ICAR-CIAE भोपाल की बड़ी खोज: अब स्ट्रिप बताएगी फल-सब्जी कितनी है ताजा, रंग बदलकर देगी संकेत
14 मई 2026, नई दिल्ली: ICAR-CIAE भोपाल की बड़ी खोज: अब स्ट्रिप बताएगी फल-सब्जी कितनी है ताजा, रंग बदलकर देगी संकेत – कृषि उद्योग के तेजी से बदलते परिदृश्य में ताजे फल और सब्जियों की गुणवत्ता तथा ताजगी बनाए रखना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। खेत से लेकर उपभोक्ता की थाली तक पहुंचने की प्रक्रिया में परिवहन, भंडारण और हैंडलिंग जैसे कई चरण शामिल होते हैं, जो उत्पादों की गुणवत्ता और शेल्फ लाइफ को प्रभावित करते हैं। इसी समस्या के समाधान के लिए ICAR-CIAE, भोपाल के शोधकर्ताओं ने एक नई जैव-आधारित pH-संवेदनशील संकेतक स्ट्रिप विकसित की है, जो फल और सब्जियों की ताजगी का वास्तविक समय में पता लगाने में सक्षम है।
यह तकनीक इस सिद्धांत पर आधारित है कि जैसे-जैसे फल और सब्जियां खराब होने लगती हैं, उनके pH स्तर में बदलाव होता है। इस बदलाव को पहचानने के लिए वैज्ञानिकों ने प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया है, जिसमें काली गाजर के छिलके से प्राप्त एंथोसाइनिन, चुकंदर के छिलके से बेटालेन और हल्दी से करक्यूमिन पिगमेंट शामिल हैं। इन प्राकृतिक रंगों को कागज़ पर कोटिंग कर एक विशेष स्ट्रिप तैयार की जाती है, जिसे 30 डिग्री सेल्सियस पर सुखाया जाता है। यह स्ट्रिप पैकेजिंग में आसानी से लगाई जा सकती है और खाद्य उत्पादों से निकलने वाले वाष्पशील तत्वों के संपर्क में आने पर रंग बदलती है।
उपभोक्ता इस रंग परिवर्तन को देखकर आसानी से समझ सकते हैं कि फल या सब्जी कितनी ताजा है या खराब होने की स्थिति में पहुंच चुकी है। यह तकनीक न केवल उपभोक्ताओं को बेहतर निर्णय लेने में मदद करती है, बल्कि खाद्य अपव्यय (food waste) को कम करने में भी सहायक साबित हो सकती है।
कैसे काम करती है यह स्मार्ट स्ट्रिप?
इस जैव-आधारित स्ट्रिप का काम फल और सब्जियों से निकलने वाली गैसों और pH परिवर्तन को पहचानना है। जैसे ही उत्पाद खराब होने लगता है, उसका रासायनिक संतुलन बदलता है और स्ट्रिप का रंग भी उसी के अनुसार बदल जाता है। इससे ताजगी की स्थिति तुरंत समझ में आ जाती है।
परीक्षण में मिले प्रभावी परिणाम
मशरूम के परीक्षण में पाया गया कि शुरुआती दिनों में pH 6.25 पर स्ट्रिप का रंग लैवेंडर था, जो ताजगी का संकेत देता है। आठवें दिन pH बढ़कर 7.83 होने पर रंग बैंगनी हो गया, जबकि 12वें दिन pH 8.45 से अधिक होने पर रंग धूल-नीला हो गया, जो खराब होने का संकेत था।
चीकू (सपोटा) पर किए गए परीक्षण में भी इसी तरह परिणाम मिले। पहले दिन हल्का पीला रंग ताजगी दिखा रहा था, जबकि 16वें दिन हल्का गुलाबी रंग खराब होने का संकेत बन गया।
स्ट्रॉबेरी, चेरी, ब्लूबेरी और जामुन जैसे फलों पर भी इस तकनीक ने स्पष्ट और विश्वसनीय रंग परिवर्तन दिखाए, जिससे उनकी गुणवत्ता का सटीक आकलन संभव हुआ।
सस्ती और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक
यह जैव-आधारित पिगमेंट स्ट्रिप न केवल प्रभावी है, बल्कि काफी किफायती भी है। इसकी अनुमानित लागत लगभग ₹0.75 से ₹1.5 प्रति स्ट्रिप पैकेट है। कृषि अपशिष्ट से तैयार होने के कारण यह पर्यावरण-अनुकूल भी है।
इसके अलावा पाउडर रूप में इसकी स्थिरता लगभग 4 महीने और स्ट्रिप रूप में लगभग 2.5 महीने तक पाई गई है, जिससे यह व्यावसायिक उपयोग के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में स्मार्ट पैकेजिंग का हिस्सा बन सकती है। इससे उपभोक्ताओं को खरीदते समय ही उत्पाद की गुणवत्ता का स्पष्ट संकेत मिल सकेगा, जिससे खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता नियंत्रण दोनों मजबूत होंगे।
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