संपादकीय (Editorial)

जलवायु परिवर्तन  सिर्फ सोचना नहीं, कृषि को बचाना भी है

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  • विनोद के. शाह
    मो. 9425640778

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7 मार्च 2023, भोपाल ।  जलवायु परिवर्तन  सिर्फ सोचना नहीं, कृषि को बचाना भी है – सम्पूर्ण विश्व सहित भारत के लिये इस समय सवसे बड़ी चुनौती जलवायु परिवर्तन की है। सरकार कृषि उत्पादन एवं निर्यात के आंकड़े दिखाकर अपनी सुदृढ़ अर्थव्यवस्था की दुहाई दे सकती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कृषि पर हो रहे दुष्प्रभावों को गंभीरता से लेने का प्रयास नहीं किया गया तो निकट भविष्य देश में खाद्यान्न संकट का होगा। केन्द्रीय बजट 2023-24 में केन्द्र सरकार ने किसानों की ऋण संख्या में वृद्धि, कृषि का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर फ्लेटफार्म तैयार करने, एग्री स्टार्टअप एवं मछली पालन जैसी योजनाओं को तो शामिल किया है। लेकिन सामने खड़े जलवायु परिवर्तन के दानव से देश की कृषि को बचाने में सरकार सजगता के बजाए बेपरवाह दिखाई दे रही है। पिछले एक दशक में देश में बाढ़, सूखा, अत्याधिक ठंड, कम समय में बहुत अधिक बारिश, गर्म हवाओं एवं तापमान वृद्धि के कारणों से फसलें निरंतर प्रभावित हो रही हैं।

वैज्ञानिक अनुसंधान बता रहे हंै कि आगामी समय में मौसम इसी रुप से परिवर्तन होता रहेगा। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट चौकन्ना करती है कि आगामी 15 वर्षों में भारत की पंैतालीस मिलियन जनसंख्या जलवायु परिवर्तन से खाद्यान्न उत्पादन की कमी एवं बेरोजगारी के कारण अत्याधिक गरीबी का जीवन यापन करने को मजबूर होगी। कारण चिंतनीय है आगामी देढ़ दशक में देश की धरती के तापमान में दो डिग्री से.ग्रे. की वृद्धि तय मानी जा रही है। इस तापमान की बढ़ोतरी से मानसून की तीव्रता में दस फीसदी की तेजी आयेगी। यानि कम समय में बहुत अधिक बारिश का होना पानी की बून्दों का बड़ा आकार होना, बादल फटना, आकाशीय बिजली का अचानक से गिरना। बाढ़ के साथ फसलों को नष्ट करने वाले प्रकोप होंगे।

संयुक्त राष्ट्रसंघ वर्किंग ग्रुप में 67 देशों के 270 वैज्ञानिकों द्वारा जारी संयुक्त रिपोर्ट कहती है कि वातावरण को तबाह करने वाली गैसों के उत्सर्जन में 14 फीसदी की बढ़ोतरी होने जा रही है। जलवायु परिवर्तन से जुड़े कुप्रभावों को वापिस कर पाना संभव नहीं है। उपाय प्रतिकूल परिस्थितियों में फसलों के बचाव एवं उत्पादन हेतु कार्ययोजना तैयार करने की है। विगत पांच वर्षों के आंकड़ों में देश के हिमाचल, उत्तराखंड सहित उप्र, बिहार, मप्र, छत्तीषगढ, महाराष्ट्र में आसमानी बिजली गिरने की घटनाओं में 15 फीसदी की दर से वृद्धि हुई है। कम समय में अत्याधिक बारिश बाढ़ के हालात पैदा करने वाले रहे हैं। बारिश के बाद इन्ही स्थानों पर लम्बे सूखे के हालात बने हंै। जलवायु परिवर्तन से देश की कृषि में जीवांश की मात्रा तेजी से कम हुई है। देश की कृषि उपयोगी मिट्टी में आवश्यक जैविक तत्व की मात्रा तीन से छ: फीसदी होने के बजाय वर्तमान में यह मात्र 0.5 फीसदी ही शेष है। शोध बताते हंै कि ईमानदारी पूर्ण प्रयास किये जायें तो मिट्ट़ी के इस जीवांश सुधार में 20 वर्ष का समय लग जायेगा, लेकिन इसके विपरीत जैविकता नष्ट करने कि प्रक्रिया जारी रही तो आगामी पचास सालों में भारत की खेतिहर भूमि की उर्वरता पूर्णत: समाप्त हो जायेगी।

