रागी की खेती कैसे करें

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  • गोवर्धन लाल कुम्हार, अमित कुमार
  • देवी लाल धाकड़
    महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर

 

17 जून 2022, रागी की खेती कैसे करें रागी की खेती मोटे अनाज के रूप में की जाती है। रागी मुख्य रूप से अफ्रीका और एशिया महाद्वीप में उगाई जाती है। जिसको मडुआ, अफ्रीकन रागी, फिंगर बाजरा और लाल बाजरा के नाम से भी जाना जाता है। इसके पौधे पूरे साल पैदावार देने में सक्षम होते हैं। इसके पौधे सामान्य तौर पर एक से डेढ़ मीटर तक की ऊंचाई के पाए जाते हैं। इसके दानो में खनिज पदार्थों की मात्रा बाकी अनाज फसलों से ज्यादा पाई जाती है इसके दानों का इस्तेमाल खाने में कई तरह से किया जाता है। इसके दानों को पीसकर आटा बनाया जाता है। जिससे मोटी डबल रोटी, साधारण रोटी और डोसा बनाया जाता है। इसके दानों को उबालकर भी खाया जाता है।

उपयुक्त मिट्टी

रागी की खेती कई तरह की उपजाऊ और कार्बनिक पदार्थों से भरपूर मिट्टी में की जा सकती है। लेकिन इसके अच्छे उत्पादन के लिए बलुई दोमट मिट्टी को सबसे उपयुक्त माना जाता है। इसकी खेती के लिए भूमि में जलभराव नहीं हो। क्योंकि जलभराव होने की वजह से इसके पौधे खराब हो जाते हैं। इसकी खेती के लिए भूमि का पीएच मान 5.5 से 8 के बीच हो।

खेत की तैयारी

रागी की रोपाई के लिए भुरभुरी मिट्टी को अच्छा माना जाता है। क्योंकि भुरभुरी मिट्टी में इसके बीजों का अंकुरण अच्छे से होता है। रागी की खेती के लिए शुरुआत में खेत की तैयारी के दौरान खेत में मौजूद पुरानी फसलों के अवशेषों को नष्ट कर खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से गहरी जुताई कर दें। उसके बाद कुछ दिन खेत को खुला छोड़ दें। ताकि सूर्य की धूप से मिट्टी में मौजूद हानिकारक कीट नष्ट हो जाएं। खेत को खुला छोडऩे के बाद खेत में जैविक खाद के रूप में पुरानी गोबर की खाद को डालकर उन्हें अच्छे से मिट्टी में मिला दें। खाद को मिट्टी में मिलाने के लिए खेत की कल्टीवेटर के माध्यम से दो से तीन तिरछी जुताई कर दें।

खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में पानी चलाकर खेत का पलेवा कर दें। पलेवा करने के तीन से चार दिन बाद जब जमीन की ऊपरी सतह हल्की सूखी हुई दिखाई देने लगे तब फिर से खेत की जुताई कर दें। उसके बाद खेत में रोटावेटर चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बना लें। मिट्टी को भुरभुरा बनाने के बाद खेत में पाटा लगाकर भूमि को समतल कर दें। ताकि बारिश के मौसम में जलभराव जैसी समस्या का सामना ना करना पड़ें।

उन्नत किस्में

रागी की बाजार में काफी उन्नत किस्में मौजूद हैं। जिन्हें कम समय में अधिक पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है।
जेएनआर 852, जीपीयू 45, चिलिका , जेएनआर 1008, पीइएस 400, वीएल 149, आरएच 374 उन्नत किस्में हैं। इनके अलावा और भी कई किस्में हैं जिनमें जेएनआर 981, भैरवी, शुव्रा, अक्षय, पीआर 202, एमआर 374, जेएनआर 852 और केएम 65 जैसी काफी किस्में मौजूद हैं।

बीज की मात्रा और उपचार

रागी की रोपाई के लिए बीज की मात्रा बुवाई की विधि पर निर्भर करती हैं। ड्रिल विधि से रोपाई के दौरान प्रति हेक्टेयर 10 से 12 किलो बीज की जरूरत होती है। जबकि छिडक़ाव विधि से रोपाई के दौरान लगभग 15 किलो बीज की जरूरत पड़ती है। इसके बीज को खेत के लगाने से पहले उसे उपचारित कर लें. बीजों को उपचारित करने के लिए थीरम, बाविस्टीन या कैप्टन दवा का इस्तेमाल करें।

