किसानों पर बढ़ती लागत की जताई आशंका, पीएमएफएआई ने पेस्टिसाइड मैनेजमेंट बिल में डेटा प्रोटेक्शन प्रावधान का किया विरोध
उद्योग संगठन का कहना है कि डेटा एक्सक्लूसिविटी लागू होने से जेनेरिक कीटनाशकों की उपलब्धता प्रभावित होगी और किसानों की लागत बढ़ सकती है
26 मई 2026, मुंबई: किसानों पर बढ़ती लागत की जताई आशंका, पीएमएफएआई ने पेस्टिसाइड मैनेजमेंट बिल में डेटा प्रोटेक्शन प्रावधान का किया विरोध – पेस्टिसाइड मनुफक्चरर्स एंड फ़ॉर्मूलेटर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (PMFAI) ने प्रस्तावित पेस्टिसाइड मैनेजमेंट बिल (PMB) में रेगुलेटरी डेटा प्रोटेक्शन (RDP) अथवा डेटा एक्सक्लूसिविटी प्रावधान शामिल किए जाने का विरोध किया है। संगठन का कहना है कि ऐसा कदम भारतीय किसानों के लिए फसल सुरक्षा उत्पादों की लागत बढ़ा सकता है और घरेलू एग्रोकेमिकल उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को प्रभावित कर सकता है।

मुंबई से जारी एक प्रेस बयान में पीएमएफएआई ने कहा कि बहुराष्ट्रीय एग्रोकेमिकल कंपनियां और आयात समूह आगामी पेस्टिसाइड मैनेजमेंट बिल तथा भारत-यूरोपीय संघ और अमेरिका के बीच चल रही मुक्त व्यापार समझौता (FTA) वार्ताओं के माध्यम से पांच वर्ष के रेगुलेटरी डेटा प्रोटेक्शन प्रावधान को शामिल कराने के लिए दबाव बना रहे हैं।
220 से अधिक भारतीय एग्रोकेमिकल और कृषि-इनपुट कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस संगठन ने कहा कि यह प्रस्ताव भारत की मौजूदा बौद्धिक संपदा व्यवस्था से आगे बढ़कर घरेलू उद्योग और किसानों के हितों पर असर डाल सकता है।
किसानों की लागत बढ़ने की आशंका
पीएमएफएआई के अनुसार भारत की कृषि व्यवस्था मुख्य रूप से छोटे और सीमांत किसानों पर आधारित है, जिनके पास सामान्यतः एक से पांच एकड़ तक भूमि होती है। संगठन का कहना है कि यदि पेटेंट अवधि समाप्त होने के बाद भी जेनेरिक उत्पादों के बाजार में आने पर रोक लगती है, तो प्रतिस्पर्धा कम होगी और फसल सुरक्षा उत्पाद महंगे हो जाएंगे।
संगठन के मुताबिक, ऐसी स्थिति में किसानों को कुछ कीटनाशकों और फसल सुरक्षा रसायनों के लिए मौजूदा प्रतिस्पर्धी दरों की तुलना में 35 से 50 प्रतिशत अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। इससे खेती की लागत बढ़ेगी और किसानों की लाभप्रदता प्रभावित हो सकती है।
भारत दुनिया के बड़े कीटनाशक उपभोक्ता देशों में शामिल है, जहां कपास, धान, सोयाबीन, फल एवं सब्जियों सहित कई फसलों में व्यापक स्तर पर फसल सुरक्षा उत्पादों का उपयोग होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता ने किसानों तक फसल सुरक्षा समाधान पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
डेटा एक्सक्लूसिविटी की आवश्यकता पर सवाल
पीएमएफएआई ने कहा कि भारत पहले से ही एग्रोकेमिकल नवाचारों के लिए 20 वर्ष की पेटेंट सुरक्षा प्रदान करता है और इसके अतिरिक्त डेटा एक्सक्लूसिविटी की आवश्यकता नहीं है। संगठन ने संसद की कृषि, पशुपालन एवं खाद्य प्रसंस्करण संबंधी स्थायी समिति की 17वीं लोकसभा की 36वीं रिपोर्ट का भी उल्लेख किया, जिसमें एग्रोकेमिकल क्षेत्र में रेगुलेटरी डेटा प्रोटेक्शन लागू करने का समर्थन नहीं किया गया था।
संगठन ने यह भी कहा कि यह दावा सही नहीं है कि डेटा प्रोटेक्शन के बिना नई तकनीकें भारत में नहीं आएंगी। पीएमएफएआई के अनुसार पिछले दो वर्षों में भारत में 36 नए कीटनाशक अणुओं का पंजीकरण हुआ है, जो दर्शाता है कि वैश्विक कंपनियां बिना डेटा एक्सक्लूसिविटी प्रावधान के भी भारतीय बाजार में नए उत्पाद ला रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का विशाल कृषि बाजार, विविध फसल प्रणाली और बढ़ती मांग वैश्विक एग्रोकेमिकल कंपनियों को स्वाभाविक रूप से आकर्षित करती है।
घरेलू एग्रोकेमिकल उद्योग पर असर
पीएमएफएआई ने कहा कि प्रस्तावित प्रावधान का सबसे अधिक असर देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) पर पड़ सकता है, जो भारतीय एग्रोकेमिकल विनिर्माण क्षेत्र की महत्वपूर्ण आधारशिला हैं। भारत आज दुनिया के प्रमुख जेनेरिक एग्रोकेमिकल निर्माताओं और निर्यातकों में शामिल है।
संगठन के अनुसार, पेटेंट समाप्ति के बाद भी जेनेरिक उत्पादों के बाजार में आने में देरी होने से भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है और “मेक इन इंडिया” तथा “आत्मनिर्भर भारत” जैसे सरकारी अभियानों पर भी असर पड़ सकता है।
पिछले एक दशक में भारत का एग्रोकेमिकल निर्यात लगातार बढ़ा है, जिसमें घरेलू विनिर्माण क्षमता और लागत प्रतिस्पर्धा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
सरकार से प्रस्ताव खारिज करने की मांग
इस मुद्दे पर Pradip Dave, पीएमएफएआई के अध्यक्ष, ने कहा कि संगठन ने केंद्र सरकार से मौजूदा नीति को बरकरार रखने और किसानों तथा घरेलू उद्योग के हितों की रक्षा करने की अपील की है।
पीएमएफएआई ने बताया कि उसने प्रधानमंत्री कार्यालय, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय को ज्ञापन सौंपकर पेस्टिसाइड मैनेजमेंट बिल और भविष्य के व्यापार समझौतों में किसी भी प्रकार के रेगुलेटरी डेटा प्रोटेक्शन प्रावधान को शामिल नहीं करने का आग्रह किया है।
एग्रोकेमिकल क्षेत्र में डेटा एक्सक्लूसिविटी को लेकर बहस लंबे समय से जारी है, जिसमें एक ओर नवाचार को प्रोत्साहन देने की दलील दी जाती है, वहीं दूसरी ओर किसानों के लिए सस्ती और सुलभ फसल सुरक्षा उत्पादों की उपलब्धता को लेकर चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं।
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