राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

सूखी जमीन बनेगी किसानों की ताकत, विज्ञान और बाजार के सहारे बढ़ेगी खेती की आय

जलवायु-सहिष्णु फसलों, बेहतर जल प्रबंधन और आधुनिक तकनीक पर जोर;  25 से अधिक देशों के 800 से ज्यादा विशेषज्ञों ने किया मंथन

13 सितंबर 2026, नई दिल्ली: सूखी जमीन बनेगी किसानों की ताकत, विज्ञान और बाजार के सहारे बढ़ेगी खेती की आय –  शुष्क भूमि को अब कृषि की कमजोरी के रूप में देखने के बजाय किसानों की आय और आजीविका का मजबूत आधार बनाने की दिशा में प्रयास तेज किए जा रहे हैं। केंद्र सरकार शुष्क भूमि खेती को अधिक उत्पादक, लाभकारी और जलवायु-सहिष्णु बनाने के लिए विज्ञान, आधुनिक तकनीक, जल प्रबंधन और बाजार को एक साथ जोड़ने पर जोर दे रही है। कृषि क्षेत्र में इस बदलाव का लक्ष्य केवल प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि किसानों की आमदनी, आजीविका तथा खाद्य और पोषण सुरक्षा को मजबूत करना है।

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय कृषि विज्ञान परिसर में 10 सितंबर से शुरू हुए ‘ड्रायलैंड कांग्रेस 2026’ के उद्घाटन सत्र में कहा कि सही वैज्ञानिक तकनीक, अनुकूल नीतियां और मजबूत बाजार व्यवस्था उपलब्ध होने पर शुष्क क्षेत्र भारत ही नहीं, बल्कि अफ्रीका और समान कृषि चुनौतियों वाले अन्य क्षेत्रों के लिए भी बड़ी ताकत बन सकते हैं।

तीन दिवसीय सम्मेलन में 25 से अधिक देशों के 800 से ज्यादा वैज्ञानिक, किसान, नीति निर्माता, शिक्षाविद, उद्योग प्रतिनिधि और विकास क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं। सम्मेलन में कम पानी और चुनौतीपूर्ण जलवायु परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने के उपायों पर चर्चा की जा रही है।

जलवायु परिवर्तन के बीच नई फसलों पर जोर

शुष्क क्षेत्रों के किसानों के सामने अनिश्चित वर्षा और बदलती जलवायु सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल हैं। इसे देखते हुए जलवायु-सहिष्णु फसलों की नई किस्में विकसित करने तथा फसल सुधार की प्रक्रिया को तेज करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। सम्मेलन के तकनीकी सत्रों में भविष्य की फसल प्रजनन तकनीक, आनुवंशिक सुधार में तेजी और बदलती जलवायु के अनुरूप फसलों के विकास पर विशेषज्ञों ने विचार रखे।

इसके साथ ही बेहतर आहार और पोषण के लिए बाजार एवं नीतियों की भूमिका पर भी चर्चा की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि शुष्क भूमि खेती का भविष्य ऐसी कृषि प्रणालियों में है, जो कम पानी में भी उत्पादन और किसानों की आय दोनों को बनाए रख सकें।

पानी की हर बूंद से अधिक लाभ

शुष्क भूमि खेती में जल प्रबंधन को परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। पूर्व भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद महानिदेशक डॉ. आर.एस. परोदा ने कहा कि लक्ष्य केवल पानी बचाना नहीं होना चाहिए, बल्कि पानी की प्रत्येक बूंद से अधिक आर्थिक और पोषण संबंधी मूल्य प्राप्त करना होना चाहिए।

इसके लिए ऐसी फसलों और किस्मों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है, जो सीमित जल संसाधनों का अधिक कुशल उपयोग कर सकें। साथ ही फसल विविधीकरण, जल संरक्षण और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देना जरूरी होगा।

सरकार का मानना है कि शुष्क भूमि खेती को केवल उत्पादन के आंकड़ों से नहीं आंकना चाहिए। इसकी वास्तविक सफलता तब होगी, जब कम पानी वाले क्षेत्रों में रहने वाले किसानों की आय बढ़े, उनकी आजीविका सुरक्षित हो और उन्हें बेहतर बाजार उपलब्ध हों। विज्ञान, नीति, जल प्रबंधन और बाजार के इस समन्वय से शुष्क भूमि आने वाले समय में कृषि क्षेत्र की चुनौती के बजाय किसानों की नई आर्थिक ताकत बन सकती है।

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