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राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून: किसान फिर तैयार उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति ने भी किसानों और खेती की की हालत के कारण न्यूनतम समर्थन मूल्य ओर कानून की वकालत की

लेखक: शशिकांत त्रिवेदी

25 नवंबर 2024, नई दिल्ली: न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून: किसान फिर तैयार उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति ने भी किसानों और खेती की की हालत के कारण न्यूनतम समर्थन मूल्य ओर कानून की वकालत की – अगला महीना किसानों के लिए हलचल से भरा होने वाला है. सयुंक्त किसान मोर्चा (गैर राजनैतिक) ने अगले माह की 6 तारीख को दिल्ली कूच करने की तैयारी शुरू कर दी है. उनकी मांग है कि केंद्र सरकार ने अपने वादे के मुताबिक न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून नहीं बनाया है. हाँलाकि अभी मोर्चे और इसके इस आंदोलन में सहयोगी संगठनों ने अभी तक दिल्ली में अपने विरोध प्रदर्शन के बारे में खुलासा नहीं किया है. उधर किसानों की शिकायतों और विरोध प्रदर्शनों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त पैनल ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट दाखिल की है, जिसमें खेती पर संकट के कारणों को विस्तार से बताया गया है और न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी मान्यता देने और किसानों को सीधे आय में सहायता देने की की पेशकश की संभावना की जांच करने सहित समाधान भी सुझाए हैं। . इस रिपोर्ट में अन्य बातों के अलावा स्थिर उपज, बढ़ती लागत और कर्ज और अपर्याप्त विपणन प्रणाली शामिल हैं।

शंभू सीमा पर आंदोलन कर रहे किसानों की शिकायतों को हल करने के लिए पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश नवाब सिंह के नेतृत्व में 2 सितंबर को उच्चस्तरीय समिति करते समय, उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि किसानों के विरोध का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने पिछले हफ्ते अंतरिम रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लिया है. अपनी 11 पन्नों की अंतरिम रिपोर्ट में पैनल ने कहा है कि यह सर्वविदित तथ्य है कि देश में सामान्य रूप से और विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा में किसान समुदाय पिछले दो दशकों से लगातार बढ़ते संकट का सामना कर रहा है।

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रिपोर्ट में कहा गया है कि हरित क्रांति के शुरुआती उच्च लाभ के बाद 1990 के दशक के मध्य से उपज और उत्पादन वृद्धि में ठहराव ने संकट की शुरुआत हुई है. समिति ने कहा कि हाल के दशकों में किसानों और खेत मजदूरों पर कर्ज कई गुना बढ़ गया है। समिति ने कहा, “राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड, 2023) के अनुसार, 2022-23 में पंजाब में किसानों का संस्थागत ऋण 73,673 करोड़ रुपये था, जबकि हरियाणा में यह 76,630 करोड़ रुपये से भी अधिक था। इसके अलावा, किसानों पर गैर-संस्थागत ऋण का एक भारी बोझ है, जो राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ, 2019) के अनुसार, पंजाब में किसानों पर कुल बकाया ऋण का 21.3 प्रतिशत और हरियाणा में 32 प्रतिशत होने का अनुमान है।

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समिति में सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी बी एस संधू, मोहाली निवासी देविंदर शर्मा, प्रोफेसर रंजीत सिंह घुमन और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के कृषि अर्थशास्त्री डॉ सुखपाल सिंह भी शामिल थे।

रिपोर्ट में कहा गया है कि शुद्ध कृषि उत्पादकता में गिरावट, उत्पादन लागत में वृद्धि, अपर्याप्त विपणन प्रणाली और कृषि रोजगार में कमी ने कृषि आय वृद्धि में कमी में योगदान दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि छोटे और सीमांत किसान और कृषि श्रमिक इस आर्थिक संकट से सबसे अधिक प्रभावित और कमजोर वर्ग हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वास्तव में, ग्रामीण समाज समग्र रूप से गंभीर आर्थिक तनाव में है। राष्ट्रीय स्तर पर, कुल श्रमिकों में से 46 प्रतिशत कृषि में लगे हुए हैं, जिनकी आय में हिस्सेदारी केवल 15 प्रतिशत है। केवल इतना ही नहीं, छिपी हुई बेरोजगारी की दर बहुत अधिक है और बड़ी संख्या में अवैतनिक पारिवारिक श्रमिक हैं। उनमें से एक महत्वपूर्ण अनुपात कामकाजी गरीब है।

इसके अलावा रिपोर्ट में बताया गया है कि जलवायु आपदा और इसके परिणामस्वरूप पर्यावरणीय परिवर्तनों की गंभीरता, जिसमें जल स्तर में कमी, लगातार सूखे की स्थिति, कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा पैटर्न, गर्मी की लहरें आदि खेती और खाद्य सुरक्षा को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रहे हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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