सोयाबीन में बार-बार खाद डालने के बाद भी नहीं बढ़ रही उपज? समझिए फसल को वास्तव में कितनी खाद चाहिए
मध्य भारत के कई सोयाबीन क्षेत्रों में किसान जरूरत से ज्यादा यूरिया डाल रहे हैं, जबकि वैज्ञानिकों के अनुसार फसल की वास्तविक जरूरत संतुलित पोषण और सल्फर-पोटाश प्रबंधन की है।
29 मई 2026, नई दिल्ली: सोयाबीन में बार-बार खाद डालने के बाद भी नहीं बढ़ रही उपज? समझिए फसल को वास्तव में कितनी खाद चाहिए – मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान के कई सोयाबीन उत्पादक क्षेत्रों में किसान लगातार बढ़ती लागत और स्थिर उत्पादन से परेशान हैं। खेत में खाद की मात्रा हर साल बढ़ रही है, लेकिन प्रति एकड़ उपज में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी बड़ी वजह “ज्यादा खाद, ज्यादा उत्पादन” वाली सोच है, जिसने कई खेतों में पोषण संतुलन बिगाड़ दिया है।
राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर के अनुसार सोयाबीन में उत्पादन बढ़ाने के लिए केवल यूरिया बढ़ाना समाधान नहीं है। फसल को संतुलित रूप से नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश और सल्फर की जरूरत होती है।
सोयाबीन की वास्तविक पोषण आवश्यकता क्या है
संस्थान ने मध्य क्षेत्र — जिसमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, बुंदेलखंड और उत्तर-पश्चिम महाराष्ट्र शामिल हैं — के लिए 25:60:40:20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश और सल्फर की अनुशंसा की है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि किसान अक्सर केवल नाइट्रोजन पर ध्यान देते हैं, जबकि फसल की उत्पादकता में फॉस्फोरस और सल्फर की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है।
कितनी यूरिया वास्तव में पर्याप्त है
राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर की सलाह के अनुसार सोयाबीन के लिए लगभग 56 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर पर्याप्त माना गया है। लेकिन कई किसान 100–150 किलोग्राम तक यूरिया डाल देते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार इससे शुरुआती बढ़वार तेज होती है, लेकिन बाद में पौधे अत्यधिक नरम हो जाते हैं। कई खेतों में फसल गिरने लगती है और रोगों का दबाव बढ़ जाता है। परिणामस्वरूप दाना भराव और फली विकास प्रभावित होता है।
वैज्ञानिकों ने कौन-कौन से उर्वरक संयोजन सुझाए
संस्थान ने किसानों के लिए तीन प्रमुख उर्वरक मॉडल सुझाए हैं।
पहला मॉडल:
56 किलो यूरिया + 375 किलो सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) + 67 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP)।
दूसरा मॉडल:
125 किलो DAP + 67 किलो MOP + 25 किलो बेंटोनाइट सल्फर।
तीसरा मॉडल:
200 किलो मिश्रित उर्वरक 12:32:16 + 25 किलो बेंटोनाइट सल्फर।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार SSP आधारित पोषण मॉडल उन क्षेत्रों में अधिक प्रभावी पाया गया है जहाँ सल्फर की कमी बढ़ रही है।
सल्फर की कमी अब बड़ी चुनौती बन रही
कई जिलों में किसानों ने DAP और यूरिया पर निर्भरता बढ़ा दी है। इससे मिट्टी में सल्फर की कमी तेजी से बढ़ी है।
विशेषज्ञों के अनुसार सल्फर की कमी होने पर पौधों की नई पत्तियाँ पीली दिखाई देती हैं। फलियों में दानों का भराव कमजोर रहता है और तेल प्रतिशत घट जाता है। चूँकि सोयाबीन एक तिलहनी फसल है, इसलिए सल्फर का महत्व और बढ़ जाता है।
पोटाश केवल “अतिरिक्त खर्च” नहीं
कई किसान लागत कम करने के लिए पोटाश का उपयोग नहीं करते। लेकिन कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि पोटाश पौधों को सूखे और तापमान तनाव से लड़ने की क्षमता देता है।
मानसून की अनिश्चितता वाले क्षेत्रों में पोटाश का संतुलित उपयोग फसल स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है।
जैविक खाद का महत्व फिर बढ़ रहा
राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने प्रति हेक्टेयर 5–10 टन गोबर की सड़ी खाद या 2.5 टन पोल्ट्री खाद उपयोग करने की सलाह दी है।
विशेषज्ञों के अनुसार लगातार रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी की जैविक सक्रियता कम हो रही है। ऐसे में जैविक खाद मिट्टी की संरचना और नमी धारण क्षमता सुधारने में मदद करती है।
मिट्टी परीक्षण के बिना बढ़ रही असंतुलित खेती
कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कई किसान बिना मिट्टी परीक्षण के हर साल एक जैसी खाद डालते हैं। इससे कुछ पोषक तत्वों की अधिकता और कुछ की कमी बढ़ती जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसान मिट्टी परीक्षण आधारित पोषण प्रबंधन अपनाएँ, तो लागत घटाने के साथ उत्पादन में भी स्थिर सुधार संभव है।
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