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फसल की खेती (Crop Cultivation)

प्याज के बीज उत्पादन की वैज्ञानिक विधि: खेत की तैयारी से लेकर कटाई तक जानें पूरी प्रक्रिया

28 अक्टूबर 2026, नई दिल्ली: प्याज के बीज उत्पादन की वैज्ञानिक विधि: खेत की तैयारी से लेकर कटाई तक जानें पूरी प्रक्रिया – प्याज भारत की प्रमुख नकदी फसलों में शामिल है। इसकी बढ़ती मांग के साथ उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की आवश्यकता भी बढ़ रही है। उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक खेती पद्धतियों को अपनाकर प्याज के बीज का बेहतर उत्पादन किया जा सकता है। इसके लिए स्वस्थ कंदों का चयन, खेत की तैयारी, उचित रोपण, खाद एवं सिंचाई प्रबंधन, रोगिंग और समय पर बीज की कटाई का ध्यान रखना जरूरी है।

दो मौसम में तैयार होता है प्याज का बीज

प्याज सामान्यतः द्विवर्षीय फसल है। इसके बीज उत्पादन में दो पूरे मौसम लगते हैं। पहले वर्ष में प्याज के कंद तैयार होते हैं, जबकि दूसरे वर्ष में कंदों से पुष्प डंठल निकलते हैं और बीज बनते हैं। व्यावसायिक स्तर पर प्याज के बीज का उत्पादन मुख्य रूप से दो विधियों से किया जाता है। पहली विधि बल्ब से बीज यानी बल्ब-टू-सीड और दूसरी विधि बीज से बीज यानी सीड-टू-सीड है।

बल्ब से बीज उत्पादन की विधि अधिक प्रचलित है। इसमें पहले वर्ष में तैयार कंदों को अगले मौसम में बीज उत्पादन के लिए लगाया जाता है। इस विधि में स्वस्थ कंदों का चयन और अवांछित पौधों को हटाना अपेक्षाकृत आसान होता है। वहीं, बीज से बीज उत्पादन में सीधे बीज बोकर पौधे तैयार किए जाते हैं और उनसे बीज प्राप्त किया जाता है।

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जलवायु और मिट्टी का रखें ध्यान

प्याज बीज उत्पादन के लिए समशीतोष्ण और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र अनुकूल हैं। प्याज सर्दियों के मौसम की फसल है। कंद और पुष्प डंठल के शुरुआती विकास के लिए 10 से 15 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त रहता है। प्याज के कंदों के विकास पर दिन की लंबाई का प्रभाव पड़ता है, जबकि बीज उत्पादन के लिए इसे दिन-तटस्थ फसल माना जा सकता है।

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प्याज की अच्छी पैदावार के लिए उपजाऊ दोमट मिट्टी का चयन करना चाहिए। मिट्टी में पर्याप्त जैविक पदार्थ और जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए। मिट्टी अधिक अम्लीय या अधिक क्षारीय नहीं होनी चाहिए। कंद बनने, बीज की कटाई और उपचार के दौरान अपेक्षाकृत अधिक तापमान और कम आर्द्रता अनुकूल रहती है।

प्याज की उन्नत किस्मों का चयन

गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन के लिए उपयुक्त किस्मों का चयन जरूरी है। प्याज की प्रमुख किस्मों में पूसा व्हाइट, कल्याणपुर, रेड राउंड, पूसा-48, पूसा रेड, पूसा माधवी, अर्का निकेतन, अर्का कल्याणी, नासिक रेड, अर्का पीतांबर, पूसा ऋद्धि, पटना रेड, एग्रीफाउंड डार्क रेड, एग्रीफाउंड लाइट रेड, बेल्लारी रेड और रामपुर लोकल शामिल हैं। किस्म का चयन करते समय स्थानीय जलवायु, मिट्टी और खेती की परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिए।

स्वस्थ कंदों का चयन और उपचार

बल्ब से बीज उत्पादन के लिए स्वस्थ, रोगमुक्त और मध्यम आकार के कंदों का चयन करना चाहिए। कंदों में संबंधित किस्म के विशिष्ट गुण होने चाहिए। इसके लिए 4 से 6 सेंटीमीटर व्यास वाले कंद चुने जा सकते हैं। क्षतिग्रस्त और दूसरी किस्म के कंदों को अलग कर देना चाहिए। मैदानी क्षेत्रों में कंदों का रोपण मध्य अक्टूबर से मध्य नवंबर तक और पहाड़ी क्षेत्रों में अप्रैल से जून तक किया जा सकता है। एक हेक्टेयर क्षेत्र में पौधे तैयार करने के लिए लगभग एक-बीसवां हेक्टेयर नर्सरी पर्याप्त होती है।

कंदों को रोपने से पहले उनका उपचार करना भी जरूरी है। इसके लिए फफूंदनाशक का चयन और उसकी मात्रा कृषि विशेषज्ञ की सलाह तथा उत्पाद के लेबल के अनुसार तय करनी चाहिए। उचित उपचार से कंदों को सड़न और फफूंदजनित रोगों से बचाने में मदद मिलती है।

