आनुवंशिक (जेनेटिक) संसाधनों के संरक्षण में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इस परियोजना का क्रियान्वयन वर्ष 2022 से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (आईसीएआर-एनबीपीजीआर), नई दिल्ली द्वारा असम राज्य जैव विविधता बोर्ड के सहयोग से किया जा रहा है।

बोरजुली को मिली जैव विविधता धरोहर स्थल की मान्यता

आईसीएआर-एनबीपीजीआर के वैज्ञानिकों के एक दल ने राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) डॉ. चंद्र शेखर कुमार (आईएएस) से मुलाकात कर परियोजना की प्रमुख उपलब्धियों की जानकारी दी। वैज्ञानिकों ने बताया कि परियोजना के तहत चिन्हित असम के सोनितपुर जिले का बोरजुली क्षेत्र अब राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण द्वारा ‘जैव विविधता धरोहर स्थल’ (Biodiversity Heritage Site) के रूप में अधिसूचित किया गया है।

यह मान्यता भारत में जंगली धान की समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण के साथ-साथ जलवायु-सहिष्णु कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

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जलवायु अनुकूल धान की नई किस्मों के विकास में मिलेगी मदद

बैठक के दौरान वैज्ञानिकों ने जंगली धान के जर्मप्लाज्म की खोज, संरक्षण और उसकी विशेषताओं पर किए गए अध्ययन की जानकारी भी साझा की। उन्होंने बताया कि जंगली धान की आनुवंशिक विशेषताएं भविष्य में बेहतर गुणवत्ता वाली, अधिक उत्पादन देने वाली और बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप धान की नई किस्मों के विकास में उपयोगी साबित हो सकती हैं।

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अन्य फसलों के जंगली संबंधी पौधों के संरक्षण पर भी जोर

अनुसंधान दल के प्रयासों की सराहना करते हुए एनआरएए के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. चंद्र शेखर कुमार ने कहा कि जंगली धान की प्रजातियां देश की अमूल्य आनुवंशिक संपदा हैं। इनके आधार पर जलवायु-सहिष्णु, अधिक उपज देने वाली तथा बेहतर पोषण गुणवत्ता वाली धान की किस्में विकसित की जा सकती हैं।

उन्होंने कहा कि भारतीय कृषि की जलवायु अनुकूलन क्षमता, स्थिरता और दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए देशभर में अन्य फसलों के जंगली संबंधी पौधों के संरक्षण के लिए भी इसी प्रकार की पहल की जानी चाहिए।

बैठक में ये अधिकारी भी रहे मौजूद

इस बैठक में राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए) के निदेशक (कृषि एवं उद्यानिकी) डॉ. पंकज कुमार शाह तथा तकनीकी विशेषज्ञ (जलागम प्रबंधन) डॉ. अनिल कुमार मिश्रा भी उपस्थित रहे।

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