भूमि क्षरण से खेती पर बढ़ा खतरा: देश में 9.78 करोड़ हेक्टेयर जमीन प्रभावित, राजस्थान सबसे आगे
10 अगस्त 2026, नई दिल्ली: भूमि क्षरण से खेती पर बढ़ा खतरा: देश में 9.78 करोड़ हेक्टेयर जमीन प्रभावित, राजस्थान सबसे आगे – देश में मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री श्री रामनाथ ठाकुर ने संसद में एक सवाल के लिखित जवाब में बताया कि वर्ष 2018-19 तक देश में कुल 9.78 करोड़ हेक्टेयर भूमि मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण से प्रभावित थी। यह जानकारी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (SAC) द्वारा प्रकाशित भारत के मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण एटलस-2021 के आधार पर दी गई है।
मंत्री ने बताया कि सरकार ने भूमि क्षरण से प्रभावित कृषि भूमि और फसल उत्पादकता पर इसके प्रभाव का कोई अलग आकलन नहीं किया है। हालांकि, मिट्टी की उर्वरता बहाल करने, सतत भूमि प्रबंधन, जल संरक्षण और जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की ओर से कई उपाय किए जा रहे हैं।
राजस्थान में सबसे ज्यादा भूमि क्षरण
संसद में दिए गए राज्यवार आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में 2,12,37,669 हेक्टेयर भूमि मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण से प्रभावित है। यह देश में सबसे अधिक है। इसके बाद महाराष्ट्र में 1,43,06,029 हेक्टेयर और गुजरात में 1,02,48,057 हेक्टेयर भूमि प्रभावित बताई गई है।
इसके अलावा कर्नाटक में 69,59,847 हेक्टेयर, झारखंड में 54,82,260 हेक्टेयर, ओडिशा में 53,59,014 हेक्टेयर, मध्य प्रदेश में 38,59,735 हेक्टेयर, तेलंगाना में 36,38,508 हेक्टेयर, आंध्र प्रदेश में 23,78,042 हेक्टेयर और छत्तीसगढ़ में 23,06,531 हेक्टेयर भूमि प्रभावित है।
उत्तर प्रदेश में 15,49,608 हेक्टेयर, तमिलनाडु में 15,99,981 हेक्टेयर, पश्चिम बंगाल में 17,84,345 हेक्टेयर, जम्मू-कश्मीर में 11,29,503 हेक्टेयर, असम में 8,34,530 हेक्टेयर और बिहार में 7,46,586 हेक्टेयर क्षेत्र भूमि क्षरण से प्रभावित है।
वहीं, हिमाचल प्रदेश में 24,00,300 हेक्टेयर, लद्दाख में 71,11,968 हेक्टेयर, गोवा में 1,94,877 हेक्टेयर, केरल में 4,22,299 हेक्टेयर, पंजाब में 1,67,989 हेक्टेयर, हरियाणा में 3,64,154 हेक्टेयर, उत्तराखंड में 6,73,894 हेक्टेयर और सिक्किम में 84,610 हेक्टेयर भूमि प्रभावित बताई गई है।
मिट्टी की उर्वरता सुधारने के लिए उपाय
सरकार के अनुसार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने मिट्टी की उर्वरता बहाल करने और सतत भूमि प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए कई स्थान-विशिष्ट तकनीकें विकसित और अनुशंसित की हैं। इनमें कंटूर कृषि, अंतरफसल, फसल चक्रण, संरक्षण कृषि, मल्चिंग, हरित खाद, कम जुताई और कृषि वानिकी जैसी तकनीकें शामिल हैं।
लवण प्रभावित मिट्टी के प्रबंधन के लिए आईसीएआर की ओर से जिप्सम का प्रयोग, बायो-ड्रेनेज, उपसतह जल निकासी, लवण-सहिष्णु फसल किस्मों और जैव-पुनर्वास उपायों की सिफारिश की गई है।
आईसीएआर ने सामान्य उर्वरक अनुशंसाएं (GFR) और मृदा परीक्षण फसल प्रतिक्रिया (STCR) आधारित अनुशंसाएं भी विकसित की हैं। इन्हें राज्यों के साथ साझा किया गया है, ताकि मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित पोषक तत्वों का इस्तेमाल बढ़ाया जा सके। इससे मृदा उर्वरता, मृदा जैविक कार्बन और पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता में सुधार लाने में मदद मिलेगी।
जल संरक्षण पर सरकार का जोर
भूमि और जल संरक्षण के लिए एकीकृत वाटरशेड प्रबंधन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके तहत बायो-इंजीनियरिंग उपाय, समोच्च एवं श्रेणीबद्ध बांध, स्टोन बांध, समोच्च एवं क्रमिक ट्रेंच, बेंच टेरेस, चेक डैम, खेत तालाब और सामुदायिक तालाब जैसी संरचनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है।
भूमि संसाधन विभाग के वाटरशेड प्रबंधन प्रभाग की ओर से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के वाटरशेड विकास घटक के तहत वर्षा सिंचित और निम्नीकृत भूमि के विकास पर भी काम किया जा रहा है। इसमें रिज एरिया ट्रीटमेंट, ड्रेनेज लाइन ट्रीटमेंट, मृदा एवं नमी संरक्षण, वर्षा जल संचयन, नर्सरी निर्माण, चरागाह विकास और भूमिहीन लोगों के लिए आजीविका सहायता जैसी गतिविधियां शामिल हैं।