बीज रोपाई का तरीका और समय

ड्रिल विधि से पंक्तियों में रोपाई : रागी के बीजों की रोपाई छिडक़ाव और ड्रिल दोनों तरीकों से की जाती है। छिडक़ाव विधि से इसकी बुवाई के दौरान इसके बीजों को समतल की हुई भूमि में किसान भाई छिडक़ देते हैं। उसके बाद बीजों को मिट्टी में मिलाने के लिए कल्टीवेटर के पीछे हल्का पाटा बांधकर खेत की दो बार हल्की जुताई कर देते हैं। इससे बीज भूमि में लगभग तीन सेंटीमीटर नीचे चला जाता है। ड्रिल विधि से बिजाई के दौरान इसके बीजों को मशीनों की सहायता से कतारों में लगाया जाता है। कतारों में इसकी रोपाई के दौरान प्रत्येक कतारों के बीच लगभग एक फिट दूरी हो। और कतारों में बोये जाने वाले बीजों के बीच 15 सेंटीमीटर के आसपास दूरी हो। रागी के बीजों की दोनों विधि से रोपाई करने के दौरान इसके बीजों को भूमि में तीन से पांच सेंटीमीटर की गहराई में उगायें। इससे बीजों का अंकुरण अच्छे से होता है।
रागी की खेती खरीफ की फसलों के साथ की जाती है। इस दौरान इसके पौधों की रोपाई मई के आखिर से जून माह तक की जाती है। इसके अलावा कई ऐसी जगह हैं जहां इसकी रोपाई जून के बाद भी की जाती है। और कुछ लोग इसे जायद के मौसम में भी उगाते हैं।

पौधों की सिंचाई

रागी के पौधों को सिंचाई की ज्यादा जरूरत नहीं होती। क्योंकि इसकी खेती बारिश के मौसम में की जाती है। और इसके पौधे सूखे को काफी समय तक सहन कर सकते हैं। अगर बारिश के मौसम में बारिश समय पर ना हो तो पौधों की पहली सिंचाई रोपाई के लगभग एक से डेढ़ महीने बाद कर दें। इसके अलावा जब पौधे पर फूल और दाने आने लगे तब उनको नमी की ज्यादा जरूरत होती है। इस दौरान इसके पौधों की 10 से 15 दिन के अंतराल में दो से तीन बार सिंचाई कर दें। इससे बीजों का आकार अच्छे से बनता है। और उत्पादन भी अधिक प्राप्त होता है।

उर्वरक की मात्रा

रागी के पौधों को उर्वरक की ज्यादा जरूरत नही होती। इसकी खेती के लिए शुरुआत में खेत की तैयारी के वक्त लगभग 12 से 15 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद को खेत में डालकर अच्छे से मिट्टी में मिला दें। इसके अलावा रासायनिक खाद के रूप में डेढ़ से दो बोरे एनपीके की मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की आखिरी जुताई के वक्त खेत में छिडक़कर मिट्टी में मिला दें।

खरपतवार नियंत्रण

रागी की खेती में खरपतवार नियंत्रण रासायनिक और प्राकृतिक दोनों तरीकों से किया जाता हैं। रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए बीज रोपाई के पहले आइसोप्रोट्यूरॉन या ऑक्सीफ्लोरफेन की उचित मात्रा का छिडक़ाव खेत में कर दें। जबकि प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण पौधों की निराई गुड़ाई कर किया जाता है। इसके लिए शुरुआत में पौधों की रोपाई के लगभग 20 से 22 दिन बाद उनकी पहली गुड़ाई कर दें। रागी की खेती में प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए दो बार गुड़ाई काफी होती है। इसलिए पहली गुड़ाई के लगभग 15 दिन बाद पौधों की एक बार और गुड़ाई कर दें।

फसल की कटाई और मढ़ाई

रागी के पौधे बीज रोपाई के लगभग 110 से 120 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं। जिसके बाद इसके सिरों को पौधों से काटकर अलग कर लें। सिरों की कटाई करने के बाद उन्हें खेत में ही एकत्रित कर कुछ दिन सूखा लें। उसके बाद जब दाना अच्छे से सूख जाए तब मशीन की सहायता से दानो को अलग कर एकत्रित कर बोरो में भर लें।

पैदावार और लाभ

रागी की विभिन्न किस्मों की प्रति हेक्टेयर औसतन पैदावार 25 क्विंटल के आसपास पाई जाती है। जिसका बाज़ार भाव 2700 रूपये प्रति क्विंटल के आसपास पाया जाता है। इस हिसाब से किसान एक बार में एक हेक्टेयर से 60 हजार रूपये तक की कमाई आसानी से कर लेता है।

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