राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

ICAR की बड़ी उपलब्धि: अफ्रीकी स्वाइन फीवर का पहला स्वदेशी टीका विकसित, सूअर पालकों को मिलेगी राहत

06 अगस्त 2026, नई दिल्ली: ICAR की बड़ी उपलब्धि: अफ्रीकी स्वाइन फीवर का पहला स्वदेशी टीका विकसित, सूअर पालकों को मिलेगी राहत – भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने पशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए अफ्रीकी स्वाइन फीवर (African Swine Fever-ASF) के खिलाफ भारत का पहला स्वदेशी जीवित क्षीणित (Live Attenuated) टीका विकसित किया है। भोपाल स्थित आईसीएआर-राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान (ICAR-NIHSAD) के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह टीका अफ्रीकी स्वाइन फीवर से सूअरों की सुरक्षा के साथ-साथ देशभर के सूअर पालकों की आजीविका को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

क्या है अफ्रीकी स्वाइन फीवर?

अफ्रीकी स्वाइन फीवर (ASF) एक अत्यंत संक्रामक और घातक वायरल बीमारी है, जो घरेलू और जंगली दोनों प्रकार के सूअरों को प्रभावित करती है। इस बीमारी में तेज बुखार, रक्तस्राव और लगभग 100 प्रतिशत तक मृत्यु दर देखी जाती है। भारत में इसका पहला मामला वर्ष 2020 में सामने आया था। इसके बाद यह कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैल गया, जिससे हजारों सूअरों की मौत हुई और सूअर पालन व्यवसाय को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।

असम और मिजोरम में करोड़ों रुपये का नुकसान

आईसीएआर के अनुसार, वर्ष 2020 और 2021 में असम में हुए शुरुआती प्रकोप के दौरान सूअरों की मौत और उन्हें मारने की कार्रवाई से लगभग 276 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। वहीं, मिजोरम में वर्ष 2025 तक एएसएफ के प्रकोप से 11,382 से अधिक परिवार प्रभावित हुए और करीब 982 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ। इन परिस्थितियों ने देश में प्रभावी स्वदेशी टीके की आवश्यकता को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया।

स्वदेशी तकनीक से तैयार हुआ पहला टीका

भोपाल स्थित आईसीएआर-एनआईएचएसएडी के वैज्ञानिकों ने एमए-104 (MA-104) सेल लाइन आधारित जीवित क्षीणित एएसएफ टीका विकसित किया है। इसे विशेष जीन विलोपन वाले एएसएफ वायरस जीनोटाइप-II का उपयोग कर तैयार किया गया है। यह तकनीक बड़े पैमाने पर टीका उत्पादन के लिए उपयुक्त मानी जा रही है और इससे मालिकाना (प्रोप्राइटरी) सेल लाइनों पर निर्भरता भी कम होगी।

परीक्षण में सुरक्षित और प्रभावी साबित

आईसीएआर ने बताया कि टीके का प्रयोगशाला में व्यापक परीक्षण किया गया है। इसमें रोगाणुहीनता, शुद्धता, सुरक्षा, आनुवंशिक स्थिरता, प्रतिरक्षाजनकता, सुरक्षात्मक प्रभावकारिता और विषाणु परिवर्तन संबंधी अध्ययन सफल रहे हैं। इसके अलावा मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के पशुपालन एवं डेयरी विभाग (DAHD) के सहयोग से इसका क्षेत्रीय सत्यापन भी किया गया, जिसमें टीका सुरक्षित और प्रभावी पाया गया।

कैसे लगाया जाएगा टीका?

यह टीका आठ सप्ताह या उससे अधिक आयु के स्वस्थ सूअरों के लिए अनुशंसित है। इसे 1 मिलीलीटर इंट्रामस्कुलर (मांसपेशी) इंजेक्शन के रूप में लगाया जाएगा। पहली खुराक के 14 दिन बाद बूस्टर डोज दी जाएगी, जिससे बेहतर प्रतिरक्षा विकसित हो सके।

सूअर पालकों को मिलेगा बड़ा लाभ

विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्वदेशी टीके के उपयोग से अफ्रीकी स्वाइन फीवर के कारण होने वाली मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आएगी। इससे सूअर पालन क्षेत्र को होने वाले आर्थिक नुकसान में कमी आएगी, किसानों और सूअर पालकों की आय सुरक्षित होगी तथा पशुधन क्षेत्र को मजबूती मिलेगी।

डॉ. एमएल जाट ने बताया बड़ी उपलब्धि

डीएआरई (DARE) के सचिव एवं आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एमएल जाट ने कहा कि यह उपलब्धि भारत के पशु चिकित्सा विज्ञान के लिए एक नया अध्याय है। उन्होंने कहा कि यह देश की वैज्ञानिक क्षमता का प्रमाण है और इससे स्वदेशी टीकों एवं आधुनिक पशु स्वास्थ्य तकनीकों के विकास को नई गति मिलेगी। यह उपलब्धि पशुधन स्वास्थ्य को मजबूत करने, रोगों से निपटने की तैयारी बढ़ाने तथा देश की खाद्य और जैव सुरक्षा को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

बड़े पैमाने पर उत्पादन का रास्ता होगा आसान

आईसीएआर के अनुसार, वर्तमान में अफ्रीकी स्वाइन फीवर के सीमित व्यावसायिक टीके केवल वियतनाम में उपलब्ध हैं और वे पेटेंट प्राप्त सेल लाइनों पर आधारित हैं। इसके विपरीत, भारत का यह स्वदेशी टीका व्यापक रूप से उपलब्ध MA-104 सेल लाइन पर आधारित है। इससे बड़े पैमाने पर टीका उत्पादन संभव होगा, निर्माण लागत कम होगी और देश में टीके की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिलेगी।

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