वैज्ञानिक अनुमान के मुताबिक दो डिग्री तापमान वृद्धि से देश का गेहंू उत्पादन दस मिलियन टन कम हो जायेगा। वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि से खाद्यान्न फसलों से प्रोटीन सहित अन्य तत्वों की मात्रा कम होगी। पशुओं में प्रजनन क्षमता में कमी के साथ उनकी दुग्ध उत्पादकता क्षमता में अत्याधिक गिरावट दर्ज होगी। मृदा में कमी से फसलों में कीटों एवं नुकसानदायी जीवाणुओं का प्रकोप बहुत तेजी से बढ़ेगा। परागणी कीटों की संख्या में कमी आयेगी। एक अनुसंधान में जलवायु परिवर्तन से देश में वर्ष 2050 तक चावाल के उत्पादन में एक फीसदी की कमी,मक्का एवं कपास में क्रमश: 13 एवं 11 फीसदी उत्पादन घटने की आशंका जाहिर की है। जबकि सन् 2080 तक चावाल उत्पादन में छ: फीसदी मक्का एवं कपास में 24 फीसदी उत्पादकता घटने की आशंका व्यक्त की गई है। गत वर्ष के मौसम पर गौर करें तो गेहंू फसल पकते समय अचानक गर्म हवाओं के चलने से गेहंू उत्पादन के पूर्वानुमान में जर्बदस्त गिरावट दर्ज की गई थी। खरीफ फसल 2022 में उड़द, मंूग, तिलहन सहित धान का उत्पादन अनुमान से कम उतरा है। जिसकी वजह मानसून में देरी, बारिश की अधिकता रही थी। आगामी दिनों में मौसम वैज्ञानिकों ने समय पूर्व तापमान में वृद्धि, उत्तर भारत में समय से पूर्व लू चलने की आशंका व्यक्त की है। जिसके प्रभाव से आगामी दलहन फसलों सहित गेहंू की फसलें समय पूर्व पककर तैयार होगी जिससे उत्पादन में गिरावट की पुन: आशंका है।

भारत सबसे बड़ा जल का दोहन करने वाला देश 

भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूमिगत जल का दोहन करने वाला देश बन चुका है। दुनिया का एक चौथाई यानि 251 बिलियन क्यूबिक मीटर भूमिगत जल प्रतिवर्ष भारत में निकाला जाता है। इसके विपरीत भूमिगत जल संचय में देश का योगदान नगण्य है। जैविक कृषि से संबंधित एक अनुसंधान बताता है कि यदि कृषि भूमि की कार्बनिक क्षमता एक फीसदी भी वृद्धि कर दी जाये तो प्रति हेक्टेयर जमीन की जलधारिता में पिच्चहत्तर हजार ली. की वृद्धि संभव है।

देश के कृषि विश्वविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र अधिक पैदावार वाले बीजों को तो विकसित कर रहे हैं। जो लम्बी फसल अवधि एवं अधिक सिंचाई वाले हुआ करते हंै। जलवायु परिवर्तन की चुनौती में अब इन अनुसंधान के बजाए कम अवधि, कम सिंचाई एवं मौसमी परिवर्तन सहन करने वाली फसलों को विकसित करने की आवश्यकता है। 