रोपण की विधि और दूरी

चयनित कंदों को मिट्टी में 3 से 5 सेंटीमीटर की गहराई पर लगाना चाहिए। पौधों के बीच 45 × 30 सेंटीमीटर की दूरी रखी जाती है। क्यारियों का आकार सिंचाई के स्रोत और खेत की परिस्थितियों के अनुसार तय किया जा सकता है। अंकुरित कंदों को सीधे लगाया जा सकता है। जिन कंदों में अंकुरण नहीं हुआ है, उनके ऊपरी हिस्से को हटाने की विधि भी अपनाई जाती है, ताकि अंकुरण में तेजी आ सके। इस प्रक्रिया में कंदों को नुकसान न पहुंचे, इसका ध्यान रखना जरूरी है।

खाद और सिंचाई प्रबंधन

प्याज के बीज उत्पादन के लिए खेत तैयार करते समय प्रति हेक्टेयर लगभग 20 टन सड़ी हुई गोबर की खाद डालनी चाहिए। इसके साथ रोपण के समय 250 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट और 45 किलोग्राम पोटेशियम सल्फेट देने की जानकारी दी गई है।

पौधों की वृद्धि के दौरान 250 से 375 किलोग्राम अमोनियम सल्फेट या कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट को दो से तीन खुराक में टॉप ड्रेसिंग के रूप में दिया जा सकता है। उर्वरकों की वास्तविक मात्रा मिट्टी की जांच और स्थानीय कृषि अनुशंसाओं के अनुसार तय करनी चाहिए। सर्दियों में लगभग 15 दिन के अंतराल पर और गर्म मौसम में साप्ताहिक सिंचाई की जा सकती है। कंद और बीज के परिपक्व होने के दौरान सिंचाई कम कर देनी चाहिए। सिंचाई का अंतराल मिट्टी की नमी और मौसम को ध्यान में रखकर तय करना चाहिए।

रोगिंग और पृथक्करण दूरी का रखें ध्यान

प्याज में पर-परागण मुख्य रूप से मधुमक्खियों जैसे कीटों के माध्यम से होता है। इसलिए बीज उत्पादन के दौरान दूसरी किस्मों के परागकणों से अवांछित परागण होने की आशंका रहती है। बीज की आनुवंशिक शुद्धता बनाए रखने के लिए खेत में नियमित रूप से रोगिंग (अनुपयुक्त पौधों को हटाना) करनी चाहिए।

रोगिंग के दौरान दूसरी किस्म के या अवांछित पौधों को पहचानकर हटा दिया जाता है। इसके लिए कंद का रंग और आकार, पत्तियों का प्रकार तथा बीज डंठल की ऊंचाई जैसे लक्षणों पर ध्यान दिया जाता है। खेत को खरपतवार से मुक्त रखना भी जरूरी है।

शुद्ध बीज उत्पादन के लिए प्याज की दूसरी किस्मों से निर्धारित पृथक्करण दूरी बनाए रखनी चाहिए। आधार बीज उत्पादन के लिए कम से कम 1,000 मीटर और प्रमाणित बीज उत्पादन के लिए 500 मीटर की दूरी का पालन करने से पहले संबंधित बीज प्रमाणन मानकों की पुष्टि कर लें।

प्याज के बीज की कटाई कब करें?

प्याज के बीज की कटाई का समय फूल आने और बीज के पकने की अवस्था पर निर्भर करता है। सामान्यतः फूल आने के लगभग 30 से 50 दिन बाद बीज पकने लगते हैं। कटाई के लिए अप्रैल से मई का समय भी अनुकूल हो सकता है। हाथ से कटाई तब की जा सकती है, जब लगभग 25 प्रतिशत पुष्प गुच्छों में फल खुलने लगें और काले बीज दिखाई देने लगें। इस समय पुष्प गुच्छों को लगभग 15 सेंटीमीटर लंबे डंठल के साथ काटा जाता है। मशीन से कटाई के लिए 1 से 3 प्रतिशत पुष्प गुच्छों में पके बीज दिखाई देने की अवस्था बताई गई है।

बीज की सफाई और भंडारण से पहले की प्रक्रिया

कटाई के बाद पुष्प गुच्छों को कुछ दिनों तक कैनवास या प्लास्टिक की चादर पर सुखाना चाहिए। इसके बाद थ्रेसिंग या लचीली छड़ियों की सहायता से बीजों को कैप्सूल से अलग किया जाता है। बीजों को छलनी से साफ करके 6 से 8 प्रतिशत नमी तक सुखाना चाहिए। बीज की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए उसकी सफाई, उचित सुखाई और सुरक्षित भंडारण जरूरी है। बीज उपचार के लिए फफूंदनाशक का इस्तेमाल करने से पहले उसकी स्वीकृत मात्रा और उपयोग संबंधी निर्देशों की पुष्टि करनी चाहिए।

प्रति हेक्टेयर 850 से 1,000 किलोग्राम तक बीज उत्पादन

प्याज के बीज की औसत उपज 850 से 1,000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है। वास्तविक उत्पादन किस्म, जलवायु, परागण, पौधों की देखभाल और बीज की कटाई के सही समय पर निर्भर करता है।

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