651 जिलों में जलवायु अनुकूल कृषि
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, आईसीएआर के माध्यम से राष्ट्रीय जलवायु अनुकूल कृषि नवाचार (NICRA) परियोजना को 651 जिलों में लागू कर रहा है। इसके तहत कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का अध्ययन करने के साथ जिला स्तर पर जलवायु जोखिम और संवेदनशीलता का आकलन किया जा रहा है।
सरकार के अनुसार जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील पहचाने गए 310 जिलों में 201 जिले ‘उच्च’ और 109 जिले ‘बहुत उच्च’ संवेदनशील श्रेणी में हैं। इन 651 जिलों के लिए जिला कृषि आकस्मिकता योजनाएं (DACP) भी तैयार की गई हैं, ताकि मौसम की असामान्य परिस्थितियों से निपटने के लिए स्थान-विशिष्ट जलवायु अनुकूल फसलों, किस्मों और कृषि प्रबंधन पद्धतियों की सिफारिश की जा सके।
NICRA के तहत 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 151 अत्यधिक संवेदनशील जिलों के 448 जलवायु अनुकूल गांवों में जलवायु अनुकूल तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है। किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज समय पर उपलब्ध कराने के लिए ग्राम स्तरीय बीज बैंक और सामुदायिक नर्सरी को भी सहायता दी जा रही है।
10 साल में 2,900 किस्में जारी
सरकार ने बताया कि पिछले 10 वर्षों यानी 2014 से 2024 के दौरान आईसीएआर ने 2,900 फसल किस्में जारी कीं, जिनमें से 2,661 किस्में एक या अधिक जैविक और/या अजैविक दबावों के प्रति सहनशील हैं।
जलवायु परिवर्तनशीलता के अनुकूलन के लिए धान गहनता प्रणाली (SRI), एरोबिक राइस, डायरेक्ट-सीडेड राइस और फसल अवशेषों के इन-सीटू प्रबंधन जैसी स्थान-विशिष्ट जलवायु अनुकूल तकनीकों को भी किसानों के बीच बढ़ावा दिया जा रहा है।
ड्रिप सिंचाई और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा
कृषि में जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ योजना के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है। वर्षा सिंचित क्षेत्र विकास योजना के जरिए एकीकृत कृषि प्रणाली को बढ़ावा देकर जलवायु जोखिम कम करने और उत्पादकता बढ़ाने पर काम किया जा रहा है।
इसके अलावा सॉयल हेल्थ एंड फर्टिलिटी योजना के जरिए उर्वरकों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा दिया जा रहा है। परंपरागत कृषि विकास योजना के माध्यम से जैविक खेती और राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के जरिए प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
दलहन आत्मनिर्भरता मिशन, राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-तिलहन और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन के जरिए फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है। एकीकृत बागवानी विकास मिशन, कृषि वानिकी और राष्ट्रीय बांस मिशन भी जलवायु अनुकूलन को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों में शामिल हैं।
फसल नुकसान की भरपाई के लिए बीमा
प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु संबंधी जोखिमों से होने वाले फसल नुकसान से किसानों को सुरक्षा देने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और मौसम सूचकांक आधारित पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना लागू की जा रही है। इनके जरिए फसल नुकसान की स्थिति में किसानों को बीमा कवर उपलब्ध कराने का प्रावधान है।
इसके अलावा विकसित भारत-रोजगार गारंटी और आजीविका मिशन-ग्रामीण (VB-G RAM-G) के तहत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन कार्यों के माध्यम से जल संरक्षण को प्राथमिकता दी जा रही है। इसके तहत अनुमत 318 कार्यों में से 110 कार्य जल सुरक्षा और संरक्षण से जुड़े हैं।
भूमि क्षरण के बावजूद बढ़ा कृषि उत्पादन
सरकार ने बताया कि जैविक और अजैविक दबावों से उत्पन्न चुनौतियों के बावजूद कृषि क्षेत्र ने पिछले दशक में फसल उत्पादकता और समग्र कृषि उत्पादन में लगातार वृद्धि दर्ज की है। देश का खाद्यान्न उत्पादन 2014-15 में 252.03 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 357.73 मिलियन टन हो गया। वहीं, बागवानी उत्पादन 280.98 मिलियन टन से बढ़कर 370.73 मिलियन टन पहुंच गया।
