धान में ऐसे करें कीट एवं रोग की रोकथाम

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धान में ऐसे करें कीट एवं रोग की रोकथाम खाद्यान्न फसलों में धान का प्रमुख स्थान है। धान विश्व की प्रमुख खाद्यान्न फसलों में से एक है। भारत में आधी आबादी भोजन हेतु धान पर निर्भर करती है। ऐसा देखा गया है कि फसल की उन्नत किस्म का प्रयोग, उपयुक्त समय पर बुआई/रोपाई, मृदा परीक्षण के आधार पर पोषक तत्व प्रबंधन तथा समय पर ंिसंचाई के बावजूद भी किस्मों की अनुशंसित उत्पादन क्षमता के आधार पर उत्पादन प्राप्त नहीं हो रहा है। ऐसा कई कारणों से होता है। जिसमें प्रमुख कारण फसल पर लगने वाले कीटों व रोगों का प्रकोप है।

प्रमुख कीट

तना बेधक – इस कीट की संूडियां ही हानिकारक होती है। पूर्ण विकसित सूँडी हल्के पीले रंग की व जिसका सिर नारंगी पीले सिर वाली होती है। मादा कीट पीले रंग के होते हैं तथा अगले दोनों पंखों के मध्य काला धब्बा होता है। मादा कीट द्वारा अण्डे पत्तियों के अग्र भाग की ऊपरी सतह पर झुण्ड में दिये जाते हैं। फसल में कीट का प्रकोप नर्सरी से लेकर फसल पकने तक रहता है। इस कीट की इल्ली तने की गांठ में छेद करके तने के अंदर घुसकर मुख्य तने को अंदर ही अंदर खाती है। जिससे ग्रसित पौधे की मध्य कलिका, तना व पत्तियां सूख जाती हैं अर्थात् मृत केन्द्र बनता है।

प्रबंधन:

  • ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें।
  • टी आकार की 20 खूटियां प्रति एकड़ की दर से लगायें।
  • फेरोमोन ट्रेप 4 प्रति एकड़ की दर से लगायें।
  • खेत को खरपतवार से मुक्त रखें।
  • संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों का उपयोग करें।
  • खड़ी फसल में कीट की रोकथाम हेतु कारटाफ हाईड्रोक्लोराईड 4 जी की 8 किग्रा. या फोरेट 10 जी की 6-8 किग्रा. मात्रा का प्रति एकड़ की दर से भुकाव करें या ट्राईजोफॉस 40 ईसी की 400-500 मिली या बुप्रोफेन्जिन 10 प्रतिशत ई सी 200 मिली. मात्रा का प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।

धान का पत्ती लपेटक – सामान्यतया पौध रोपण के 4-5 सप्ताह बाद इसका प्रकोप शुरु हो जाता है। जो जुलाई से अक्टूबर तक रहता है। इस कीट की सूंडी ही हानिकारक होती है। सूंडियाँ दो पत्तों को आपस में जोड़कर लपेट लेती है तथा इन्हें मोड़कर अंदर ही अंदर पत्तियों के हरे भाग को खाती है। जिससे पत्तियों पर सफेद धारियाँ बन जाती हैं। जिससे पत्तियाँ झुलसी हुई सी दिखाई पड़ती हैं। इस कीट के प्रकोप के कारण पौधे का विकास बहुत ही धीमी गति से होता है।

प्रबंधन:-

  • ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें।
  • टी आकार की 20 खूटियां प्रति एकड़ की दर से लगायें।
  • खेत को खरपतवार से मुक्त रखें।
  • संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों का उपयोग करें।
  • खड़ी फसल में कीट की रोकथाम हेतु ट्राईजोफॉस 40 ईसी की 300-400 मिली मात्रा या क्विनालफॉस 25 ईसी की 600 मिली. मात्रा, कार्बो सल्फ्यूरॉन 25 प्रतिशत ई सी की 300-400 मिली. मात्रा का प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।

गंधी बग – सामान्यतया इस कीट का प्रकोप जून-जुलाई से लेकर नवम्बर तक रहता है। इस कीट के शरीर से एक विशेष प्रकार की बदबू आती रहती है। जिसके कारण इन कीटों की पहचान आसानी से हो जाती है। इस कीट के पीले रंग के शिशु एवं प्रौढ़ दोनों ही बाल की दुग्धावस्था में दानों से रस चूस लेते हैं। जिससे धान की बालियाँ आधी भरी या बिल्कुल खाली रह जाती है।

