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फसल की खेती (Crop Cultivation)

सोयाबीन में किसान बार-बार कौन सी गलतियाँ कर रहे हैं? यही वजह बन रही घटती पैदावार और बढ़ती लागत

बीजोपचार से लेकर खरपतवार नियंत्रण और खाद प्रबंधन तक, कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि छोटी लेकिन लगातार दोहराई जा रही गलतियाँ सोयाबीन की उत्पादकता पर बड़ा असर डाल रही हैं।

29 मई 2026, नई दिल्ली: सोयाबीन में किसान बार-बार कौन सी गलतियाँ कर रहे हैं? यही वजह बन रही घटती पैदावार और बढ़ती लागत – देश के प्रमुख सोयाबीन उत्पादक राज्यों में इस समय एक सवाल लगातार सुनाई दे रहा है — “खर्च बढ़ रहा है, लेकिन उत्पादन क्यों नहीं बढ़ रहा?” कई किसानों का मानना है कि मौसम सबसे बड़ी समस्या है, लेकिन कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि खेत स्तर पर होने वाली कुछ सामान्य गलतियाँ भी उत्पादन घटाने में बड़ी भूमिका निभा रही हैं।

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर द्वारा जारी सलाह में ऐसी कई गलतियों की पहचान की गई है जो शुरुआती अवस्था से लेकर कटाई तक फसल को प्रभावित करती हैं। 

बिना अंकुरण परीक्षण के बोवनी

कई किसान पिछले वर्ष बचा हुआ बीज सीधे बो देते हैं। लेकिन यदि बीज का अंकुरण कम हो, तो खेत में पौध संख्या घट जाती है। बाद में यही कम पौध संख्या उपज पर सीधा असर डालती है।

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राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने बोवनी से पहले बीज का अंकुरण परीक्षण करने और न्यूनतम 70 प्रतिशत अंकुरण सुनिश्चित करने की सलाह दी है। 

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विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार किसान कम अंकुरण वाले बीज की भरपाई के लिए अधिक बीज दर अपनाते हैं, जिससे खेत में पौधों की प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है।

बिना बीजोपचार के सीधे बोवनी

सोयाबीन में शुरुआती अवस्था सबसे संवेदनशील मानी जाती है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में किसान अभी भी बिना बीजोपचार के बोवनी कर रहे हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार बिना उपचारित बीज जड़ सड़न, तना मक्खी, दीमक और फफूंदजनित रोगों का जल्दी शिकार हो जाते हैं। 

संस्थान ने एज़ोक्सीस्ट्रोबिन 2.5% + थायोफिनेट मिथाइल 11.25% + थायामेथोक्साम 25% FS को 10 मिली प्रति किलो बीज की दर से उपयोग करने की सलाह दी है।

जरूरत से ज्यादा यूरिया डालना

विशेषज्ञों के अनुसार यह वर्तमान समय की सबसे सामान्य गलती बन चुकी है। कई किसान फसल को अधिक हरा रखने के लिए जरूरत से ज्यादा यूरिया डालते हैं।

इससे पौधे लंबे और नरम हो जाते हैं। कई खेतों में फलियाँ कम बनती हैं और रोगों का दबाव बढ़ जाता है। राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने सोयाबीन के लिए सीमित नाइट्रोजन और संतुलित पोषण की अनुशंसा की है। 

सल्फर और पोटाश की लगातार अनदेखी

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार कई खेतों में सल्फर की कमी अब स्पष्ट दिखाई देने लगी है। DAP और यूरिया के अधिक उपयोग के कारण पोषण संतुलन बिगड़ रहा है।

सल्फर की कमी से दाने छोटे रह जाते हैं और तेल प्रतिशत कम होता है, जबकि पोटाश की कमी फसल की सूखा सहन क्षमता घटाती है।

खरपतवार नियंत्रण में देरी

सोयाबीन की शुरुआती 35–40 दिन की अवस्था को खरपतवार प्रतिस्पर्धा की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन कई किसान तब खरपतवारनाशी डालते हैं जब खरपतवार काफी बड़े हो चुके होते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि देरी से नियंत्रण करने पर उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट आ सकती है। 

हर साल एक ही किस्म बोना

कई किसान वर्षों से एक ही किस्म की खेती कर रहे हैं। लेकिन बदलते मौसम और रोगों की स्थिति में यह जोखिम बढ़ा सकता है।

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने किसानों को कम से कम 2–3 किस्मों की खेती करने की सलाह दी है ताकि जैविक और अजैविक जोखिम कम किए जा सकें। 

नरवाई जलाने से कमजोर हो रही मिट्टी

गेहूँ कटाई के बाद खेत में आग लगाना अभी भी कई क्षेत्रों में सामान्य प्रथा है। लेकिन कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार इससे मिट्टी के लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं और जैविक कार्बन कम होता है। 

संस्थान ने रोटावेटर और वेस्ट डीकम्पोजर के उपयोग की सलाह दी है ताकि फसल अवशेष मिट्टी में मिल सकें।

गलत दूरी और अधिक बीज दर

विशेषज्ञों के अनुसार कई किसान “ज्यादा बीज, ज्यादा उत्पादन” की सोच के साथ अधिक बीज दर अपनाते हैं। लेकिन इससे पौधों में प्रतिस्पर्धा बढ़ती है और फलियाँ कम बनती हैं।

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने 30–45 सेंटीमीटर कतार दूरी और 5–10 सेंटीमीटर पौध दूरी की अनुशंसा की है। 

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि सोयाबीन में उत्पादन बढ़ाने के लिए केवल इनपुट बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। वैज्ञानिक तरीके से छोटी गलतियों को सुधारना ही लंबे समय में स्थिर उत्पादन का आधार बन सकता है।

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