देश में मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने संसद में एक सवाल के लिखित जवाब में बताया कि वर्ष 2018-19 तक देश में कुल 9.78 करोड़ हेक्टेयर भूमि मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण से प्रभावित थी। यह जानकारी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (SAC) द्वारा प्रकाशित भारत के मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण एटलस-2021 के आधार पर दी गई है।
मंत्री ने बताया कि सरकार ने भूमि क्षरण से प्रभावित कृषि भूमि और फसल उत्पादकता पर इसके प्रभाव का कोई अलग आकलन नहीं किया है। हालांकि, मिट्टी की उर्वरता बहाल करने, सतत भूमि प्रबंधन, जल संरक्षण और जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की ओर से कई उपाय किए जा रहे हैं।
राजस्थान में सबसे ज्यादा भूमि क्षरण
संसद में दिए गए राज्यवार आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में 2,12,37,669 हेक्टेयर भूमि मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण से प्रभावित है। यह देश में सबसे अधिक है। इसके बाद महाराष्ट्र में 1,43,06,029 हेक्टेयर और गुजरात में 1,02,48,057 हेक्टेयर भूमि प्रभावित बताई गई है।
इसके अलावा कर्नाटक में 69,59,847 हेक्टेयर, झारखंड में 54,82,260 हेक्टेयर, ओडिशा में 53,59,014 हेक्टेयर, मध्य प्रदेश में 38,59,735 हेक्टेयर, तेलंगाना में 36,38,508 हेक्टेयर, आंध्र प्रदेश में 23,78,042 हेक्टेयर और छत्तीसगढ़ में 23,06,531 हेक्टेयर भूमि प्रभावित है।
उत्तर प्रदेश में 15,49,608 हेक्टेयर, तमिलनाडु में 15,99,981 हेक्टेयर, पश्चिम बंगाल में 17,84,345 हेक्टेयर, जम्मू-कश्मीर में 11,29,503 हेक्टेयर, असम में 8,34,530 हेक्टेयर और बिहार में 7,46,586 हेक्टेयर क्षेत्र भूमि क्षरण से प्रभावित है।
वहीं, हिमाचल प्रदेश में 24,00,300 हेक्टेयर, लद्दाख में 71,11,968 हेक्टेयर, गोवा में 1,94,877 हेक्टेयर, केरल में 4,22,299 हेक्टेयर, पंजाब में 1,67,989 हेक्टेयर, हरियाणा में 3,64,154 हेक्टेयर, उत्तराखंड में 6,73,894 हेक्टेयर और सिक्किम में 84,610 हेक्टेयर भूमि प्रभावित बताई गई है।
मिट्टी की उर्वरता सुधारने के लिए उपाय
सरकार के अनुसार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने मिट्टी की उर्वरता बहाल करने और सतत भूमि प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए कई स्थान-विशिष्ट तकनीकें विकसित और अनुशंसित की हैं। इनमें कंटूर कृषि, अंतरफसल, फसल चक्रण, संरक्षण कृषि, मल्चिंग, हरित खाद, कम जुताई और कृषि वानिकी जैसी तकनीकें शामिल हैं।
लवण प्रभावित मिट्टी के प्रबंधन के लिए आईसीएआर की ओर से जिप्सम का प्रयोग, बायो-ड्रेनेज, उपसतह जल निकासी, लवण-सहिष्णु फसल किस्मों और जैव-पुनर्वास उपायों की सिफारिश की गई है।
आईसीएआर ने सामान्य उर्वरक अनुशंसाएं (GFR) और मृदा परीक्षण फसल प्रतिक्रिया (STCR) आधारित अनुशंसाएं भी विकसित की हैं। इन्हें राज्यों के साथ साझा किया गया है, ताकि मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित पोषक तत्वों का इस्तेमाल बढ़ाया जा सके। इससे मृदा उर्वरता, मृदा जैविक कार्बन और पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता में सुधार लाने में मदद मिलेगी।
जल संरक्षण पर सरकार का जोर
भूमि और जल संरक्षण के लिए एकीकृत वाटरशेड प्रबंधन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके तहत बायो-इंजीनियरिंग उपाय, समोच्च एवं श्रेणीबद्ध बांध, स्टोन बांध, समोच्च एवं क्रमिक ट्रेंच, बेंच टेरेस, चेक डैम, खेत तालाब और सामुदायिक तालाब जैसी संरचनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है।
भूमि संसाधन विभाग के वाटरशेड प्रबंधन प्रभाग की ओर से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के वाटरशेड विकास घटक के तहत वर्षा सिंचित और निम्नीकृत भूमि के विकास पर भी काम किया जा रहा है। इसमें रिज एरिया ट्रीटमेंट, ड्रेनेज लाइन ट्रीटमेंट, मृदा एवं नमी संरक्षण, वर्षा जल संचयन, नर्सरी निर्माण, चरागाह विकास और भूमिहीन लोगों के लिए आजीविका सहायता जैसी गतिविधियां शामिल हैं।
651 जिलों में जलवायु अनुकूल कृषि