हाइड्रोजेल तकनीक अपनाने की आवश्यकता

फसलों को मौसमी परिवर्तन एवं सूखे से बचाने के लिए अब देश को हाइड्रोजेल तकनीक अपनाने की आवश्यकता है। विकसित देशों में लोकप्रिय हाइट्रोजेल बीज अंकुरण, जड़ वृद्धि सहित फसली पौधों को सूखे एवं गलन से बचाने का कार्य करते हैं। पानी के वाष्पीकरण को कम करने के साथ हाइड्रोजेल 40 डिग्री सेल्सियस के उच्च तापमान तक कार्य करने में सक्षम होते हंै। अपने सूखे वजन से चार सौ गुना पानी अवशोषित कर सूखा दौरान फसल की जड़ों तक पहुंचाने का कार्य करते हंै। निरन्तर सिंचाई के पानी, हवा की आद्र्रता एवं औस की बूंदों को अवशोषित कर आवश्यक समय में फसल को पानी की आपूर्ति करते हैं। यह तकनीक देश की कृषि पद्धति के अनुकूल होने के साथ पर्यावरण रक्षक एवं किफायती है।

सरकार को जलवायु परिवर्तन से निपटने इस तकनीक के उपयोग को प्रोत्साहित करना चाहिए। जलवायु परिवर्तन का  विपरीत प्रभाव फसलों के सुरक्षित भंडारण पर भी पड़ेगा। अचानक मौसम परिवर्तन, वर्षा एवं तूफान की परिस्थियां तैयार फसलों को नुकसान पहुंचाने का कार्य करेगी। इसके लिये ग्रामों में सामूहिक भंडारग्रह एवं किसानों को स्वयं के उपयोगी भंडारग्रह के निर्माण हेतु अनुदान आधारित योजनाओं के माध्यम से प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। मिट्टी की जैविकता को बचाने गाय के गोबर एवं फसल अवशिष्टों से निर्मित खाद सबसे उत्तम है। देश में गेहूं, धान, मक्का एवं सोयाबीन के फसल अवशेष जिनकी सालाना उत्पत्ति सात सौ मिलियन मैट्रिक टन है। इसका बीस फीसदी प्रतिवर्ष किसान जला देते हंै। जो वातावरण में विषाक्त गैसों की मात्रा में वृद्धिओजन परत के नुकसान,मिट्टी के जीवांश को नष्ट करने के साथ मृदा में उपलब्ध फास्फोरस एवं पोटाश को अघुलनशील बनाकर ठोस रुप में परिवर्तित करने के लिए जिम्मेदार है। इससे मिट्टी के पीएच मान में वृद्धि, मिट्टी की उर्वराशक्ति के साथ जल अवशोषण क्षमता को बहुत अधिक नुकसान होता है।

पराली प्रबंधन के लिये केन्द्र सरकार ने पंजाब, हरियाणा, उप्र एवं दिल्ली को पिछले पांच सालों में 3138.17 करोड़ की राशि उपलब्ध कराई है। लेकिन सुधार की दिशा वैज्ञानिक न होने से अनुरुप परिणाम नहीं मिल सके हंै। जलवायु परिवर्तन के कारणों में देश में नाइट्रोजन का अत्याधिक उत्सर्जन भी एक बड़े कारण के रुप में है। भारतीय कृषि में प्रतिवर्ष 1.8 करोड़ टन यूरिया का उपयोग होता है जो कि विश्व में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। नाइट्रोजन का सीमित उपयोग पौधों को आवश्यक पोषक तत्व एवं प्रोटीन निर्माण में आवश्यक है। देश में सरकारी अनुदान से प्राप्त यूरिया सस्ता होने से देश का किसान अज्ञानतावश इसे फसल वृद्धि का कारक मानकर अंधाधुंध प्रयोग कर रहा है। किसानों को सीमित प्रयोग की जागरुकता से परिचित करना आवश्यक है। सरकार को जलवायु परिवर्तन के कुप्रभावों से कृषि को सुरक्षित करने युद्ध स्तर पर जुटना होगा।                   

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