मूंग व उड़द में रोग प्रबंधन

Share this

पत्ती धब्बा रोग 

मूंग व उड़द का यह रोग कभी-कभी भारी क्षति महामारी के रूप में देखा जाता है। इस रोग से पौधों की वृद्धि विकास रूक जाती है। जिसके कारण से उपज पर भारी नुकसान होता है। रोगजनक पौधों की पत्तियों पर आक्रमण करता है जिसके कारण से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित हो जाती है। और पौधा अपना भोजन नहीं बना पाती है।

रोग लक्षण: रोगजनक की दो प्रजातियां पौधों को प्रभावित करती है जिसके कारण से दो तरह के लक्षण उत्पन्न होते है। सर्कोस्पोरा क्रूयूऐन्टा पत्तियों पर वृत्ताकार या कोणीय धब्बे उत्पन्न करते है, धब्बे बंैगनी सा लाल रंग की होती है। साथ ही पौध की पुरानी फल्लियों पर रोग का प्रभाव होता है। जिसके कारण से बीज सिकुड़ कर काले हो जाते है व रोग का प्रभाव पौधों के तने पर भी देखा जाता है बड़े आकार के धब्बे बनते है। दूसरी प्रजाति सर्कोस्पोरा कैनेसेन्स- इस रोगजनक के प्रभाव से पत्तियों पर अर्धवृत्ताकार से अनियमित आकार के भूरा पीला धब्बे उत्पन्न करते हैं जिसके कारण से पत्तियां झुलस कर मर जाती है।

रोग प्रबंधन:

  • पौध अवशेषों को एकत्र कर जला दें।
  • ग्रीष्म कालीन जुताई को मई-जून में करें।
  • रोग प्रतिरोधी जाति का चुनाव करें।
  • फसल चक्र अपनायें।
  • बीज उपचारित कार्बेंडाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से करें।
  • रोगग्रसित पौधों को उखाड़कर जला दें।
  • ब्लाईटॉक्स-5.0, ब्लकापर 0.3 प्रतिशत की दर से छिड़काव 15 दिन के अंतराल से करें।
  • जिनेब या डाइथेन-जेड 78 दवा का 0.2 प्रतिशत की दर से छिड़काव करें।

पीला मोजेक रोग

यह रोग जो वायरस द्वारा उत्पन्न होता है और रोग का संचार सफेद मक्खी द्वारा होता है। यह रोग का प्रकोप व्यापकता से तीव्रता से बढ़कर पूरी फसल को प्रभावित कर देती है। यदि रोग का प्रभाव पौध की आरंभिक अवस्था में संक्रमित होने से पौध को शत-प्रतिशत क्षति पहुंचाती है।

रोग लक्षण: रोग लक्षण फसल बुआई के 4-5 सप्ताह में ही दिखाई देने लगती है। रोग जनक पत्तियों पर गोलाकार पीले रंग के धब्बे प्रकट करता है। धीरे-धीरे धब्बे चकत्ते के रूप में परिवर्तन हो जाते हैं और इस प्रकार से पत्तियां पूरी तरह से पीली होती हैं। और अंत में पत्तियां सफेद सी होकर सूख जाती हैं। रोग जनक के प्रभाव के कारण से पौधों में फल्लियां बहुत कम बनती है और बीज भी सिकुड़ जाते हैं।

रोग प्रबंधन:

  • पुराने पौध अवशेषों व खरपतवारों को नष्ट कर दिया जाये।
  • रोग प्रतिरोधी जातियों का चुनाव- मूंग-के. नरेन्द्र, मंूग-1, गंगा-8, आई.पी.एम 99.- उड़द – नरेन्द्र उड़द -1, यू-96-3, जे.यू.-3

चारकोल विगलन/चारकोल रॉट रोग

इस रोग का प्रकोप छ.ग., म. प्र., पंजाब व उड़ीसा में अधिक उग्र रूप में देखा गया है। मूंग का चारकोल विगलन रोग मैक्रोफोमिना फैजिओलाई नामक फफूंद से संक्रमित होता है। रोगजनक पौध आवशेषों में एक वर्ष से दूसरे वर्ष तक जीवित रहते हैं।

रोग लक्षण: रोगजनक पौधों के तने व जड़ों को प्रभावित करता है, मुख्य रूप सें जिसके कारण से जड़ व तना सडऩ/विगलन हो जाती है और पौध मर जाते है। प्रभावित पौध जड़ों व तनों पर काली- भूरे रंग के कवक जाल रचनाएं दिखाई देती हैं। पत्तियों के नीचे की सतह पर लाल भूरे रंग की नाडिय़ां दिखाई देती हंै।

रोग प्रबंधन: 

  • बीज उपचारित कार्बेंडाजिम बीज 2 ग्राम प्रति किलो बीज दर के अनुसार।
  • फसल चक्र ज्वार या बाजरा के साथ पौध अवशेषों को जला दें।
  • मेंकोजेब 0.2 प्रतिशत की दर से 3 छिड़काव करें 15 दिनों के अंतराल में।

चूर्णिल आसिता या भभूतिया 

यह रोग मूंग व उड़द की खरीफ व रबी मौसम में ली जाने वाली फसल में इस रोग का प्रभाव देखा गया है ।

रोग लक्षण: सर्वप्रथम पत्तियों का सफेद रंग के छोटे-छोटे चकत्ते बनते है जो बाद में बड़े होकर एक-दूसरे से मिल जाते है और पूरी पत्तियों को ढक लेते हैं, पत्तियों व पौधों के अन्य भागों पर सफेद चूर्ण जमा हो जाता है यह चूर्ण रोगजनक कवक के कवकजाल तथा बीजाणुओं का समूह होता है जो प्रमुख रूप से पत्तियों की ऊपरी सतह पर तथा अधिक प्रकोप होने पर पत्ती की निचली सतह को भी ग्रसित करते हैं रोग की उग्र अवस्था मे संक्रमित पौधे की पत्तियां पूर्णत: सूख जाती हैंं।

रोग प्रबंधन:

  • रोग रोधी सहनशील किस्में- उड़द एलबीजी 17, डब्ल्यू बी.यू 108।
  • 25-30 कि.ग्रा/हे. गंधक चूर्ण (200 मेश) का छिड़काव।
  • घुलनशील गंधक (03 ग्राम), कार्बेन्डाजिम (01 ग्राम), ट्राइडेमार्क या डिनोकेप ( 01 मिली) में से किसी एक कवकनाशी का 3 बार 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।

  • दिलीप कुमार
  • मिथलेश कुमार 
  • अशोक कोसरिया
  • टेकलाल कांत

कृषि विज्ञान केन्द्र, पाहंदा दुर्ग (छग)
patle.dilip.kumar@gmail.com

Share this
Advertisements

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

sixteen + six =

Open chat
1
आपको यह खबर अपने किसान मित्रों के साथ साझा करनी चाहिए। ऊपर दिए गए 'शेयर' बटन पर क्लिक करें।