प्रबंधन:- खेत को खरपतवार से मुक्त रखें। खड़ी फसल में कीट की रोकथाम हेतु फोरेट 10 जी की 4-6 किग्रा. मात्रा या फेन्थोएट 2 प्रतिशत की 8 – 10 किग्रा मात्रा का प्रति एकड़ की दर से भुरकाव करें।

बाल काटने वाला कीट (सैनिक कीट ) – वर्षा के आरम्भ होते की इस कीट का प्रकोप शुरु हो जाता है। अण्डों से सूंडियाँ निकलकर नर्सरी में पत्ती की शिराओं को छोड़कर सम्पूर्ण पत्तियों केा इस तरह कुतर देती हैं जेैसे जानवरों ने चर लिया है। दिन के समय में इस कीट की इल्लियां पौधों की जड़ों के पास छिपी रहती हैं तथा रात्रि में भूमि के ऊपर के पौधे के हिस्से को खाती है।

प्रबंधन:-

  • ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें।
  • टी आकार की 20 खूटियां प्रति एकड़ की दर से लगायें।
  • खड़ी फसल में कीट की रोकथाम हेतु क्विनालफॉस 25 ईसी या क्लोरोपाईरीफॉस 20 ईसी का 600 मिली मात्रा या इण्डोक्साकार्ब 15.8 प्रतिशत की 130 मिली मात्रा का प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।

हरा फुदका – ये पत्तियों पर फुदकने वाले हरे रंग के कीट होते हैं जो पत्तियों पर बड़ी संख्या में चहल कदमी करते हुए आसानी से देखे जा सकते है। इस कीट के शिशु व प्रौढ़ दोनों ही पत्तियों का रस चूसते हैं जिससे पत्तियाँ पीली व भूरी पड़ जाती हैं तथा पत्तियों पर काली फफूंद लग जाती है। कीट के प्रकोप से पोैधों में किल्लों की संख्या घट जाती है तथा पौधों की ऊचाई भी कम रह जाती है। यह कीट टुंगरु वायरस रोग को भी फैलाता है।

प्रबंधन:-

खेत में खरपतवार मुक्त रखें। खड़ी फसल में कीट की रोकथाम हेतु कारटाफ हाइड्रोक्लोराइड 4 ग्राम की 08 किग्रा/एकड़ की दर से भुरकाव करें या थायोमिथॉक्जॉम 25 डब्लू. पी. की 40 ग्राम मात्रा या बुप्रोफेन्जिन 25 ई सी की 330 मिली. मात्रा या इमिडाक्लोरोप्रिड 17.8 एस. एल. की 90 – 120 मिली. की मात्रा का प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।

प्रमुख रोग

खैरा रोग – इस रोग से प्रभावित पौधे बौने व अविकसित होते है। प्रारम्भिक अवस्था में इस रोग के लक्षण पौधे की पत्तियों के आधार में हरिमा हीनता के रूप में प्रगट होते हैं तथा कुछ दिनों बाद यह पत्तियां भूरे से कास्य रंग के चकत्तों से ढक जाती है, जिसके फलस्वरूप पूरी पत्ती भूरे-कत्थई रंग की पडकर सूख जाती है।

रोग का फैलाव: चूंकि यह रोग किसी रोगजनक से न होकर जिंक पोषक तत्व की कमी से होता है। अत: यह रोग खेतों में जिंक की कमी वाले क्षेत्रों में दिखाई पड़ता है। मुख्यत: धान-गेहंू फसल चक्र लेने से मृदा में जिंक पोषक तत्व की कमी आती है।

प्रबंधन:

  • जिंक पोषक तत्व की कमी वाले क्षेत्रों में बुवाई के समय 8-10 किग्रा. जिंक सल्फेट का प्रति एकड़ की दर से खेत की तैयारी के समय उपयोग करें।
  • खड़ी फसल में लक्षण दिखाई देने पर 02 किग्रा जिंक सल्फेट $04 किग्रा. यूरिया के घोल का प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।

सफेद रोग – यह रोग लौह तत्व की अनुपलब्धता या कमी के कारण नर्सरी अवस्था में अधिक लगता है। इस रोग के प्रभाव से नई पत्ती सफेद रंग की निकलती है जो कागज के समान पड़कर फट जाती है।

प्रबंधन:

  • लौह पोषक तत्व की कमी वाले क्षेत्रों में बुवाई के समय 8-10 किग्रा. फेरस सल्फेट का प्रति एकड़ की दर से खेत की तैयारी के समय उपयोग करें।
  • खड़ी फसल में लक्षण दिखाई देने पर 02 किग्रा फेरस सल्फेट $04 किग्रा. यूरिया के घोल का प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।

