खरीफ बुवाई का सही समय, वैज्ञानिकों ने बताए मौसम और तैयारी के जरूरी टिप्स
13 मई 2026, नई दिल्ली: खरीफ बुवाई का सही समय, वैज्ञानिकों ने बताए मौसम और तैयारी के जरूरी टिप्स – मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले में आगामी दिनों के मौसम को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को खरीफ फसलों की बुवाई की तैयारी अभी से शुरू करने की सलाह दी है। मौसम आमतौर पर शुष्क रहने और आंशिक बादल छाए रहने की संभावना के बीच किसानों को खेतों की तैयारी, बीज-खाद प्रबंधन और जल संरक्षण पर विशेष ध्यान देने को कहा गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार जिले में अधिकतम तापमान 38 से 40 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान 22 से 24 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहने की संभावना है। हवा की गति 14 से 22 किलोमीटर प्रति घंटा रहने का अनुमान है। ऐसे में किसान खरीफ बुवाई के लिए उन्नत बीज और खाद की व्यवस्था पहले से सुनिश्चित करें तथा वर्षा जल संरक्षण के लिए डबरी निर्माण और मेड़ों की मरम्मत का कार्य करें।
खेत की तैयारी और हरी खाद पर जोर
जिन किसानों के पास सिंचाई सुविधा उपलब्ध है, उन्हें हरी खाद के लिए मक्का या ढैंचा की बुवाई करने की सलाह दी गई है। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और आगामी खरीफ फसलों के लिए खेत बेहतर तैयार होता है। साथ ही किसान खरीफ प्याज की नर्सरी और उन्नत किस्म के बीज की व्यवस्था भी समय पर करें।
फसलों में रोग और कीट प्रबंधन
कृषि विशेषज्ञों ने अरबी की फसल में पत्ती धब्बा रोग की संभावना को देखते हुए रिडोमिल दवा 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी है। वहीं बैंगन में फल और तना छेदक कीट के नियंत्रण के लिए क्विनालफास 25 ई.सी. की 2.0 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सिफारिश की गई है।
पशुपालन और चारा उत्पादन पर भी सलाह
मानसून से पहले पशुओं को गलघोंटू और जहरी बुखार का टीकाकरण कराने की सलाह दी गई है। वहीं बकरियों में पी.पी.आर. रोग से बचाव के लिए टीकाकरण आवश्यक बताया गया है। हरे चारे के लिए ज्वार, मक्का और लोबिया की मिश्रित बुवाई करने से किसानों को बेहतर उत्पादन मिल सकता है।
जल संरक्षण और टिकाऊ खेती पर फोकस
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की है कि वे नरवाई न जलाएं और उसे खेत में मिलाकर प्राकृतिक रूप से मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाएं। साथ ही वर्षा जल संरक्षण के लिए डबरी निर्माण और मेड़ों की मरम्मत जैसे कार्य समय पर करें। विभाग ने कहा है कि टिकाऊ और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाकर किसान अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं और फसल उत्पादन को सुरक्षित बना सकते हैं।
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