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, आईसीएआर के माध्यम से राष्ट्रीय जलवायु अनुकूल कृषि नवाचार (NICRA) परियोजना को 651 जिलों में लागू कर रहा है। इसके तहत कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का अध्ययन करने के साथ जिला स्तर पर जलवायु जोखिम और संवेदनशीलता का आकलन किया जा रहा है।
सरकार के अनुसार जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील पहचाने गए 310 जिलों में 201 जिले ‘उच्च’ और 109 जिले ‘बहुत उच्च’ संवेदनशील श्रेणी में हैं। इन 651 जिलों के लिए जिला कृषि आकस्मिकता योजनाएं (DACP) भी तैयार की गई हैं, ताकि मौसम की असामान्य परिस्थितियों से निपटने के लिए स्थान-विशिष्ट जलवायु अनुकूल फसलों, किस्मों और कृषि प्रबंधन पद्धतियों की सिफारिश की जा सके।
NICRA के तहत 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 151 अत्यधिक संवेदनशील जिलों के 448 जलवायु अनुकूल गांवों में जलवायु अनुकूल तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है। किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज समय पर उपलब्ध कराने के लिए ग्राम स्तरीय बीज बैंक और सामुदायिक नर्सरी को भी सहायता दी जा रही है।
10 साल में 2,900 किस्में जारी
सरकार ने बताया कि पिछले 10 वर्षों यानी 2014 से 2024 के दौरान आईसीएआर ने 2,900 फसल किस्में जारी कीं, जिनमें से 2,661 किस्में एक या अधिक जैविक और/या अजैविक दबावों के प्रति सहनशील हैं।
जलवायु परिवर्तनशीलता के अनुकूलन के लिए धान गहनता प्रणाली (SRI), एरोबिक राइस, डायरेक्ट-सीडेड राइस और फसल अवशेषों के इन-सीटू प्रबंधन जैसी स्थान-विशिष्ट जलवायु अनुकूल तकनीकों को भी किसानों के बीच बढ़ावा दिया जा रहा है।
ड्रिप सिंचाई और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा
कृषि में जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ योजना के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है। वर्षा सिंचित क्षेत्र विकास योजना के जरिए एकीकृत कृषि प्रणाली को बढ़ावा देकर जलवायु जोखिम कम करने और उत्पादकता बढ़ाने पर काम किया जा रहा है।
इसके अलावा सॉयल हेल्थ एंड फर्टिलिटी योजना के जरिए उर्वरकों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा दिया जा रहा है। परंपरागत कृषि विकास योजना के माध्यम से जैविक खेती और राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के जरिए प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
दलहन आत्मनिर्भरता मिशन, राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-तिलहन और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन के जरिए फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है। एकीकृत बागवानी विकास मिशन, कृषि वानिकी और राष्ट्रीय बांस मिशन भी जलवायु अनुकूलन को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों में शामिल हैं।
फसल नुकसान की भरपाई के लिए बीमा
प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु संबंधी जोखिमों से होने वाले फसल नुकसान से किसानों को सुरक्षा देने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और मौसम सूचकांक आधारित पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना लागू की जा रही है। इनके जरिए फसल नुकसान की स्थिति में किसानों को बीमा कवर उपलब्ध कराने का प्रावधान है।
इसके अलावा विकसित भारत-रोजगार गारंटी और आजीविका मिशन-ग्रामीण (VB-G RAM-G) के तहत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन कार्यों के माध्यम से जल संरक्षण को प्राथमिकता दी जा रही है। इसके तहत अनुमत 318 कार्यों में से 110 कार्य जल सुरक्षा और संरक्षण से जुड़े हैं।
भूमि क्षरण के बावजूद बढ़ा कृषि उत्पादन
सरकार ने बताया कि जैविक और अजैविक दबावों से उत्पन्न चुनौतियों के बावजूद कृषि क्षेत्र ने पिछले दशक में फसल उत्पादकता और समग्र कृषि उत्पादन में लगातार वृद्धि दर्ज की है। देश का खाद्यान्न उत्पादन 2014-15 में 252.03 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 357.73 मिलियन टन हो गया। वहीं, बागवानी उत्पादन 280.98 मिलियन टन से बढ़कर 370.73 मिलियन टन पहुंच गया।
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