भूरी चित्ती रोग – इस रोग का प्रकोप पौध अंकुरण से लेकर फसल पकने तक होता है। इस रोग के कारण पत्तियों, पर्णच्छदों एवं तुंबों में भूरे रंग के छोटे-छोटे धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं। उग्र अवस्था में ये धब्बे आपस में मिल जाते हैं, जिस कारण पत्तियां भूरे रंग की पड़कर सूख जाती है। रोग से प्रभावित बालियों में तुंबों का रंग गहरे भूरे रंग से लेकर काले रंग के हो जाते हंै।

रोग का फैलाव:- यह मृदा व बीज जनित रोग है। पौधों पर प्राथमिक संक्रमण इन्ही के माध्यम से होता है तथा द्धितीय संक्रमण रोग जनक पौधों से स्वस्थ पौधों में वायु द्वारा होता है।

प्रबंधन:-

  • ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें।
  • स्वस्थ बीज का उपयोग करें।
  • बुवाई से पूर्व बीज को कार्बोक्सिन+थायरम की 03 ग्राम मात्रा से प्रति किग्रा बीज का उपचार करें।
  • खड़ी फसल में लक्षण दिखाई देने पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की 400 ग्राम मात्रा या कार्बेन्डाजिम की 200 ग्राम मात्रा का प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।

झुलसन रोग – इस रोग के लक्षण पत्तियों एवं बालियों पर आंख की शक्ल के धब्बों के रूप में प्रकट होते हैं, जिनका बाहरी किनारा कत्थई व मध्य भाग भूरे रंग का होता है। रोग के उग्र होने की स्थिति में कई धब्बे आपस में मिल जाते हैं जिस कारण पत्ती झुलसी हुई दिखती है। तने की गांठों का हिस्सा काला एवं भुरभुरा हो जाने के कारण गांठों से तना टूट जाता है। इसके अतिरिक्त पौधे की गर्दन पर भूरे से काले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, जिससे बाली टूटकर बिखर जाती है।

रोग का फैलाव:- इस रोग के रोगजनक फसल अवशेषों में उपस्थिति रहते हैं जो कि हवा के माध्यम से उड़कर स्वस्थ्य पौधों में प्राथमिक संक्रमण का कारण बनते है। प्राथमिक संक्रमण के उपरान्त द्धितीयक संक्रमण हेतु संक्रमित पौधों में अधिक मात्रा में बीजाणु बनते हैं जो वायु के माध्यम से स्वस्थ्य पौधों में फैल जाते हैं।

प्रबंधन:-

  • ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें।
  • फसल कटाई उपरान्त फसल अवशेषों को नष्ट कर दें।
  • अनुशंसित मात्रा में नत्रजनधारी उर्वरकों का उपयोग करें।
  • बुवाई से पूर्व बीज को कार्बोक्सिन+ थायरम की 03 ग्राम मात्रा से प्रति किग्रा. बीज का उपचार करें।
  • खड़ी फसल में लक्षण दिखाई देने पर कार्बेन्डाजिम+मैनकोजेब की 300-400 ग्राम मात्रा या हेक्साकोनाजोल की 400 मिली. मात्रा का प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।

जीवाणु झुलसा रोग – इस रोग के कारण पत्तियों के दोनों किनारों से पीले रंग धारी निकलती हुई नीचे की ओर बढ़ती है तथा तने में फैल जाती है। ये धारियां गीली या जलासिक्त होती हंै जो बाद में मिलकर चकत्ते बनाती हैं। इस रोग के कारण पूरा पौधा ऊपरी भाग से नीचे की ओर पीला सा होकर सूखकर मर जाता है।

रोग का फैलाव:- इस रोग के रोगजनक (बीजाणु) बीज व पौधों के अवशेषों में पाये जाते हैं। पौधों में एक बार रोग जनक का आक्रमण होने के पश्चात रोग का प्रसार या द्धितीयक संक्रमण प्रभावित पत्तियों पर उत्पन्न जीवाणुओं द्वारा वर्षा की बूंदों से अथवा पत्तियों के आपसी सम्पर्क से होता है।

प्रबंधन:-

  • ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें।
  • बुवाई से पूर्व बीज को स्ट्रेप्टोसाईक्लीन .01 प्रतिशत से बीज उपचार करें।
  • खड़ी फसल में रोग प्रबंधन हेतु 12 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लीन/एग्रीमाइसीन व 200 ग्राम कॉपर आक्सीक्लोराइड का प्रति एकड़ की दर से 12-15 दिन के अंतराल पर दो छिड़काव करें।
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