फसल की खेती (Crop Cultivation)

सरसों में ज़ेबा करे उपज में वृद्धि सुनिश्चित

  • हर्षल प्रताप सोनवणे
    लीड – क्रॉप एस्टाब्लिशमेंट
    यूपीएल लिमिटेड, मुंबई

23  अगस्त 2021,  सरसों में ज़ेबा करे उपज में वृद्धि सुनिश्चित – जलवायु में बदलाव अब हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, जिस कारण पिछले कई सालों की तरह इस साल भी बरसात में अनियमितता एक जटिल समस्या बन चुकी है। उत्तरी भारत में जून एवं जुलाई में बहुत ही कम बारिश दर्ज की गई है, जिस कारण खरीफ की फसलों की बुआई पर बहुत बुरा असर पड़ा है। सोयाबीन, उड़द, मूंग, मूंगफली, कपास, मकई एवं अन्य कई फसलों की बोनी कई लाख एकड़ में हुई ही नहीं और जहां पर हुई भी है, वहां सूखे के कारण फसलों की अवस्था जटिल बनी हुई है। खरीफ में हुए नुकसान की भरपाई करने के लिए एवं जलवायु बदलाव का सामना करने के लिए किसान खेती में अन्य नए पर्यायों की पहल कर रहा है। सरसों की फसल एक अच्छा पर्याय किसान के सामने अब उपलब्ध है।

सरसों गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार के साथ-साथ पश्चिम बंगाल एवं छत्तीसगढ़ राज्यों में रबी की एक मुख्य फसल है। सरसों की बोनी इन राज्यों में सितंबर के मध्य से लेकर नवंबर के अंत तक चलती है। यह एक बहुत ही कम लागत वाली फसल है। विभिन्न प्रदेशों के जलवायु एवं मिट्टी के अवस्थानुसार किसान नामचीन कंपनियों के बीज एवं स्थानीय बीज बोता है। बीज की प्रजाति अनुसार एकड़ में 1 किलो से लेकर 6 किलो तक बीज किसान बोता है। किसान सरसों में पानी की उपलब्धतानुसार 1 से 3 सिंचाई देता है। बुआई से पहले आखिरी जुताई के बाद किसान डीएपी एवं एनपीके युक्त मिश्र खाद का इस्तेमाल करता है। तिलहन वाली फसल होने के कारण खाद के साथ सल्फर का इस्तेमाल भी किसान करते हैं। फसल संरक्षण में पेंडीमिथालीन जैसे अंकुरण पूर्व खरपतवारनाशक का इस्तेमाल कुछ जगहों में किया जाता है। माहू जैसे रसचूसक कीट एवं सफेद रोली जैसे रोगों के लिए किसान रेनो एवं साफ जैसी दवा का इस्तेमाल करता है। आईए जानते हैं, यूपीएल लि., मुंबई जो कृषि जगत की विश्व की अग्रणी कंपनी है, इस कंपनी का आधुनिकतम एवं तकनीकी उत्पाद ज़ेबा, कैसे सरसों की उपज वृद्धि में सहायक है।

ज़ेबा क्या है?

ज़ेबा स्टार्च आधारित जल का महाअवशोषक है।

प्राकृतिक जायद मूंग फसल में मिट्टी बनी सहारा

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सरसों में ज़ेबा कैसे काम करता है?

सोखे : ज़ेबा अपने वजन से 450 गुना पानी सोखता है।

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पकड़े : ज़ेबा अवशोषित पानी का अपने अंदर संचय करता है।

छोड़े : ज़ेबा पौधे को आवश्यकतानुसार पानी प्रदान करता है।

जैव विघटन : ज़ेबा 6 महिनों तक ‘सोखे पकड़े छोड़े’ प्रक्रिया सक्रिय रखकर बाद में जैव विघटित होकर नष्ट हो जाता है।

सरसों में ज़ेबा की प्रयोग विधि

मात्रा : 5 किग्रा/एकड़।

ध्यान दें : ज़ेबा जमीन के अंदर 4 से 6 इंच जड़ों की कक्षा में जाना चाहिए।

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बुआई से पहले – बेड तैयार करते वक्त खाद के साथ।

बुआई के वक्त – बीज एवं खाद डबल सीड ड्रिल के साथ, खाद समेत बीजों के कुंड में।

सरसों में ज़ेबा के फायदे क्या है ?

जल एवं पोषण संचय : बारिश एवं सिंचाई द्वारा दिया हुआ अतिरिक्त पानी एवं उसमे घुला हुआ पोषण ज़ेबा अपने अंदर संचय करके,पौधे को जब चाहे तब प्रदान करता है। जिस कारण फसल अनचाहे तनाव फिर चाहे पानी एवं पोषण कम मिलने से हो या ज्यादा मिलने से हो उसको आसानी से झेल के सुरक्षित एवं स्वस्थ जीवनचक्र पूर्ण करता है।

रिसाव (लिचिंग) को रोके : ज़ेबा की संचयन की यही खूबी पानी एवं पोषण का जड़ों की कक्षा से बाहर होने वाला रिसाव रोककर दोनों की बचत करता है।

सदैव भुरभुरी मिट्टी एवं नमी रहे बरकरार: अपने वजन से 450 गुना पानी सोखते वक्त ज़ेबा जेल स्वरूप बनकर मिट्टी के साथ अनुबंध बनाता है, जिस कारण मिट्टी में हवा के छोटे-छोटे क्षेत्र बन जाते हंै जो जमीन को भुरभुरा बनाते हंै। भुरभुरी मिट्टी जड़ एवं मृदा स्थित मित्र जीवों को सक्रिय रखती है। जो पौधे को पानी एवं पोषण की आवश्यक मात्रा लेने में सहायक होती है। जिस कारण सडऩ-गलन की बीमारी का प्रसार भी कम होता है।

जल एवं पोषण का सही इस्तेमाल : ज़ेबा के कारण जरूरत के अनुसार उपलब्ध होने वाला पानी एवं मिट्टी का भुरभुरापन पौधे की जड़ों को सक्रिय बनाकर पानी एवं पोषण का पूरा इस्तेमाल करते हैं, जो अंत में ज्यादा उपज में परिवर्तित होता है।

जैव विघटन के बाद बढ़ाये सेंद्रीय कर्ब : ज़ेबा स्टार्च निर्मित होने के कारण उसका जैव विघटन होकर उसका सेंद्रीय कर्ब जमीन में मिलकर जमीन को स्वस्थ बनाता है।
सभी प्रकार की जमीन के लिए सुरक्षित: ज़ेबा का पीएच न्यूट्रल याने 7 है एवं स्टार्च निर्मित होने के कारण ज़ेबा जमीन को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है।

  • एक समान अंकुरण, सशक्त फसल स्थापना।
  • पानी एवं पोषण के तनाव के कारण फसल की कमजोरी, फूल एवं फल्लियों का गलना जैसी समस्या हो कम।
  • उम्मीद से ज्यादा उपज एवं गुणवत्ता।
  • पानी, पोषण एवं उनको उपलब्ध कराने का खर्चा हो कम।
  • उम्मीद से ज्यादा मूल्य एवं ज्यादा प्रतिशत तेल।

देश को तेल उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने के लिए सरसों की उत्पादकता बढ़ाना महत्वपूर्ण है और ज़ेबा सरसों की उत्पादकता बढ़ाने में अनिवार्य पहल है।

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